आजकल छोटे बच्चों के हाथ में मोबाइल या टैबलेट देना आम बात हो गई है. लेकिन स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि 2 से 5 साल की उम्र के बच्चों का लंबे समय तक स्क्रीन देखना उनके दिमागी और भाषा विकास पर असर डाल सकता है.
बाल रोग विशेषज्ञों के अनुसार, हाल के वर्षों में ऐसे बच्चों की संख्या बढ़ी है जिन्हें बोलने में देरी (Speech Delay) की शिकायत के साथ अस्पताल लाया जा रहा है. कई मामलों में यह पाया गया कि बच्चे घंटों मोबाइल पर वीडियो देखते थे और माता-पिता के साथ उनकी बातचीत बहुत कम होती थी.
स्क्रीन टाइम और बच्चों की बोलने की क्षमता का क्या है संबंध?
रोहिणी स्थित डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर अस्पताल के वरिष्ठ रेजिडेंट बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. राहुल दराल बताते हैं कि छोटे बच्चों में जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम, खासकर रील्स और शॉर्ट्स जैसे तेजी से बदलने वाले वीडियो, भाषा विकास और एकाग्रता को प्रभावित कर सकते हैं.
उनके मुताबिक, शुरुआती वर्षों में बच्चे बातचीत, कहानियां सुनने, किताबें देखने और खेल-कूद के जरिए भाषा सीखते हैं. अगर इन एक्टिविटी की जगह स्क्रीन ले लेती है, तो बोलने और समझने की क्षमता के विकास पर असर पड़ सकता है.

एक बच्चे का मामला जिसने बढ़ाई चिंता
हाल ही में एक ढाई साल के बच्चे को अस्पताल लाया गया क्योंकि वह सिर्फ "मम्मा", "पापा" और कुछ गिने-चुने शब्द ही बोल पाता था. जबकि उसकी उम्र के ज्यादातर बच्चे छोटे-छोटे वाक्य बोलना शुरू कर देते हैं.
डॉक्टरों ने जांच की तो उसकी सुनने की क्षमता, आंखों की रोशनी और अन्य विकास संबंधी पहलू सामान्य पाए गए. लेकिन जब परिवार की दिनचर्या के बारे में पूछा गया, तो पता चला कि बच्चा रोजाना 6-7 घंटे मोबाइल पर कार्टून और छोटे वीडियो देखता था. खाना खाते समय भी उसके सामने मोबाइल रखा जाता था और फोन हटाने पर वह परेशान हो जाता था.
माता-पिता के पास समय कम, बच्चे पर असर ज्यादा
बच्चे के माता-पिता दोनों कामकाजी थे, जिसके कारण उसके साथ बातचीत और इंटरैक्टिव खेल काफी सीमित हो गए थे. डॉक्टरों ने पाया कि उसकी सबसे बड़ी समस्या बोलने की क्षमता का धीमा विकास थी.
क्या सिर्फ रील्स और शॉर्ट्स ही जिम्मेदार हैं?
डॉ. दराल कहते हैं कि ध्यान की कमी या व्यवहार संबंधी समस्याओं के लिए केवल रील्स और शॉर्ट्स को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. पर्याप्त नींद, शारीरिक गतिविधि, घर का माहौल और बच्चों की परवरिश का तरीका भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
हालांकि, लगातार तेजी से बदलने वाले वीडियो देखने से बच्चे का मस्तिष्क तुरंत मिलने वाली उत्तेजना और मनोरंजन का आदी हो सकता है. इसका असर यह हो सकता है कि पढ़ाई, किताबें पढ़ना, संगीत सीखना या अन्य गतिविधियां उन्हें कम दिलचस्प लगने लगें.
बच्चों के लिए कितना स्क्रीन टाइम सही है?
विशेषज्ञों की सलाह है:
- 2 साल से कम उम्र के बच्चों को मनोरंजन के लिए स्क्रीन से दूर रखना चाहिए.
- 2 से 5 साल के बच्चों का स्क्रीन टाइम ideally एक घंटे से कम होना चाहिए.
- बड़े बच्चों में यह ध्यान रखना जरूरी है कि स्क्रीन की वजह से उनकी नींद, पढ़ाई, खेलकूद और परिवार के साथ समय प्रभावित न हो.
स्क्रीन टाइम कम करने के लिए क्या करें?
डॉक्टर बच्चों की डिजिटल आदतों को बेहतर बनाने के लिए ये सुझाव देते हैं:
- भोजन के दौरान मोबाइल, टीवी या टैबलेट का इस्तेमाल न करें.
- बच्चे के साथ रोज कम से कम 1 घंटा खेलें.
- हर दिन कहानी सुनाएं या चित्रों वाली किताब पढ़ें.
- बच्चों से रोजमर्रा के काम करते समय भी बातचीत करें.
- सोने से कम से कम 1 घंटा पहले स्क्रीन बंद कर दें.
- बच्चों को रोज बाहर खेलने और शारीरिक गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करें.
- जरूरत पड़ने पर स्पीच और लैंग्वेज थेरेपी की मदद लें.
माता-पिता की भूमिका सबसे अहम
विशेषज्ञों का कहना है कि समाधान केवल मोबाइल छीन लेना नहीं है, बल्कि बच्चों में स्वस्थ डिजिटल आदतें विकसित करना है. साथ ही माता-पिता को भी अपने स्क्रीन उपयोग पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि बच्चे सबसे ज्यादा सीख अपने आसपास के लोगों को देखकर ही लेते हैं.
मोबाइल और टैबलेट बच्चों को व्यस्त रखने का आसान तरीका लग सकते हैं, लेकिन जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम उनकी बोलने, सीखने और ध्यान लगाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता है. इसलिए बच्चों के विकास के लिए स्क्रीन की जगह बातचीत, कहानियां, किताबें और खेल को प्राथमिकता देना जरूरी है.
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