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This Article is From Mar 29, 2011

चार माह के बाद गर्भपात हराम : फतवा

New Delhi: इस्लाम के भ्रूण हत्या के सख्त खिलाफ होने की परंपरा को कायम रखते हुए दारुल उलूम देवबंद ने अपने एक नए फतवे में कहा है कि तीन से चार महीने के भ्रूण में अल्लाह रूह डाल देता है और ऐसे में गर्भपात कराना हराम है, भले ही भ्रूण के अंग अविकसित ही क्यों न हों। देवबंद से पूछा गया, अगर तीन से चार महीने के भ्रूण में मस्तिष्क अविकसित पाया गया है, तो क्या गर्भपात की अनुमति है? देवबंद ने इसका जवाब दिया है, चार महीने के पहले, जब तक भ्रूण में रूह नहीं होती, बाध्यताओं की स्थिति में गर्भपात कराया जा सकता है, लेकिन भ्रूण में रूह का प्रवेश होने के बाद गर्भपात की अनुमति नहीं है। भ्रूण के चार माह का होने पर अल्लाह उसमें रूह डाल देता है। देवबंद ने हालांकि इस फतवे में चिकित्सकीय उपकरणों द्वारा दी गई जानकारी को अविश्वसनीय करार दिया है। संस्था के मुताबिक, चिकित्सक चिकित्सीय उपकरणों के माध्यम से जो जानकारी देते हैं, वह निश्चित और संपूर्ण नहीं होती, इसलिए उनके शब्दों के आधार पर कोई फैसला नहीं किया जा सकता। हालांकि इस फतवे का इस्लाम से जुड़े लोगों ने स्वागत किया है, लेकिन चिकित्सा जगत से जुड़े लोग इसमें चिकित्सीय उपकरणों को चुनौती देने से सहमत नहीं हैं। पेशे से चिकित्सक डॉ रेहाना अंसारी ने कहा, यह बात सही है कि भ्रूण हत्या नहीं करनी चाहिए, लेकिन यह भी कोई तर्क नहीं है कि भ्रूण के अविकसित होने पर भी गर्भपात नहीं कराना चाहिए। डॉ रेहाना ने कहा कि चिकित्सीय उपकरणों से मिली जानकारी 90 फीसदी सटीक साबित होती है और इसके अलावा भ्रूण की स्थिति जानने का कोई और तरीका भी नहीं है, ऐसे में यह कहना कि इन तरीकों से मिली जानकारी सटीक नहीं होती, जरा भी गले नहीं उतरता। वहीं सामाजिक कार्यकर्ता इस्माइल रहमान का मानना है कि इस्लाम में भ्रूण हत्या हराम है और ऐसे में संस्था का यह फतवा लोगों को भ्रूण हत्या से रोकने में मददगार साबित होगा। रहमान ने कहा, दुनिया के हर धर्म में भ्रूण हत्या की मनाही है और खास तौर पर इस्लाम में तो यह बिलकुल ही वर्जित है। कई बार लोग अलग-अलग बहानों से भ्रूण हत्या कराते हैं, ऐसे में देवबंद का यह फतवा उन लोगों को ऐसा करने से रोकेगा।

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