एक बेहद मामूली सी चीज प्लास्टिक की पानी की एक बोतल. वही बोतल, जिसे आप और हम हर दिन देखते हैं. एयरपोर्ट के लाउंज से लेकर होटल के मिनी बार और सुपरमार्केट तक. लेकिन क्या आप जानते हैं? पूरी दुनिया में बिकने वाली हर पांच में से एक प्लास्टिक की बोतल इसी कंपनी के कारखानों में ढलती है. कंपनी का नाम है इंडोरामा वेंचर्स (Indorama Ventures) और इसके पीछे दिमाग है एक हिंदुस्तानी का. नाम है आलोक लोहिया. वे पिछले 40 सालों से भारत में नहीं, बैंकॉक में बैठकर अपना कारोबार चला रहे हैं. लेकिन भारत में कम लोग ही उनके बारे में जानते हैं.
फोर्ब्स की लिस्ट में थाईलैंड के सबसे रईस लोगों में शुमार, करीब 1.7 बिलियन डॉलर की निजी दौलत और 13-14 अरब डॉलर का सालाना टर्नओवर. लेकिन यह सिर्फ एक इंसान की नहीं, बल्कि तीन भाइयों की वो दास्तान है, जिन्होंने एशिया के तीन अलग-अलग मुल्कों में बैठकर देसी कारोबारी हुनर का डंका बजाया. आज कहानी उसी 'साइलेंट टाइकून' की, जो शायद भारत का सबसे कम चर्चा में रहने वाला अरबपति है.
लाइसेंस राज का दौर और सरहद पार का दांव
27 नवंबर 1958, कोलकाता का एक मारवाड़ी कारोबारी परिवार. पिता मोहनलाल लोहिया के घर जन्मे आलोक तीन भाइयों में सबसे छोटे थे. बड़े भाई श्री प्रकाश (एसपी) लोहिया और मंझले ओम प्रकाश लोहिया.
मारवाड़ी परिवारों की एक पुरानी रिवायत रही है. बचपन से ही बही-खाता, भरोसे की परख और नफा-नुकसान का पाठ पढ़ाना. लेकिन पिता मोहनलाल लोहिया की नजरें हिंदुस्तान की सरहदों से कहीं आगे देख रही थीं.

70 का वो दौर, जब देश में 'लाइसेंस राज' की बेड़ियां थीं. छोटी-छोटी मंजूरी के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने पड़ते थे. ऐसे में 1973 में मोहनलाल ने एक बड़ा जोखिम उठाया. वे बड़े बेटे श्री प्रकाश के साथ इंडोनेशिया चले गए. उस वक्त साउथ-ईस्ट एशिया विदेशी निवेशकों के लिए पलक-पावड़े बिछा रहा था. सस्ता कच्चा माल, सस्ते कारीगर और खुली नीतियां.
1975 में नींव पड़ी इंडोरामा सिंथेटिक्स की. नाम का खेल देखिए 'इंडो' यानी इंडोनेशिया और 'रामा' यानी भारत की सांस्कृतिक विरासत. दोनों मुल्कों को जोड़ता एक नाम. देखते ही देखते कंपनी इंडोनेशिया की दिग्गज टेक्सटाइल कंपनियों में शुमार हो गई.
बड़े भाई का साया छोड़, खुद की राह
इसी बीच बड़े भाई श्री प्रकाश लोहिया का रिश्ता स्टील किंग लक्ष्मी निवास मित्तल की बहन सीमा मित्तल से हुआ. यानी दो बड़े कारोबारी घराने आपस में रिश्तेदार बन गए. बड़े भाई श्री प्रकाश इंडोनेशिया के अमीर शख्सियतों में शुमार हैं.

पत्नी के साथ श्री प्रकाश लोहिया, आलोक लोहिया के बड़े भाई.
लेकिन आलोक लोहिया की मंजिल कुछ और थी. करीब 8 साल उन्होंने इंडोनेशिया में बड़े भाई के साथ बतौर फाइनेंस डायरेक्टर काम किया. पर 28-29 साल की उम्र में उनके भीतर एक बेचैनी थी, 'अगर यहीं रहा, तो जिंदगी भर सिर्फ एसपी का छोटा भाई कहलाऊंगा.'
उन्होंने अपनी तकदीर खुद लिखने की ठानी. 1988 में 30 साल की उम्र में आलोक लोहिया बैंकॉक पहुंचे. नया शहर, अजनबी भाषा, लेकिन दिमाग वही मारवाड़ी. उन्होंने शुरू की इंडोरामा केमिकल्स. मक्के के भुट्टे के वेस्ट से केमिकल बनाना शुरू किया. कोई हार्वर्ड या व्हार्टन की डिग्री नहीं थी, था तो बस जमीन से जुड़ा कारोबारी तजुर्बा.
उनका फलसफा एकदम साफ था. जहां कच्चा माल कौड़ियों के भाव मिले, वहां फैक्ट्री लगाओ. जहां खरीदार बड़ा हो, वहां माल बेचो और बीच का मुनाफा अपनी जेब में डालो.
इसी सोच के तहत उन्होंने 1994 में थाईलैंड जैसे गर्म मुल्क में ऊन प्रोसेसिंग (Indorama Holdings) शुरू की. लोग हैरान थे, पर आलोक का निशाना था यूरोप, जापान और कोरिया का एक्सपोर्ट मार्केट.
1995: वो टर्निंग पॉइंट जिसने सब बदल दिया
1995 में आलोक लोहिया ने वो कदम उठाया जिसने पैकेजिंग इंडस्ट्री की दिशा बदल दी. उन्होंने शुरू की इंडोरामा पॉलीमर्स.
यह वही दौर था जब दुनिया कांच की बोतलों से निकलकर PET (Polyethylene Terephthalate) प्लास्टिक की तरफ भाग रही थी. पानी, कोल्ड ड्रिंक, शैम्पू, खाने का तेल, हर चीज प्लास्टिक में पैक होने लगी थी. आलोक ने भांप लिया कि यह 'वॉल्यूम' का खेल है. मार्जिन कम है, तो स्केल इतना बड़ा करो कि कोई मुकाबला ही न कर सके.

इसके बाद शुरू हुआ अधिग्रहणों (Acquisitions) का ऐसा सिलसिला जो थमा नहीं.
2003: अमेरिकी बाजार में धमाकेदार एंट्री.
2006: यूरोप के लिथुआनिया में कदम.
2010: कंपनी थाईलैंड स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्ट हुई और नाम पड़ा इंडोरामा वेंचर्स.
2011: एक ही झटके में अमेरिका, चीन, मेक्सिको और पोलैंड के प्लांट्स खरीदकर कंपनी दुनिया की नंबर-1 PET निर्माता बन गई.
2015: अमेरिकी दिग्गज हंट्समैन (Huntsman) का 2 बिलियन डॉलर का केमिकल बिजनेस अपनी झोली में डाला.
आज जब दुनिया प्लास्टिक कचरे को लेकर फिक्रमंद है, तो आलोक लोहिया की कंपनी रिसाइकिल्ड PET (rPET) की भी ग्लोबल लीडर बन चुकी है. यानी जो कंपनी सबसे ज्यादा बोतलें बनाती है, वही सबसे ज्यादा रिसाइकिल भी करती है.
अगर मित्तल और लोहिया परिवार के ग्लोबल कारोबार को जोड़ दें, तो यह आंकड़ा 100 अरब डॉलर (करीब 9 लाख करोड़ रुपये) के पार बैठता है. यह भारत से बाहर बसे 'प्रवासी भारतीयों' की वो ताकत है जिसकी चर्चा मेनस्ट्रीम मीडिया में कभी नहीं होती.
35 साल बाद 'घर वापसी'
कहानी का सबसे दिलचस्प मोड़ अब आया है. जो आलोक लोहिया 35 साल पहले भारत से निकले थे, वे अब देश के पैकेजिंग बाजार पर छाने लौट आए हैं.
इंडोरामा वेंचर्स ने भारत की दिग्गज लैमिनेटेड ट्यूब निर्माता EPL Limited (पहले एस्सेल प्रोपैक) के साथ करीब 1.9 बिलियन डॉलर का बड़ा मर्जर किया है. अब कोलगेट हो, पेप्सोडेंट, हिमालया, पॉन्ड्स या लॉरियल. आपके घर के वॉशबेसिन और ड्रेसिंग टेबल पर रखी टूथपेस्ट या क्रीम की ट्यूब असल में आलोक लोहिया के इसी साम्राज्य की देन है.
NDTV.in पर ताज़ातरीन ख़बरों को ट्रैक करें, व देश के कोने-कोने से और दुनियाभर से न्यूज़ अपडेट पाएं