भारत में डायबिटीज के मामले लगातार बढ़ रहे हैं, इसके साथ ही ऐसे घावों की समस्या भी बढ़ रही है जो लंबे समय तक ठीक नहीं होते. खासकर डायबिटीज मरीजों में पैरों के घाव गंभीर रूप ले सकते हैं. इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए आने वाले दो से तीन सालों में देशभर में विशेष घाव उपचार केंद्र (वाउंड केयर सेंटर) खोलें जाएंगे.
इन केंद्रों का उद्देश्य मरीजों को घाव की जांच, इलाज और बाद की निगरानी जैसी सभी सुविधाएं एक ही जगह पर उपलब्ध कराना है.
क्यों जरूरी हैं ये केंद्र?
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि घावों की सही देखभाल पर अक्सर उतना ध्यान नहीं दिया जाता, जितना देना चाहिए, इसी वजह से कई लोगों को समय पर सही इलाज नहीं मिल पाता और उनकी दिक्कत बढ़ती चली जाती है. अब नए बनाए जा रहे सेंटर इस समस्या को कम करने की कोशिश करेंगे. यहां मरीजों को शुरुआत से लेकर पूरी तरह ठीक होने तक डॉक्टरों और विशेषज्ञों की निगरानी में इलाज मिलेगा, जिससे उनका घाव जल्दी और सही तरीके से ठीक हो सकेगा.
एक ही छत के नीचे मिलेंगी कई सुविधाएं
इन सेंटरों में घाव की पूरी जांच की जाएगी और नई मशीनों से स्कैन भी किया जाएगा साथ ही इलाज, फिजियोथेरेपी, रिकवरी और बाद में ऑनलाइन फॉलो-अप जैसी सुविधाएं भी मिलेंगी. सबसे अच्छी बात यह है कि मरीजों को बार-बार अलग-अलग अस्पताल या डॉक्टरों के पास जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी, क्योंकि ज्यादातर इलाज एक ही जगह पर आसानी से मिल जाएगा.
डायबिटीज मरीजों को सबसे ज्यादा फायदा
डॉक्टरों का कहना है कि डायबिटीज होने पर शरीर की नसें और खून का सही बहाव खराब होने लगता है, इसकी वजह से पैरों में जल्दी घाव हो जाते हैं और ये घाव आसानी से ठीक भी नहीं होते. इन घावों को “डायबिटिक फुट अल्सर” कहा जाता है. अगर इनका समय पर सही इलाज न कराया जाए, तो इनमें इंफेक्शन फैल सकता है और हालत इतनी बिगड़ सकती है कि अंग काटने तक की नौबत आ सकती है.
खास तकनीक से होगी घाव की जांच
इन सेंटरों में घाव की जांच के लिए नई और आधुनिक मशीनों का इस्तेमाल किया जाएगा. इस खास तकनीक (फ्लोरेसेंस इमेजिंग) की मदद से डॉक्टर आसानी से जान सकेंगे कि घाव वाली जगह तक खून और ऑक्सीजन सही तरह से पहुंच रही है या नहीं, इससे डॉक्टरों को घाव की असली हालत समझने में मदद मिलेगी और उसी हिसाब से सही इलाज तय किया जा सकेगा, जिससे मरीज जल्दी ठीक हो पाएगा.
AI और डिजिटल मॉनिटरिंग का भी मिलेगा सहारा
इस योजना के तहत iLiveConnect नाम का एक डिजिटल प्लेटफॉर्म भी बनाया जा रहा है. यह प्लेटफॉर्म डॉक्टरों की निगरानी में काम करेगा और मरीजों की सेहत पर लगातार नजर रखेगा. इसमें बायो-सेंसर, AI और डेटा एनालिसिस जैसी नई तकनीकों का इस्तेमाल होगा, जिससे बीमारी बिगड़ने के शुरुआती संकेत पहले ही पकड़ में आ जाएंगे, इससे समय रहते इलाज करना आसान हो जाएगा और मरीज की हालत ज्यादा खराब होने से बच सकेगी.
अस्पताल से छुट्टी के बाद भी जारी रहेगी देखभाल
अक्सर मरीज अस्पताल से घर लौटने के बाद फॉलो-अप में लापरवाही कर देते हैं, जिससे घाव दोबारा गंभीर हो सकता है. नई व्यवस्था में मरीजों की स्थिति पर डिजिटल माध्यम से नजर रखी जाएगी. जरूरत पड़ने पर डॉक्टर समय रहते सलाह और उपचार दे सकेंगे. मोबाइल वाउंड केयर क्लीनिक भी इस प्रक्रिया में मदद करेंगे.
कई विशेषज्ञ मिलकर करेंगे इलाज
इन केंद्रों में अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञ एक साथ काम करेंगे, इनमें वैस्कुलर सर्जन, प्लास्टिक सर्जन, पोषण विशेषज्ञ, फिजियोथेरेपिस्ट और पुनर्वास विशेषज्ञ शामिल होंगे.
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