- 27 साल पुराने टैक्स विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
- बिक्री कर पर सरचार्ज और सेस लगा सकेंगे राज्य, SC ने बरकरार रखा अधिकार
- सुप्रीम कोर्ट बोला- अतिरिक्त बिक्री कर भी बिक्री कर का ही हिस्सा
सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के कराधान अधिकारों से जुड़े 27 साल पुराने संवैधानिक विवाद का निपटारा करते हुए महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. सात जजों की संविधान पीठ ने कहा कि यदि कोई राज्य बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के रूप में अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज या सेस लगाता है तो उसका स्वरूप बिक्री कर का ही माना जाएगा. अदालत ने स्पष्ट किया कि ऐसा कर संविधान की सातवीं अनुसूची की राज्य सूची की प्रविष्टि-54 के तहत राज्यों की विधायी शक्ति के दायरे में आता है. इस फैसले को राज्यों के कराधिकार के लिए अहम माना जा रहा है.
सात जजों की संविधान पीठ ने सुनाया फैसला
मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने बुधवार को यह फैसला सुनाया. पीठ में जस्टिस के.वी. विश्वनाथन, जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी, जस्टिस जॉयमाल्य बागची, जस्टिस एन.वी. अंजारिया, जस्टिस अरुण पल्ली और जस्टिस वी. मोहन भी शामिल थे. अदालत ने राज्य सरकारों की उस विधायी शक्ति को बरकरार रखा जिसके तहत वे बिक्री कर पर अतिरिक्त बिक्री कर, सरचार्ज या सेस लगा सकती हैं. पीठ ने कहा कि यदि अतिरिक्त कर की गणना बिक्री कर की देय राशि के प्रतिशत के आधार पर की जाती है तो उसे बिक्री कर से अलग नहीं माना जा सकता. वह मूल रूप से बिक्री कर की दर में वृद्धि के समान है.
अदालत ने क्या कहा?
संविधान पीठ ने कहा कि जिन कानूनों के तहत विवादित अतिरिक्त कर लगाए गए थे, उनकी जगह अब नए कानून लागू हो चुके हैं. इसलिए मूल संदर्भ में उठाया गया प्रश्न अब व्यावहारिक महत्व नहीं रखता और काफी हद तक अकादमिक बन चुका है. हालांकि अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि पूर्व में दिए गए एस. कोदार (S. Kodar) मामले के फैसले में निर्धारित कानून आज भी प्रभावी है. उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने माना था कि अतिरिक्त बिक्री कर को केवल इसलिए असंवैधानिक नहीं कहा जा सकता क्योंकि वह मूल बिक्री कर के ऊपर लगाया गया है. उसका मूल स्वरूप बिक्री कर का ही रहता है. बेंच ने कहा कि राज्य सूची की प्रविष्टि-54 राज्यों को वस्तुओं की बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार देती है. ऐसे में बिक्री कर पर आधारित अतिरिक्त कर या सरचार्ज भी उसी श्रेणी में आएगा.
क्या था 27 साल पुराना विवाद?
विवाद की जड़ ओडिशा सेल्स टैक्स एक्ट, 1947 की धारा 5A से जुड़ी थी. इस प्रावधान के तहत कारोबारियों से अतिरिक्त बिक्री कर वसूला जाता था. इसके अनुसार 10 लाख रुपये से 1 करोड़ रुपये तक वार्षिक कारोबार वाले डीलरों पर 10 प्रतिशत अतिरिक्त कर लगाया गया था. 1 करोड़ रुपये से अधिक कारोबार वाले डीलरों पर 15 प्रतिशत अतिरिक्त कर निर्धारित था. याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राज्यों को केवल बिक्री और खरीद पर कर लगाने का अधिकार है. उनके अनुसार अतिरिक्त बिक्री कर वस्तुतः आय पर कर जैसा है, जबकि आयकर लगाने का अधिकार केवल संसद को प्राप्त है. इसी आधार पर इस कर को संवैधानिक रूप से चुनौती दी गई थी.
पुराने फैसलों से पैदा हुआ था भ्रम
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों में अलग-अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आई थीं. एस. कोदार मामले में पांच जजों की पीठ ने अतिरिक्त बिक्री कर को वैध ठहराया था और कहा था कि अतिरिक्त कर लगाने से कर का मूल चरित्र नहीं बदलता.
याचिकाकर्ताओं ने इसी फैसले का हवाला देकर अतिरिक्त बिक्री कर की वैधता पर सवाल उठाए थे. इन्हीं परस्पर कानूनी व्याख्याओं के कारण 1999 में यह मामला सात जजों की संविधान पीठ को भेजा गया था.
GST लागू होने के बाद बदल गई स्थिति
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया था कि 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद इस प्रकार के अधिकांश विवाद अप्रासंगिक हो चुके हैं. उन्होंने अदालत को यह भी बताया कि ऐसे बहुत कम मामले अब लंबित हैं. साथ ही उन्होंने नौ जजों की पीठ के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें इंडिया सीमेंट्स निर्णय के आधार को कमजोर माना गया था. सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने भी टिप्पणी की थी कि इंडिया सीमेंट्स का फैसला अब प्रभावी कानूनी स्थिति का प्रतिनिधित्व नहीं करता और एस. कोदार का सिद्धांत बाद के फैसलों में भी स्वीकार किया गया है.
टैक्स का नाम बदलने से उसकी प्रकृति नहीं बदली : कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट संदेश दिया कि किसी कर का नाम "अतिरिक्त कर", "सरचार्ज" या "सेस" रख देने मात्र से उसकी संवैधानिक प्रकृति नहीं बदल जाती. अदालत के अनुसार किसी कर की वैधता का आकलन उसके वास्तविक स्वरूप और उद्देश्य के आधार पर किया जाएगा, न कि केवल उसके नाम से.
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