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अयोध्या में पवन पांडेय के जरिए अखिलेश यादव ने कौन सा दांव चला, क्या ब्राह्मण आएंगे उनके साथ

सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने उम्मीद जताई है कि विधानसभा चुनाव में अयोध्या सीट पर पवन पांडेय की जीत होगी. उनकी इस घोषणा को पवन पांडेय की उम्मीदवारी की घोषणा माना जा रहा है. आइए जानते हैं कि इसके पीछे अखिलेश की रणनीति क्या है.

अयोध्या में पवन पांडेय के जरिए अखिलेश यादव ने कौन सा दांव चला, क्या ब्राह्मण आएंगे उनके साथ
नई दिल्ली:

उत्तर प्रदेश में विधानसभा के चुनाव अगले साल होने हैं. लेकिन प्रदेश में चुनाव की तपिश अभी से महसूस की जा रही है. समाजवादी पार्टी ने बुधवार को लखनऊ में जनेश्वर मिश्र की जयंती मनाई. मिश्र समाजवादी पार्टी के संस्थापक नेताओं में शामिल रहे हैं. सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने इस अवसर का प्रयोग ब्राह्मणों को रिझाने के लिए किया. इसी कार्यक्रम में अखिलेश ने खुलासा किया कि उनके पीडीए फार्मूला में 'पी' का मतलब पंडित है. इसके साथ ही उन्होंने एक भविष्यवाणी भी कर दी. उन्होंने कहा कि अयोध्या से पवन पांडेय भारी मतों से जीतकर आएंगे. उनके इस बयान को अयोध्या से पवन पांडेय की उम्मीदवारी की घोषणा के रूप में देखा गया. पवन पांडेय को 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए सपा का पहला घोषित उम्मीदवार माना जा रहा है. अखिलेश यादव की ही तरह बसपा प्रमुख मायावती ने भी अपने पहले उम्मीदवार के रूप में एक ब्राह्मण का ही चयन किया था. ये दोनों घोषणाएं उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटों के लिए जारी रस्साकशी के रूप में देखा जा रहा है. 

पवन पांडेय पर अखिलेश यादव ने क्या कहा है

जनेश्वर मिश्र की जयंती पर पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में सपा प्रमुख ने कहा,''अयोध्या से पवन पांडेय भारी मतों से जीतकर आएंगे.'' सपा ने अभी तक यूपी की किसी भी विधानसभा सीट पर उम्मीदवार के नाम का ऐलान औपचारिक तौर पर नहीं की है. ऐसे में अखिलेश यादव ने प्रतिष्ठित सीटों में शुमार अयोध्या से पवन पांडेय के लिए जीत का भरोसा जताना काफी अहम माना जा रहा है.इस घोषणा का समय भी काफी महत्वपूर्ण है. दरअसल अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे की हुई कथित चोरी का मामला इन दिनों गरमाया हुआ है. सपा इस मामले को जोर-शोर से उठा रही. सपा के सांसद संसद के शीतकालीन सत्र के पहले दिन से ही इस मुद्दे को गरमाए हुए हैं. वहीं उत्तर प्रदेश विधानसभा का सत्र बीते दिनों तय समय से पहले इस वजह से खत्म हो गया कि सपा के विधायक कथित चढ़ावा चोरी के मुद्दे को लेकर सदन और सदन के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे. 

साल 2024 के चुनाव में अखिलेश यादव ने अयोध्या में एक बड़ा सामाजिक प्रयोग किया था. उन्होंने सामान्य सीट पर दलित समाज से आने वाले अवधेश प्रसाद को टिकट दे दिया था. उन्होंने वहां बीजेपी के सीटिंग सांसद रहे लल्लू सिंह को हरा दिया था. अवधेश प्रसाद की इस जीत का चर्चा देश-विदेश में हुई थी. उसी अयोध्या विधानसभा सीट के लिए सपा ने सबसे पहले अपने उम्मीदवार के नाम का ऐलान किया है. पवन पांडेय के नाम से मशहूर तेज नारायण पांडेय पवन ने  2012 के विधानसभा चुनाव में अयोध्या से पांच बार के विधायक लल्लू सिंह को हराया था. 

क्या ब्राह्मणों को अपने पाले में कर पाएंगे अखिलेश यादव

जनेश्वर मिश्र की जयंती पर पवन पांडेय की उम्मीदवारी की घोषणा कर अखिलेश यादव ने ब्राह्मण वोटों में सेंध लगाने की कोशिश की है. दरअसल सपा ब्राह्मणों को अपने पाले में करने की कोशिशें लगातार कर रही है. प्रयागराज में आयोजित माघ मेले में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुई कथित अभद्रता और ब्राह्मण बटुकों की चोटी पकड़कर खींचे जाने को सपा ने मुद्दा बना लिया था. उसके बाद से अखिलेश यादव और शंकराचार्य की दो बार मुलाकात हो चुकी है. राजनीतिक विश्लेषकों ने भी इन मुलाकातों के पीछे राजनीति तलाशने की कोशिश की थी. इसे भी ब्राह्मणों को रिझाने की कोशिश के तौर पर देखा गया था. जनेश्वर मिश्र की जयंती पर अखिलेश ने कहा भी कि इतिहास में कभी भी किसी शंकराचार्य को स्नान करने से नहीं रोका गया, लेकिन हाल में ऐसी घटनाएं हुईं जहां धार्मिक गुरुओं और बटुकों का अपमान किया गया. उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी सब समझ रही है और सही समय आने पर अपने वोट से करारा जवाब देगी.

अखिलेश यादव ने प्रयागराज में माघमेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए ज्यादती को भी मुद्दा बनाया था.

अखिलेश यादव ने प्रयागराज में माघमेले के दौरान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए ज्यादती को भी मुद्दा बनाया था.

ब्राह्मणों को अपने पाले में करने की कोशिश केवल सपा ही नहीं कर रही है. बसपा भी इस काम में पीछे नहीं है. बसपा ने इस साल फरवरी में जालौन जिले की माधौगढ़ सीट से आशीष पांडेय को प्रभारी बनाने की घोषणा की थी. दरअसल बसपा में प्रभारी ही प्रत्याशी बनता है. एक तरह से बसपा ने भी 2027 के चुनाव के लिए अपने पहले उम्मीदवार के रूप में एक ब्राह्मण को ही चुना था. दरअसल बसपा ने 2007 का चुनाल ब्राह्मण-दलित और मुसलमान वोटों के सहारे ही जीता था.उस चुनाव में उसने 86 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे. उसे उम्मीद है कि यह फार्मूला उसे फिर सत्ता दिला सकता है. 

क्या कहते हैं आंकड़े

सपा-बसपा की कोशिशों के बीच लेकिन आंकड़े कुछ और ही गवाही देते हैं. सीएसडीएस-लोकनीति के सर्वे के मुताबिक 2022 विधानसभा चुनाव में ब्राह्मण, राजपूत और वैश्य जैसे सवर्ण मतदाताओं में से 79 फीसद ने एनडीए को वोट दिया था. जबकि विपक्षी गठबंधन को केवल 16 फीसद वोट मिले थे. 2024 के लोकसभा चुनाव में भी यह समर्थन करीब-करीब बना रहा. साल 2022 के विधानसभा चुनाव में सपा के नेतृत्व वाले गठबंधन ने 40 ब्राह्मण उम्मीदवार उतारे थे. वहीं बीजेपी ने 68 ब्राह्मणों को मैदान में उतारा था. बीजेपी ने सबसे अधिक टिकट ब्राह्मण को दिए थे. बसपा ने भी अपने महासचिव सतीश चंद्र मिश्र के जरिए ब्राह्मणों को जोड़ने का अभियान चलाया था.लेकिन उनके प्रयास सफल नहीं हुए थे. उत्तर प्रदेश में सवर्ण जातियों को बीजेपी की परंपरागत समर्थक माना जाता है. उत्तर प्रदेश में भले ही ब्राह्मण आबादी करीब 10 फीसदी मानी जाति है. उनकी सत्ता पर पकड़ रही है. यही वजह है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्रियों में से छह ब्राह्मण थे. कांग्रेस के एनडी तिवारी प्रदेश के अंतिम ब्राह्मण मुख्यमंत्री थे. उनके बाद से कोई ब्राह्मण मुख्यमंत्री नहीं बन पाया. ऐसे ब्राह्मण वोट बैंक में कौन सेंध लगा पाता है, इसके लिए हमें विधानसभा चुनाव तक इंतजार करना होगा.  

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