- सुखबीर सिंह बादल पर 2024 में पहला और अब दूसरा हमला हुआ. दोनों में हमलावरों की सोच और तरीका काफी हद तक एक सा था
- दोनों हमले बताते हैं कि 2015 की बेअदबी की घटनाओं की जांच और उस पर हुई कार्रवाई को लेकर नाराजगी अब भी बरकरार है
- बेअदबी, सिख पंथ पर छूटती पकड़, घटते दबदबे ने सुखबीर बादल को पंजाब की राजनीति में पहले से अधिक अकेला कर दिया है
शिरोमणि अकाली दल के प्रमुख और पंजाब के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल पर हुए दो हमलों को गौर से देखें तो एक बात साफ नजर आती है. दोनों हमलावरों ने कानून अपने हाथ में लेकर खुद ही सजा देने की कोशिश की. दोनों घटनाओं में हमलावरों की सोच और तरीका काफी हद तक एक जैसा था. धार्मिक कट्टरता को देखते हुए दोनों मामलों को अंजाम देने के तरीके में मनोवैज्ञानिक समानता दिखती है जो खुद कानून हाथ में लेने की पंजाब के कट्टरपंथी राजनीतिक इतिहास के ऐतिहासिक पैटर्न की याद दिलाती हैं.
दोनों हमलावरों ने बादल को किसी चुनावी रैली, उनके काफिले या घर पर निशाना नहीं बनाया बल्कि जानबूझकर ऐसे धार्मिक स्थानों को चुना जिनका सिख धर्म में बहुत महत्व है. अमृतसर में स्वर्ण मंदिर (दरबार साहिब) सिख धर्म का सर्वोच्च आध्यात्मिक केंद्र है, तो नांदेड़ में हुजूर साहिब सिख धर्म का पांच तख्तों में से एक है.
इससे लगता है कि मकसद सिर्फ बादल को नुकसान पहुंचाना नहीं था. हमलावर ऐसा काम धार्मिक स्थल पर मौजूद संगत के सामने करके उन्हें अपमानित भी करना चाहते थे.
एक और बात ध्यान देने वाली है. दोनों हमले उस समय हुए जब शिरोमणि अकाली दल सत्ता में नहीं था. अगर हमलावरों में इतनी ही हिम्मत थी तो उन्होंने उस समय हमला क्यों नहीं किया जब सुखबीर बादल पंजाब के उपमुख्यमंत्री थे?

सुखबीर सिंह बादल पर हमला करने वाला निहंग जसपाल सिंह पुलिस गिरफ्त में.
Photo Credit: Sukhbir Sing Badal/X
पहले हमलावर नारायण सिंह चौरा प्रतिबंधित खालिस्तानी संगठन बब्बर खालसा इंटरनेशनल से संबंध रह चुका है. वहीं नांदेड़ में हमला करने वाले शख्स से एजेंसियां पूछताछ कर रही हैं और उसे कट्टरपंथी निहंग सिख बताया जा रहा है.
दोनों हमले इस बात की ओर भी इशारा करते हैं कि समाज के एक हिस्से में 2015 की बेअदबी की घटनाओं की जांच और उस मामले में हुई कार्रवाई को लेकर नाराजगी अब भी बनी हुई है.
कट्टरपंथी तत्वों ने शायद सरकारी जांच और धार्मिक संस्थाओं की ओर से की गई कार्रवाई, दोनों को पूरी तरह स्वीकार नहीं किया है. इन लोगों का आरोप है कि 2015 के बरगाड़ी बेअदबी मामलों की सुनवाई बहुत धीमी गति से आगे बढ़ी. साथ ही उनका मानना है कि अकाल तख्त ने सुखबीर बादल को जो धार्मिक सजा दी, वह बहुत हल्की थी.
पहला हमला 4 दिसंबर 2024 को हुआ था. दूसरा हमला ऐसे समय हुआ जब पंजाब 2027 के विधानसभा चुनावों की तरफ बढ़ रहा है और बीजेपी और अकाली दल एक बार फिर अपना पुराना गठबंधन जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
बेअदबी का मुद्दा फिर बना राजनीतिक हथियार
सुखबीर बादल पर हुए ये दोनों हमले बताते हैं कि 2015 की बेअदबी के मामले अभी खत्म नहीं हुए हैं. इन मामलों ने न सिर्फ सुखबीर बादल को कट्टरपंथी गुस्से का निशाना बना रखा है, बल्कि कट्टरपंथी और खालिस्तान समर्थक तत्वों को एक ऐसा मुद्दा भी दे दिया है जिसका इस्तेमाल वे बार-बार कर सकते हैं.
बरगाड़ी और बहबल कलां का नाम बार-बार उठाकर ये संगठन और समूह लोगों की भावनाएं भड़काने की कोशिश करते हैं. इसी के साथ वे हिंसा को धर्म और समुदाय के नाम पर इसे सही ठहराने की कोशिश भी करते हैं.
उधर पंजाब में विपक्ष और सत्ता पक्ष के दल इन घटनाओं को अपने-अपने राजनीतिक नजरिए से देख रहे हैं.
सत्ताधारी आम आदमी पार्टी और कांग्रेस ने सीधे तौर पर अकाली दल को निशाने पर लिया है. उनका कहना है कि खुद को पंथ की पार्टी कहने वाले अकाली दल ने पंजाब के लोगों के धार्मिक हितों की रक्षा करने में नाकामी दिखाई.
हमले की निंदा की, पर बेअदबी को कारण बताया
विपक्षी नेताओं ने हमले की निंदा तो की, लेकिन आम आदमी पार्टी और कांग्रेस के नेताओं ने इसके पीछे 2015 की घटनाओं से जुड़ा लोगों का गुस्सा भी बताया.
AAP प्रवक्ता बलतेज पन्नू ने कहा कि अकाली दल ने हमेशा धर्म के नाम पर सरकारें बनाईं, लेकिन उसके शासन के दौरान श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बेअदबी हुई. जब लोगों ने इसके खिलाफ विरोध किया तो पुलिस की गोलीबारी में दो निर्दोष लोगों की मौत हो गई. उनके मुताबिक सिख समुदाय के मन में उस घटना का गुस्सा आज भी मौजूद है.
पंजाब विधानसभा के स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने भी इसी तरह की बात कही. उन्होंने कहा कि किसी भी हालत में हमले को सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन बादल परिवार को अब अपना रवैया बदलना चाहिए.
उन्होंने कहा कि श्री गुरु ग्रंथ साहिब और श्री अकाल तख्त साहिब से मिले धार्मिक संदेश के बावजूद अगर आचरण में बदलाव नहीं आता तो सिख समुदाय में नाराजगी होना स्वाभाविक है. उन्होंने अकाली दल के नेतृत्व से धार्मिक संस्थाओं और सिख समुदाय की भावनाओं का सम्मान करने को कहा.
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग ने भी इसी तरह की बात कही. उन्होंने कहा कि बहबल कलां, बरगाड़ी की बेअदबी, पुलिस फायरिंग, इन मामलों में इंसाफ में देरी और कई दूसरे अधूरे मामलों को लेकर सिख संगत में वास्तविक गुस्सा है.
उन्होंने यह भी कहा कि इन मामलों को अकाली दल ने जिस तरह संभाला, उससे भी लोगों में गहरी निराशा है.
अकाली दल ने इसे बड़ी साजिश बताया
अकाली दल ने इन आरोपों को पूरी तरह अलग नजरिए से देखा है. पार्टी ने इसे एक बड़ी साजिश का हिस्सा बताया.
अकाली दल के प्रवक्ता और वरिष्ठ महासचिव डॉ. दलजीत चीमा ने आम आदमी पार्टी और कांग्रेस नेताओं के बयानों की आलोचना की. उन्होंने कहा कि इन नेताओं ने हमले पर चिंता जताने के बजाय पंजाब का माहौल खराब करने की कोशिश की.
चीमा के मुताबिक अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग और आप प्रवक्ता बलतेज सिंह पन्नू ने हमले के बाद सहानुभूति का एक शब्द भी नहीं कहा. इसके बजाय वे घटना को बेअदबी से जोड़कर एक नया राजनीतिक नैरेटिव बनाने की कोशिश कर रहे हैं.
उन्होंने सवाल उठाया कि घटना नांदेड़ में हुई, लेकिन आम आदमी पार्टी के नेता पंजाब में ऐसी भाषा क्यों इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे माहौल खराब हो सकता है.
चीमा ने पंजाब के पुराने हिंसक दौर का भी जिक्र किया और बोले कि जब पंजाब में आतंकवाद का दौर था तब अकाली दल के 26 उम्मीदवारों की हत्या हुई थी. उन्होंने आप और कांग्रेस दोनों से पूछा कि उस दौर की घटनाओं से उनका क्या संबंध था.
अकाली दल के वरिष्ठ नेता बिक्रम सिंह मजीठिया ने भी नांदेड़ की घटना को सामान्य घटना मानने से इनकार किया.
उन्होंने कहा कि गुरुद्वारा परिसर में सुखबीर बादल की जान लेने की यह दूसरी कोशिश है. मजीठिया ने इस पूरे मामले की सच्चाई सामने लाने के लिए हाई लेवल सीबीआई जांच की मांग की.
उनका आरोप था कि कुछ देश विरोधी या पंथ विरोधी ताकतें पंजाब के शांत माहौल को फिर से खराब करना चाहती हैं.

क्या पंजाब विधानसभा चुनाव 2027 से पहले फिर लौट रहा है 2015?
अकाली दल की सबसे बड़ी राजनीतिक परेशानी यह है कि वह 2015 की बेअदबी की घटनाओं से पूरी तरह बाहर नहीं निकल पा रहा है. जब भी सुखबीर बादल पर कोई हमला होता है या कोई नया विवाद खड़ा होता है, राजनीतिक बहस फिर बरगाड़ी, बहबल कलां और कोटकपूरा तक पहुंच जाती है.
अकाली दल कोशिश करता है कि इन हमलों से उसके समर्थकों और पारंपरिक वोटरों में सहानुभूति पैदा हो.
दूसरी तरफ उसके राजनीतिक विरोधी इन्हीं घटनाओं के जरिए लोगों को 2015 की याद दिलाते रहते हैं.
यानी सुखबीर बादल के खिलाफ हुए हमले अब पंजाब की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक मुद्दे का हिस्सा बन चुके हैं और जैसे-जैसे विधानसभा चुनाव 2027 नजदीक आता जाएगा, बरगाड़ी और बेअदबी के मुद्दे भी फिर अधिर जो से उठाए जा सकते हैं.
कट्टरपंथी तत्व भी इस मुद्दे को जिंदा रखना चाहते हैं, क्योंकि इससे धार्मिक भावनाओं को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल करने का मौका मिलता है.

सुखबीर सिंह बादल: सत्ता, विवाद और राजनीतिक अकेलापन
सुखबीर सिंह बादल का जन्म 9 जुलाई 1962 को पंजाब के फरीदकोट में हुआ था. वह पंजाब के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक परिवारों में से एक से आते हैं.
उनके पिता प्रकाश सिंह बादल पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रहे. उनकी मां का नाम सुरिंदर कौर बादल था. सुखबीर बादल की पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्र में मंत्री रह चुकी हैं और अभी बठिंडा से सांसद हैं. दोनों की तीन संतानें हैं. दो बेटियां हरकीरत कौर और गुरलीन कौर और एक बेटा अनंतवीर सिंह.
सुखबीर की मां सुरिंदर कौर बादल का लंबी बीमारी के बाद 24 मई 2011 को निधन हो गया था. उनके पिता प्रकाश सिंह बादल का 25 अप्रैल 2023 को 95 साल की उम्र में निधन हुआ.
सुखबीर के दादा रघुराज सिंह बादल बड़े जमींदार और किसान थे. उन्होंने परिवार के ट्रांसपोर्ट कारोबार की नींव मजबूत करने में भी भूमिका निभाई.
सुखबीर ने शुरुआती पढ़ाई हिमाचल प्रदेश के कसौली स्थित द लॉरेंस स्कूल, सनावर से की. इसके बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी, चंडीगढ़ से अर्थशास्त्र में मास्टर डिग्री हासिल की. उन्होंने कैलिफोर्निया स्टेट यूनिवर्सिटी, लॉस एंजिल्स से एमबीए भी किया.

राजनीति में कैसे बढ़े सुखबीर?
सुखबीर बादल ने 1990 के दशक के बीच में चुनावी राजनीति में कदम रखा. वह 1996, 1998 और 1999 में फरीदकोट से लोकसभा सांसद चुने गए.
अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उन्होंने 1998 से 1999 तक उद्योग राज्य मंत्री के रूप में काम किया.
बाद में उन्होंने फिरोजपुर लोकसभा सीट का प्रतिनिधित्व किया. वह जलालाबाद विधानसभा सीट से भी तीन बार विधायक चुने गए. जनवरी 2008 में सुखबीर सिंह बादल शिरोमणि अकाली दल के अध्यक्ष बने.
हालांकि नवंबर 2024 में अकाल तख्त ने उन्हें तनखैया घोषित कर दिया. (सिख धर्म में तनखैया का मतलब होता है धार्मिक गुनहगार या दोषी व्यक्ति का हुक्का-पानी बंद कर देना) इसके बाद उन्होंने अकाली दल के अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया. पार्टी की कार्यसमिति ने जनवरी 2025 में उनका इस्तीफा स्वीकार कर लिया.
धार्मिक सजा पूरी करने के बाद उन्होंने दोबारा पार्टी की कमान संभाली. 12 अप्रैल 2025 को अमृतसर के तेजा सिंह समुंदरी हॉल में हुई पार्टी की आम प्रतिनिधि बैठक में उन्हें सर्वसम्मति से फिर अकाली दल का अध्यक्ष चुन लिया गया.
सुखबीर बादल 2009 से 2017 तक लगातार दो कार्यकाल पंजाब के उपमुख्यमंत्री रहे. इस दौरान उनके पास गृह विभाग और कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से जुड़े अहम विभाग भी रहे.
2008 से वह अकाली दल की राजनीति के सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिकारों में शामिल रहे हैं.

पिता प्रकाश सिंह बादल के साथ सुखबीर सिंह बादल
2015 बना सबसे बड़ा राजनीतिक संकट
सुखबीर बादल के राजनीतिक जीवन पर सबसे गहरा असर 2015 की बरगाड़ी बेअदबी की घटनाओं और उसके बाद बहबल कलां और कोटकपूरा में हुई पुलिस फायरिंग का पड़ा.
उस समय पंजाब में अकाली दल और बीजेपी की सरकार थी.
इन घटनाओं ने अकाली दल की पंथक छवि को बड़ा नुकसान पहुंचाया. इसके बाद पार्टी के पारंपरिक समर्थन आधार में भी दरार दिखाई देने लगी.
दिसंबर 2024 में अकाल तख्त ने सुखबीर बादल को तनखैया घोषित किया.
बादल से व्यक्तिगत रूप से पेश होने और माफी मांगने को कहा. जब धार्मिक सजा पूरी करने के लिए वह स्वर्ण मंदिर परिसर में मौजूद थे, तभी दिसंबर 2024 में उन पर जानलेवा हमला हुआ. एक पूर्व उग्रवादी ने गुरुद्वारे के बाहर बेहद करीब से उन पर गोली चलाने की कोशिश की.
अगस्त 2026 में महाराष्ट्र स्थित पांचवें तख्त नांदेड़ साहिब के पास उन पर फिर कृपाण से हमला किया गया.

सुखबीर सिंह बादल के परिवार की फाइल फोटो
बादल परिवार के लिए 2022 का चुनावी झटका
सुखबीर बादल की मुश्किलें 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद और बढ़ गईं.
सुखबीर बादल, उनके पिता प्रकाश सिंह बादल और साले बिक्रम सिंह मजीठिया, तीनों को अपने-अपने चुनाव क्षेत्रों में हार का सामना करना पड़ा. यह बादल परिवार के लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक दबदबे के लिए बड़ा झटका था.
करीब एक साल बाद 25 अप्रैल 2023 को प्रकाश सिंह बादल का निधन हो गया. परिवार और अकाली दल के लिए यह बड़ा नुकसान रहा. वह लंबे समय तक पार्टी और नेतृत्व के लिए सबसे बड़ा सहारा थे.
अब एक तरफ 2015 की बेअदबी का अनसुलझा राजनीतिक बोझ है, तो दूसरी ओर अकाली दल की सिख पंथ पर कमजोर होती पकड़ और तीसरी तरफ बादल परिवार का पहले जैसा नहीं रहा राजनीतिक दबदबा- इन सब ने एक साथ मिलकर सुखबीर सिंह बादल को पंजाब की राजनीति में पहले के मुकाबले कहीं अधिक अकेला कर दिया है.
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