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This Article is From Sep 18, 2025

रात भर 65 KM पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचीं 90 स्कूली बच्चियां, उनकी थी बस इतनी सी गुजारिश 

नीले स्कूल यूनिफॉर्म में इन छात्राओं ने रविवार को न्यांगनो गांव से अपनी पैदल यात्रा शुरू की. ये बच्चियां पूरी रात चलीं और सुबह जिला मुख्यालय लेम्मी पहुंचीं.

रात भर 65 KM पैदल चलकर जिला मुख्यालय पहुंचीं 90 स्कूली बच्चियां, उनकी थी बस इतनी सी गुजारिश 
  • अरुणाचल प्रदेश के केसांग जिले की 90 छात्राओं ने शिक्षकों की कमी को लेकर लगभग पैंसठ किलोमीटर की पैदल यात्रा की.
  • छात्राओं ने भूगोल और राजनीति विज्ञान के शिक्षकों की मांग की, क्योंकि उनके स्कूल में ये शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं.
  • छात्राओं ने जिला मुख्यालय पहुंचकर अधिकारियों को अपनी समस्या बताने के लिए रात भर अंधेरे में मार्च किया.
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ईटानगर:

पढ़ने की चाहत लेकिन राह में लाख मुसीबत. अरुणाचल प्रदेश के केसांग जिले के नांग्न्यो स्थित कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय (KGBV) की 90 छात्राओं ने शिक्षकों की मांग रखने के लिए लगभग 65 किमी की पैदल यात्रा की, इन लड़कियों ने रात भर की यात्रा की और जिला मुख्यालय पहुंचीं. अंधेरे में ये लड़कियां रात भर चलती रहीं ताकि उनकी आवाज आला अफसरों तक पहुंचे.

अंधेरी रात और नीले यूनिफॉर्म में मार्च

एक अफसर ने बताया कि नीले स्कूल यूनिफॉर्म में इन छात्राओं ने रविवार को न्यांगनो गांव से अपनी पैदल यात्रा शुरू की. ये बच्चियां पूरी रात चलीं और सुबह जिला मुख्यालय लेम्मी पहुंचीं. इन लड़कियों के इस मार्च के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं.

इन स्कूली बच्चियों की शिकायत है कि उनके यहां भूगोल और राजनीति विज्ञान के शिक्षकों की कमी है. छात्राओं ने ऐसे पोस्टर पकड़े हुए थे जिन पर लिखा था 'शिक्षक के बिना एक स्कूल सिर्फ एक इमारत है'. लड़कियों का कहना है कि उनके पास कोई और चारा नहीं था. उन्‍होंने आरोप भी लगाया कि बार-बार  उन्होंने टीचर की मांग लेकिन अफसरों ने हर बार इसे अनसुना कर दिया. 
 

कौन है इसका जिम्मेदार?

शिक्षा विभाग के अफसरों ने बताया कि इन्होंने अपने पैदल मार्च के बारे में स्कूल या हॉस्टल वॉर्डन को कुछ नहीं बताया था. स्कूल प्रिंसिपल ने माना कि भूगोल और राजनीति विज्ञान के शिक्षकों की कमी है, लेकिन बाकी विषयों के लिए पर्याप्त ट्यूटर हैं. ये घटना बताती है कि 'बेटी पढ़ाओ बेटी बचाओ' जैसे नारे दिल्ली से निकलते हैं लेकिन देश के सुदूर हिस्सों में आज भी उनकी गूंजी फीकी ही रहती है.

सवाल ये है कि क्या अब प्रशासन उन अफसरों की पहचान करेगा जिनके कानों से टकरा कर इन लड़कियों की मांगे चकनाचूर हो गईं और अब इन लड़कियों को ऐसा कदम उठाना पड़ा. याद रखिए कि इन लड़कियों ने अंधेरी रात में मार्च करने का खतरा मोल लिया. इतना बड़ा कदम उठाने के बाद क्या इन लड़कियों की मांग अब पूरी होगी? 
 

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