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CAPF vs IPS: प्रमोशन, पावर की इस खींचतान में केंद्र के नए बिल से घमासान

केंद्रीय बलों (CAPF) में IPS की नियुक्ति का विवाद बढ़ता जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने CAPF के हक में फैसला सुनाया था. लेकिन अब सरकार एक नया बिल लेकर आ रही है, जिससे IPS की नियुक्ति का रास्ता साफ हो जाएगा. क्या है पूरा विवाद? समझते हैं.

CAPF vs IPS: प्रमोशन, पावर की इस खींचतान में केंद्र के नए बिल से घमासान
सांकेतिक तस्वीर. (AI Generated Image)
  • CAPF में IPS अधिकारियों की डेप्युटेशन तैनाती से कैडर अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर सीमित हो जाते हैं
  • सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि CAPF में IPS अधिकारियों के कोटे को धीरे-धीरे कम किया जाए
  • CAPF के कैडर अधिकारियों को DIG रैंक तक पहुंचने में IPS अधिकारियों की तुलना में कई वर्षों का अधिक समय लगता है
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केंद्रीय बलों (CAPF) में IPS की नियुक्ति को लेकर एक विवाद सालों से चला आ रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में केंद्रीय बलों के हक में फैसला सुनाया. लेकिन केंद्र सरकार अब एक बिल ला रही है जिसे लेकर CAPF का कहना है कि अगर ये पास हुआ तो उनके अधिकारियों के लिए प्रमोशन के अवसर कम हो जाएंगे और सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी कोई मतलब नहीं रह जाएगा. क्या है ये पूरा मामला? विवाद किस बात पर है? CAPF की मांगें क्या हैं? सुप्रीम कोर्ट का फैसला क्या था? और केंद्र सरकार क्या करने जा रही है? आइये समझते हैं...

इस कहानी के 4 किरदार

  • CAPF: केंद्रीय सशस्त्र बल. इसका कहना है कि सरकारें IPS को डेप्युटेशन पर भेजकर CAPF में अधिकारी बना देती है, जिससे उनके लिए मौके कम हो जाते हैं.
  • IPS: केंद्र सरकार CAPF में IPS को डेप्युट करके भेजती है. ये IPS अधिकारी CAPF में जाकर डीआईजी या डीजी बन जाते हैं.
  • सुप्रीम कोर्ट: 2019 और 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने CAPF की मांगों को वाजिब ठहराते हुए फैसला दिया था. कोर्ट ने कहा था कि IPS का इन बलों में कोटा कम किया जाए.
  • केंद्र सरकार: नया बिल लाने जा रही है ताकि CAPF में IPS की तैनाती की जा सके. सरकार अब IPS के डेप्युटेशन को स्थायी करने के लिए बिल ला रही है.

क्या है पूरा मामला?

CAPF में 6 तरह के केंद्रीय बल आते हैं. बॉर्डर और आंतरिक सुरक्षा CAPF ही संभालती है. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद से लड़ाई में CRPF (सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स) और सीमाओं पर BSF (बॉर्डर सिक्योरिटी फोर्स) तैनात रहती है. चीन की सीमा पर ITBP (इंडो-तिब्बत बॉर्डर पुलिस) मोर्चा संभालती है. वहीं, एयरपोर्ट, मेट्रो स्टेशनों और सरकारी संस्थानों की सुरक्षा CISF (सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स) के जिम्मे है.

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विवाद की जड़ क्या?

यह पूरा विवाद CAPF बनाम IPS का है. दरअसल, CAPF में दो तरह के अधिकारी होते हैं. पहले- IPS यानी इंडियन पुलिस सर्विस के अधिकारी. इन्हें सरकार डेप्युटेशन पर कुछ समय के लिए CAPF में भेजती है. और दूसरे- कैडर अधिकारी जो CAPF में सीधे भर्ती होते हैं. कैडर अधिकारियों की भर्ती UPSC की ओर से आयोजित CAPF (AC) एग्जाम के जरिए होती है.

CAPF का कहना है कि ऊंचे पदों पर अक्सर IPS अधिकारियों की तैनाती होती है. खासकर IG या उससे ऊपर की रैंक पर. इस वजह से कैडर अधिकारियों के प्रमोशन के मौके कम हो जाते हैं. साथ ही कैडर अधिकारियों के प्रमोशन में 10-15 साल का समय लग जाता है, जिससे ये उनके प्रमोशन में एक 'रोडब्लॉक' की तरह काम करता है.

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प्रमोशन पर कैसे पड़ता है असर?

इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी जड़ 'प्रमोशन' है. एक IPS अधिकारी आमतौर पर 13-14 साल की सेवा में DIG रैंक तक पहुच जाता है. वहीं, CAPF के कैडर अधिकारी को उसी DIG रैंक तक पहुंचने में 25 से 30 साल लग जाते हैं.

डेटा के मुताबिक, CRPF और BSF जैसे बलों में लगभग 60% से ज्यादा कैडर अधिकारी असिस्टेंट कमांडेंट (AC) के पद पर भर्ती होने के बाद 10-12 साल तक उसी रैंक पर बने रहते हैं, जबकि IPS इसी दौरान दो प्रमोशन पा चुके होते हैं.

इसका नतीजा क्या...?

प्रमोशन के इंतजार में CAPF के कैडर अधिकारी सालों गुजार देते हैं. कई बार तो कोई प्रमोशन भी नहीं मिलता है. आंकड़े बताते हैं कि CAPF में 'वॉलेंटियरी रिटायरमेंट' यानी VRS लेने वाले अधिकारियों की संख्या में पिछले 5 साल में 25% की बढ़ोतरी देखी गई है, जिसका बड़ा कारण प्रमोशन में देरी है. पिछले 3 साल में CAPF के 20 हजार से ज्यादा जवानों और अधिकारियों ने VRS ले लिया है या इस्तीफा दे दिया है.

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सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया था?

IPS अधिकारियों की नियुक्ति से CAPF में कैडर अधिकारियों का प्रमोशन लगभग ठहर सा गया. 15-15 सालों से अधिकारी अपने पहले प्रमोशन का इंतजार ही कर रहा है. इससे ये लड़ाई CAPF बनाम IPS की बन गई.

इसे लेकर CAPF के कैडर अधिकारियों ने नॉन-फंक्शनल फाइनेंशियल अपग्रेडेशन (NFFU) और ऑर्गनाइज्ड ग्रुप 'ए' सर्विसेज (OGAS) की मांग की थी. NFFU का मतलब ये है कि अगर किसी अधिकारी को पद खाली न होने के कारण प्रमोशन नहीं मिलता है तो उसे उसके बैच के सबसे सीनियर प्रमोटेड अफसर के बराबर सैलरी दी जाती है.

2019 में सुप्रीम कोर्ट का एक फैसला आया. अब तक CAPF कैडर अधिकारी सेवा शर्तों में सुधार की मांग कर रहे थे. लेकिन 2019 के फैसले के बाद IPS अधिकारियों का रवैया बदल गया. इससे कैडर अधिकारियों की स्थिति और खराब हो गई.

फिर 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने एक और फैसला दिया और साफ किया कि CAPF एक 'OGAS' है. कोर्ट ने आदेश दिया कि शीर्ष पदों पर IPS का कोटा कम किया जाए ताकि कैडर अधिकारियों का मनोबल न गिरे. इस कोटा को सुप्रीम कोर्ट ने 2 साल के अंदर धीरे-धीरे कम करने का आदेश दिया था. कोर्ट का मकसद था कि CAPF के अपने अधिकारियों को ज्यादा मौके मिलें.

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अब सरकार क्या करने जा रही है?

सरकार अब एक नया बिल लेकर आ रही है. इस प्रस्तावित बिल का नाम 'केंद्रीय सशस्त्र बल (सामान्य प्रशासन) बिल' है. सीएपीएफ का कहना है कि इस बिल के जरिए सरकार सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को बेअसर करना चाहती है जिसमें IPS कोटा कम करने की बात कही गई थी.

सीएपीएफ के मुताबिक प्रस्तावित बिल CAPF में प्रशासनिक नियंत्रण और और ज्यादा केंद्रीकृत कर सकता है, जिससे कैडर अधिकारियों के प्रमोशन पर उल्टा असर पड़ेगा. इससे न सिर्फ कैडर अधिकारियों के लिए DIG और IG के पद सीमित हो जाएंगे, बल्कि DG या स्पेशल DG तक पहुंचने के रास्ते लगभग बंद हो जाएंगे.

 अब आगे क्या?

सरकार इस बिल को संसद में लाने की तैयारी कर रही है. हालांकि, इस पर काफी विवाद भी हो रहा है. आज आरजेडी सांसद मनोज झा नें भी यह मुद्दा उठाया. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे नें प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है. वहीं, नेता विपक्ष राहुल गांधी ने सहायक कमांडेंट अजय मलिक से मुलाकात की है. अजय मलिक एक ऑपरेशन के दौरान घायल हो गए थे और दिल्ली में उनका इलाज चल रहा है. राहुल गांधी ने कहा है कि वह इस मामले को संसद में उठाएंगे. अब अगर यह बिल संसद में आता है और पास होता है तो जाहिर तौर पर इससे CAPF पर असर पड़ेगा.

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