आपने अक्सर देखा होगा कि एक ही तरह की चोट लगने पर कोई इंसान दर्द से तड़प उठता है, जबकि दूसरा उसी चोट को आसानी से सह जाता है. इतना ही नहीं, एक जैसी बीमारी या घाव होने के बाद भी दो अलग-अलग लोगों के ठीक होने की रफ्तार एकदम जुदा होती है. मन में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर ऐसा क्यों होता है? साइंस की भाषा में इसका जवाब यह है कि दर्द केवल इस बात से तय नही होता कि शरीर के कितने टिशू या अंग को नुकसान पहुंचा है. दर्द असल में हमारे नर्वस सिस्टम का बनाया हुआ एक बहुत उलझा हुआ एहसास है, जिसे हमारा दिमाग, शरीर की बनावट, मन की स्थिति और हमारे आस-पास का माहौल मिलकर तय करते हैं.
जब शरीर के किसी हिस्से में चोट लगती है, तो वहां मौजूद खास नसें खतरे को भांप लेती हैं. वो रीढ़ की हड्डी के जरिए सीधे दिमाग तक करंट की तरह सिग्नल भेजती हैं. इसके बाद दिमाग यह तय करता है कि दर्द कितना बड़ा है. लेकिन इस पूरे अहसास में आपकी उम्र, जेनेटिक्स, पहले से मौजूद बीमारियां, तनाव, डर और परिवार का सपोर्ट बहुत बड़ा रोल निभाते हैं.
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इंटरनेशनल एसोसिएशन फॉर द स्टडी ऑफ पेन (IASP) के मुताबिक, दर्द केवल एक शारीरिक चोट नहीं है, बल्कि यह एक अप्रिय संवेदी और भावनात्मक अनुभव है. फोर्टिस हॉस्पिटल, नोएडा के न्यूरोसर्जरी डिपार्टमेंट के सीनियर डायरेक्टर और एचओडी डॉ. राहुल गुप्ता बताते हैं कि हर इंसान के लिए दर्द का अहसास कभी एक जैसा नहीं हो सकता.
चोट से शुरू होता है दर्द, पर वही खत्म नही होता
आमतौर पर दर्द तब शुरू होता है जब हमारे सेंसरी नर्व एंडिंग्स यानी नोसिसेप्टर्स किसी चोट, तेज गर्मी या दबाव को पकड़ते हैं. नसें दिमाग तक यह बात पहुंचाती हैं. लेकिन नोसिसेप्शन यानी नस का संकेत देना और असल में दर्द महसूस होना, ये दोनो अलग चीजें हैं.
मेडिकल साइंस में दर्द मुख्य रूप से तीन तरह का होता है. पहला नोसिसेप्टिव पेन, जो कटने, छिलने या अंदरूनी सूजन से होता है. दूसरा न्यूरोपैथिक पेन, जो नसों में खराबी या नस दबने की वजह से होता है. तीसरा नोसिप्लास्टिक पेन, जिसमें कोई साफ चोट दिखे बिना भी दिमाग दर्द का सिग्नल भेजता रहता है.
दो लोगों को एक जैसी चोट में अलग दर्द क्यों महसूस होता है?
1. आपका नर्वस सिस्टम और जीन्स
हमारे नर्वस सिस्टम में कई तरह के केमिकल मैसेंजर और रिसेप्टर होते हैं. हर इंसान के शरीर में जेनेटिक बनावट अलग होती है. डॉ. गुप्ता के अनुसार, हार्मोन्स, केमिकल्स के स्तर और नसों की संवेदनशीलता में अंतर होने के कारण ही दर्द महसूस करने की क्षमता बदल जाती है. नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH) की रिसर्च भी मानती है कि जीन्स और दिमाग का नर्वस सिस्टम हमारे दर्द के अनुभव को सीधे तौर पर तय करते हैं.
2. उम्र और पुरानी बीमारियां
उम्र और पहले से मौजूद बीमारियां भी दर्द को पूरी तरह बदल देती हैं. डायबिटीज, गठिया या ऑस्टियोपोरोसिस के मरीजों में चोट लगने पर रिकवरी अलग तरह से होती है. खासकर शुगर के मरीजों में लंबे समय तक हाई शुगर रहने से नसें कमजोर हो जाती हैं. ऐसे में कई बार मरीज को सुन्नपन आ जाता है और उसे चोट का अहसास ही नहीं होता. डॉ. गुप्ता बताते हैं कि डायबिटीज और लेप्रोसी जैसी बीमारियों में दर्द महसूस न होना अपने आप में बड़ा खतरा है, क्योंकि चोट लगने पर भी मरीज को समय पर पता नही चल पाता.
कम दर्द का मतलब छोटी चोट बिल्कुल नहीं होता
यह समझना बहुत जरूरी है कि दर्द की तीव्रता से चोट की गंभीरता तय नहीं होती. कई बार अंदरूनी तौर पर बहुत भारी नुकसान हो जाता है, लेकिन दर्द बिल्कुल महसूस नहीं होता. इसके उलट, कई बार छोटी सी खरोंच में भी बहुत तेज दर्द हो सकता है.
बाहर से दो चोटें एक जैसी दिख सकती हैं, लेकिन अंदर का हाल बिल्कुल अलग हो सकता है. बहुत बार माइक्रोस्कोपिक लेवल पर खून की नसें फट जाती हैं, ऑक्सीजन सप्लाई रुक जाती है या अंदरूनी ब्लीडिंग शुरू हो जाती है. यह बात सिर की चोट (हेड इंजरी) में सबसे ज्यादा लागू होती है, जहा बाहर से सब सामान्य दिखता है लेकिन खोपड़ी के अंदर खतरा बढ़ रहा होता है.
सिर की चोट में समय ही सबसे बड़ा जीवन रक्षक
सिर पर लगी किसी भी चोट को केवल दर्द के पैमाने पर नहीं मापना चाहिए. चोट लगने से दिमाग में ब्लीडिंग, सूजन या खून का थक्का जम सकता है, जिसके लक्षण कई घंटों बाद सामने आते हैं.
ब्रेन ट्रॉमा फाउंडेशन की गाइडलाइन्स के मुताबिक, अगर दिमाग के अंदर ब्लीडिंग हो रही है या प्रेशर बढ़ रहा है, तो बिना देरी किए फौरन सर्जरी की जरूरत पड़ती है. डॉ. गुप्ता का कहना है कि सिर की चोट में इंसान को कितनी जल्दी डाक्टर के पास पहुंचाया गया, यही बात तय करती है कि उसकी जान बचेगी या नहीं और वह कितना ठीक हो पाएगा.
तनाव और डर से भी बढ़ जाता है दर्द
दर्द सिर्फ शरीर का खेल नहीं है. आपकी मानसिक स्थिति, डर, घबराहट और पुरानी यादें भी दर्द को बढ़ा या घटा सकती हैं. जब कोई इंसान बहुत ज्यादा तनाव में होता है, तो उसका दिमाग दर्द को बहुत ज्यादा महसूस करता है. इसका मतलब यह कतई नहीं है कि दर्द वहम है. असल में दिमाग ही दर्द को कंट्रोल करता है. जो लोग मानसिक रूप से मजबूत होते हैं, वे फिजियोथेरेपी और कसरत से जल्दी रिकवर कर लेते हैं.
रिकवरी सिर्फ घाव भरने का नाम नहीं है
चोट से ठीक होना सिर्फ चमड़ी या हड्डी जुड़ना नहीं है. शरीर में खून और ऑक्सीजन का बहाव, नसों की हालत, अच्छी नींद, सही खानपान, डिप्रेशन से दूरी और परिवार का साथ रिकवरी को तेज बनाते हैं.
गंभीर दिमागी चोट के मरीजों को दोबारा बोलने, चलने और याददाश्त ठीक करने में महीनों लग जाते हैं. ऐसे में अगर मरीज शराब का सेवन कर ले, तो लक्षण और बिगड़ जाते हैं. इसलिए सिर की चोट के बाद नशे से पूरी तरह दूर रहना चाहिए.
चोट के बाद कब तुरंत डॉक्टर के पास जाना चाहिए?
अगर दर्द लगातार बढ़ रहा है या सामान्य से अलग लग रहा है, तो नीचे दिए गए खतरे के निशानों पर तुरंत ध्यान दें.
- चोट लगने के बाद अचानक बेहोश हो जाना या चक्कर आना.
- बातों में उलझन होना या ठीक से बोल न पाना.
- बार-बार उल्टियां होना या जी मिचलाना.
- शरीर के किसी एक हिस्से में कमजोरी या सुन्नपन आ जाना.
- सिरदर्द का लगातार बहुत ज्यादा तेज होते जाना.
- बहुत ज्यादा सुस्ती या नींद आना.
दर्द हमारे शरीर का अलार्म सिस्टम है, लेकिन यह नुकसान मापने का कोई सटीक मीटर नहीं है. आपका दिमाग, नसें, जीन्स, उम्र और मानसिक स्थिति सब मिलकर यह तय करते हैं कि आप कैसा महसूस कर रहे हैं.
डॉ. गुप्ता की यह बात बिल्कुल सही है कि किसी भी चोट की रिकवरी केवल बाहर दिखने वाले घाव से तय नहीं होती. इसलिए अगर तेज दर्द हो रहा है तो घबराएं नहीं और अगर बहुत कम दर्द है तो भी चोट को छोटा समझकर नजरअंदाज करने की गलती बिल्कुल न करें.
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