एक व्यक्ति अपनी उम्र के हिसाब से तीस साल का हो सकता है, लेकिन उसके शरीर की आंतरिक स्थिति यानी जैविक उम्र इससे कहीं अधिक हो सकती है. वैज्ञानिकों के अनुसार, यह अंतर कम उम्र में कैंसर के मामलों से जुड़ा एक महत्वपूर्ण कारक भी हो सकता है.
हाल ही में वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी स्कूल ऑफ मेडिसिन, सेंट लुइस के शोधकर्ताओं ने एक अध्ययन में यह पाया है कि नई पीढ़ियों के लोग पिछली पीढ़ियों की तुलना में जैविक रूप से तेजी से उम्रदराज हो रहे हैं. यह शोध प्रतिष्ठित पत्रिका नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है और यह इस बात पर जोर देता है कि आखिर दुनिया भर में 55 वर्ष या उससे कम उम्र के लोगों में कैंसर के मामले क्यों बढ़ रहे हैं.
55 साल से कम उम्र में होने वाले कैंसर
चिकित्सा जगत में 55 साल या उससे कम उम्र में होने वाले कैंसर को 'अर्ली-ऑनसेट कैंसर' कहा जाता है. पिछले कुछ दशकों में कोलोरेक्टल (आंतों का कैंसर), फेफड़ों का कैंसर, गर्भाशय का कैंसर और अन्य कई प्रकार के कैंसर के मामलों में युवाओं में बढ़ोतरी दर्ज की गई है. पहले इसे केवल जीवनशैली या आनुवंशिक कारणों से जोड़ा जाता था, लेकिन अब वैज्ञानिक इसके पीछे गहरे जैविक कारणों की तलाश कर रहे हैं.
इस नए अध्ययन में क्रोनोलॉजिकल एज यानी वास्तविक उम्र और बायोलॉजिकल एज यानी शरीर की कार्यक्षमता के आधार पर मापी गई उम्र के बीच अंतर को समझने की कोशिश की गई. क्रोनोलॉजिकल उम्र केवल जन्म के बाद बीते वर्षों को दर्शाती है, जबकि जैविक उम्र यह बताती है कि शरीर के अंग कितने स्वस्थ और कार्यक्षम हैं. दो लोगों की उम्र समान हो सकती है, लेकिन उनकी जैविक उम्र अलग-अलग हो सकती है, जो उनके स्वास्थ्य की स्थिति को दर्शाती है.
बड़े डेटासेट का विश्लेषण
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए दो बड़े डेटासेट का विश्लेषण किया. इसमें यूनाइटेड किंगडम के 1,54,000 से अधिक और संयुक्त राज्य अमेरिका के 10,000 से अधिक लोगों का स्वास्थ्य डेटा शामिल था. वैज्ञानिकों ने रक्त में मौजूद ऐसे बायोमार्कर का अध्ययन किया जो मेटाबॉलिज्म, अंगों की कार्यक्षमता और शरीर में उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को दर्शाते हैं.
इसके साथ ही, शरीर के विभिन्न अंगों और ऊतकों से जुड़े प्रोटीन का भी विश्लेषण किया गया. इससे शोधकर्ताओं को यह समझने में मदद मिली कि शरीर के कौन से हिस्से तेजी से उम्रदराज हो रहे हैं, जैसे कि प्रतिरक्षा प्रणाली और वसा ऊतक.
जैविक उम्र बढ़ गई
अध्ययन के परिणामों में यह स्पष्ट रूप से सामने आया कि हाल की पीढ़ियों के लोगों में जैविक उम्र बढ़ने की गति अधिक पाई गई. यह प्रवृत्ति अमेरिका और ब्रिटेन दोनों में समान रूप से देखी गई. शोधकर्ताओं ने आगे यह भी जांचा कि क्या तेज जैविक उम्र बढ़ने का संबंध कैंसर के जोखिम से है. निष्कर्षों में पाया गया कि जिन लोगों में जैविक उम्र अधिक तेजी से बढ़ रही थी, उनमें कम उम्र में कैंसर विकसित होने का खतरा भी अधिक था. सबसे अधिक जैविक उम्र वाले व्यक्तियों में शुरुआती चरण के ठोस ट्यूमर का जोखिम लगभग 15 प्रतिशत अधिक पाया गया.
विशेष रूप से यह भी देखा गया कि जिन लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली अपेक्षा से अधिक उम्रदराज प्रतीत होती थी, उनमें फेफड़ों के कैंसर का जोखिम बढ़ा हुआ था. वहीं, जिनकी वसा ऊतक प्रणाली तेजी से उम्रदराज हो रही थी, उनमें कोलोरेक्टल कैंसर की संभावना अधिक पाई गई.
इन निष्कर्षों के बाद सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है कि आखिर नई पीढ़ियां तेजी से जैविक रूप से क्यों बूढ़ी हो रही हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि इसके पीछे कई कारण मिलकर काम कर सकते हैं. आधुनिक जीवनशैली में मोटापा बढ़ना, मेटाबॉलिक समस्याएं जैसे इंसुलिन रेजिस्टेंस और फैटी लिवर, तथा अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और शुगर युक्त आहार इसका हिस्सा हो सकते हैं. इसके अलावा शारीरिक गतिविधि में कमी, लंबे समय तक बैठकर काम करना, नींद की कमी और मानसिक तनाव भी शरीर पर गहरा असर डालते हैं. पर्यावरणीय बदलाव और प्रदूषण जैसे कारक भी जैविक उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं.
हालांकि यह अध्ययन यह साबित नहीं करता कि तेज जैविक उम्र सीधे कैंसर का कारण बनती है, लेकिन यह दोनों के बीच मजबूत संबंध जरूर दर्शाता है. इस दिशा में और शोध की आवश्यकता है ताकि यह समझा जा सके कि आधुनिक जीवनशैली और पर्यावरण किस प्रकार शरीर की उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावित करते हैं.
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