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पंजाब चुनाव 2027: क्या बीजेपी और अकाली दल फिर आएंगे साथ, अगर आ गए तो वोट कहां से लाएंगे

अमिताभ तिवारी
  • ब्लॉग,
  • Updated:
    अगस्त 14, 2026 19:04 pm IST
    • Published On अगस्त 14, 2026 19:04 pm IST
    • Last Updated On अगस्त 14, 2026 19:04 pm IST
पंजाब चुनाव 2027: क्या बीजेपी और अकाली दल फिर आएंगे साथ, अगर आ गए तो वोट कहां से लाएंगे

पंजाब में विधानसभा चुनाव अगले साल होने हैं. उससे पहले शिरोमणि अकाली दल के दोबारा एनडीए में शामिल होने की अटकलें तेज हो गई हैं. कुछ दिन पहले सुखबीर बादल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मुलाकात के बाद इन अटकलों को और बल मिला है.

अकाली दल और बीजेपी ने करीब 25 साल तक पंजाब में गठबंधन में रहे. दोनों ने 1997, 2007 और 2012 के विधानसभा चुनाव साथ जीते थे. यह गठबंधन पंजाब की सामाजिक संरचना के हिसाब से स्वाभाविक भी माना जाता था. अकाली दल मुख्य रूप से सिख समुदाय और बीजेपी हिंदू समुदाय का प्रतिनिधित्व करती थी. पंजाब की आबादी में करीब 58 फीसद सिख और 38 फीसद हिंदू हैं. लेकिन 2019 में केंद्र सरकार के कृषि कानूनों को लेकर दोनों के रिश्तों में तनाव आया. पंजाब के किसान, जिनमें बड़ी संख्या सिख हैं, वो इन कानूनों के खिलाफ थे. अकाली दल को डर था कि इससे उसका मुख्य जाट सिख वोट बैंक उससे दूर हो सकता है. इसलिए सितंबर 2020 में उसने बीजेपी से गठबंधन तोड़ लिया.

अकाली दल ने केंद्र की बीजेपी सरकार से कहा था कि किसानों की सभी चिंताओं का समाधान होने तक इन कानूनों को संसद में पेश न किया जाए. लेकिन जब केंद्र ने उसकी बात नहीं मानी तो हरसिमरत कौर बादल ने विरोध में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया.

पंजाब का मामला थोड़ा अलग है. सिख समुदाय पूरे भारत में अल्पसंख्यक है, लेकिन पंजाब में बहुसंख्यक है. यही स्थिति पंजाब और केंद्र के बीच राजनीतिक तनाव का एक बड़ा कारण रही है. खासकर 1984 में स्वर्ण मंदिर में हुई सैन्य कार्रवाई के बाद केंद्र सरकार के प्रति पंजाब में गुस्सा काफी बढ़ा था. सिख राजनीति में क्षेत्रीय पहचान का महत्व बहुत ज्यादा है. पंजाब के लोग नहीं चाहते कि उनके राजनीतिक भविष्य का फैसला दूर बैठे दिल्ली के लोग करें.

अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन टूटने का असर क्या हुआ

गठबंधन टूटने के बाद 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में अकाली दल और बीजेपी दोनों को नुकसान हुआ.

अकाली दल को 2017 के चुनाव में 15 सीटें मिली थीं, जो 2022 में घटकर तीन रह गईं. बीजेपी की सीटें भी तीन से  घटकर दो रह गईं. 2022 का चुनाव पूरी तरह से आम आदमी पार्टी के पक्ष में चला गया. उसने 117 में से करीब 80 फीसद सीटें जीत लीं.वोट शेयर पर नजर डालें तो अकाली दल का वोट शेयर 25.2 फीसद से गिरकर 18.5 फीसद रह गया. यानी उसे 6.7 फीसद का नुकसान हुआ. इसके उलट बीजेपी का वोट शेयर 5.4 फीसद से बढ़कर 6.7 फीसद हो गया.

गठबंधन टूटने का सबसे बड़ा नुकसान अकाली दल को हुआ. उसका मुख्य जाट सिख और पंथक वोट उससे दूर चला गया.
वहीं बीजेपी अकेले चुनाव लड़कर भी हिंदू वोटों को अपने पक्ष में लाने में सफल रही. हिंदू उच्च जातियों का बीजेपी को समर्थन 2017 के सात फीसद से बढ़कर 2022 में 20 फीसद हो गया. वहीं हिंदू ओबीसी में उसका समर्थन 6 फीसद से बढ़कर 16 फीसद और अनुसूचित जाति के हिंदू का समर्थन 9 फीसद से बढ़कर 10 फीसद हो गया. वहीं दूसरी तरफ अकाली दल का जाट सिख समर्थन 38 फीसद से घटकर 26 फीसद और दलित सिख समर्थन 35 फीसद से घटकर 18 फीसद रह गया.

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Photo Credit: AI Generated Images

लोकसभा चुनाव में कैसा रहा दोनों दलों का प्रदर्शन

लोकसभा चुनाव में भी कुछ ऐसा ही हुआ, लेकिन अंतर ज्यादा था. साल 2019 के चुनाव में अकाली दल ने दो लोकसभा सीटें जीती थीं, लेकिन 2024 में वह केवल एक सीट ही बचा पाई. वहीं बीजेपी ने अपनी दोनों सीटें गंवा दीं. अकाली दल का वोट शेयर 27.5 फीसद से गिरकर 13.5 फीसद रह गया. इसका एक कारण यह भी था कि अकाली दल का पंथक वोट और कमजोर हुआ. उसका एक हिस्सा निर्दलीय उम्मीदवारों की ओर चला गया. बाद में इन्हीं ताकतों से अकाली दल (वारिस पंजाब दे) सामने आया. वहीं इसके उलट बीजेपी का वोट शेयर 9.6 फीसद से बढ़कर 18.7 फीसद हो गया. यानी उसे 9.1 फीसद का फायदा हुआ.

लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर अधिक केंद्रित होते हैं. इसके साथ ही पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार के खिलाफ नाराजगी और हिंदू वोटों के बीजेपी के पक्ष में एकजुट होने से भी बीजेपी को फायदा मिला. साल 2022 में बीजेपी को समर्थन देने वाले हिंदू उच्च जाति के मतदाताओं का हिस्सा 20 फीसद था, जो 2024 में बढ़कर 56 फीसद हो गया. विधानसभा क्षेत्रों के हिसाब से बीजेपी 23 सीटों पर आगे रही, जबकि अकाली दल 9 सीटों पर. यानी दोनों मिलकर 32 विधानसभा सीटों पर आगे थे. साल 2022 की तुलना में यह 27 सीटों की बढ़ोतरी थी.

यही वजह है कि दोनों दलों को फिर से साथ आने और 2027 का विधानसभा चुनाव गठबंधन में लड़ने की मांग तेज हुई.

अगर अकाली दल और बीजेपी का गठबंधन नहीं टूटा होता तो

अगर 2022 में अकाली दल-बीजेपी गठबंधन नहीं टूटा होता तो? 2022 के चुनाव में अकाली दल और बीजेपी के वोट पूरी तरह एक-दूसरे को ट्रांसफर होते. ऐसे में दोनों मिलकर 117 में से 16 सीटें जीत सकते थे. लेकिन दोनों केवल पांच सीटें ही जीत पाईं. लेकिन इससे आम आदमी पार्टी की सरकार बनने से नहीं रुकती. आप फिर भी करीब 86 सीटें जीत सकती थी.अगर दोनों दलों के बीच सिर्फ 50 फीसद वोट ट्रांसफर होता, तब भी गठबंधन करीब 9 सीटें जीत सकता था. 

साल 2024 लोकसभा चुनाव में गठबंधन का फायदा और बड़ा होता. अगर इस चुनाव में अकाली दल और बीजेपी के वोट पूरी तरह एक-दूसरे को मिले होते, तो दोनों मिलकर 13 में से 6 लोकसभा सीटें जीत सकते थे. लेकिन दोनों दल मिलकर केवल एक सीट जीत पाए. इस स्थिति में अकाली दल-बीजेपी गठबंधन पंजाब में सबसे बड़ा गठबंधन बन सकता था.इस गठबंधन को सबसे ज्यादा फायदा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाकर होता. अगर सिर्फ 50 फीसद वोट ही एक-दूसरे को ट्रांसफर होते, तब भी दोनों दल 5 सीटें जीत सकते थे.

2020 में कृषि कानूनों के मुद्दे पर अकाली दल का एनडीए छोड़ना बीजेपी की तुलना में अकाली दल के लिए ज्यादा नुकसानदायक साबित हुआ. बीजेपी ने गठबंधन टूटने के बाद हिंदू वोटों को अपने पक्ष में काफी हद तक एकजुट कर लिया. लेकिन पंजाब में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, इसलिए ज्यादा वोट मिलने के बावजूद बीजेपी उन्हें सीटों में नहीं बदल पाई. दोनों दल अगर दोबारा साथ आते हैं तो खासकर 2024 के चुनाव जैसे हालात में कई खोई हुई सीटें वापस हासिल कर सकते हैं. हालांकि 2022 में आम आदमी पार्टी की मजबूत स्थिति को देखते हुए गठबंधन अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में नहीं पहुंचता.

अकाली दल और बीजेपी के गठबंधन की जरूरत क्यों है?

अकाली दल इस समय अपने अस्तित्व के संकट से गुजर रहा है. पार्टी के कुछ पुराने नेताओं को सुखबीर बादल के नेतृत्व पर भरोसा नहीं है. उनका मानना है कि सुखबीर अपने दिवंगत पिता प्रकाश सिंह बादल जैसी राजनीतिक पकड़ नहीं बना पाए हैं.
अकाल तख्त के पूर्व जत्थेदार ज्ञानी हरप्रीत सिंह के नेतृत्व में एक गुट अकाली दल (सुधार लहर) के नाम से अकाली दल की पुरानी विचारधारा और मूल्यों को वापस लाने की बात कर रहा है. वहीं दूसरी ओर अमृतपाल सिंह ने खडूर साहिब लोकसभा सीट से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर जीत हासिल की. जेल में रहते हुए भी उन्होंने चुनाव जीता. उन्होंने अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का गठन किया. उनकी नजर उन पंथक सिख मतदाताओं पर है, जो अकाली दल से नाराज हैं.

पंजाब में बीजेपी की मुश्किलें क्या हैं

बीजेपी ने पूर्व मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को अपने में शामिल किया है और पंजाब में हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत की है. लेकिन कृषि कानूनों के कारण किसानों में बीजेपी के प्रति पैदा हुआ अविश्वास अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. पंजाब के ज्यादातर किसान सिख हैं, जबकि हिंदू समुदाय में बड़ी संख्या व्यापारियों और छोटे कारोबारियों की है. इसलिए आने वाले चुनाव में सिख वोटों का बड़ा हिस्सा बीजेपी के पक्ष में जाने की संभावना अभी कम दिखाई देती है. 

वहीं दूसरी ओर आम आदमी पार्टी सरकार के प्रति भी लोगों में नाराजगी है. बाढ़ से निपटने के तरीके, किसानों की समस्याओं और नशे के मुद्दे को लेकर सरकार की आलोचना हो रही है. लेकिन विपक्ष के वोट बंटने का फायदा आम आदमी पार्टी को मिल रहा है. वह 40 फीसद से कम वोट शेयर के बावजूद उपचुनाव जीतने में सफल रही है. इसलिए अगर अकाली दल और बीजेपी को आम आदमी पार्टी सरकार के खिलाफ बनी नाराजगी का फायदा उठाना है तो दोनों का साथ आना जरूरी है. अन्यथा दोनों का अलग-अलग चुनाव लड़कर जीत पाना मुश्किल होगा.

लेकिन असली सवाल यह है कि क्या दोनों के बीच 'केमिस्ट्री' बन पाएगी? बीजेपी के एक वर्ग को लगता है कि गठबंधन से उसे ज्यादा फायदा नहीं होगा. उसे आशंका है कि अकाली दल के सिख वोट बीजेपी को पूरी तरह ट्रांसफर नहीं होंगे, जबकि बीजेपी के हिंदू वोट अकाली दल को आसानी से मिल सकते हैं.वहीं दूसरी चिंता यह है कि जाट सिख और पंथक वोटों पर अकाली दल की पकड़ भी पहले जैसी नहीं रही है. इन वोटों के लिए अब कई दूसरे राजनीतिक खिलाड़ी मैदान में हैं. इसलिए गणित अकाली दल और बीजेपी के दोबारा साथ आने के पक्ष में है, लेकिन दोनों दलों के बीच राजनीतिक तालमेल यानी 'केमिस्ट्री' अभी साफ नहीं है.

(डिस्क्लेमर: लेखक एक राजनीतिक टिप्पणीकार और चुनाव विश्लेषक हैं. वो इनवेस्टमेंट बैंकर के रूप में भी काम कर चुके हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं, उनसे एनडीटीवी का सहमत या असहमत होना जरूरी नहीं है.)

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