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आदिवासी गांवों में 40 दिन में 8 मासूमों की मौत, 372 की हालत खराब, 100 अस्पताल पहुंचे; ऐसा क्यों हो रहा?

बालाघाट के बैगा बहुल आदिवासी गांवों में स्वास्थ्य संकट गहराता जा रहा है। पिछले 40 दिनों में 8 मासूमों की मौत, 372 मरीजों की पहचान और 100 बच्चों को अस्पताल में भर्ती किए जाने से चिंता बढ़ गई है. मलेरिया, मीजल्स, टायफाइड और अन्य बीमारियों ने कई गांवों को प्रभावित किया है.

आदिवासी गांवों में 40 दिन में 8 मासूमों की मौत, 372 की हालत खराब, 100 अस्पताल पहुंचे; ऐसा क्यों हो रहा?
  • बालाघाट जिले के बैगा आदिवासी गांवों में पिछले 40 दिनों में कई संक्रामक बीमारियों ने व्यापक रूप से फैलाव किया.
  • कुंडेकसा गांव सबसे ज्यादा प्रभावित है, जहां फंगल इंफेक्शन, मलेरिया, टायफाइड, हैजा सहित अन्य बीमारियां दिखी.
  • स्वास्थ्य विभाग ने गांवों में स्वास्थ्य अभियान चलाकर 300 से अधिक मरीजों की पहचान कर इलाज सुनिश्चित किया.

एमपी के बालाघाट जिले के बैगा बहुल आदिवासी गांवों से पिछले 40 दिनों में जो तस्वीरें सामने आई हैं, वे सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट की कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था, जागरूकता और बुनियादी सुविधाओं पर कई गंभीर सवाल भी खड़े करती हैं. मछुरदा, अडोरी, बोंदारी, कोरका और कुंडेकसा जैसे गांवों में बीमारी ने इस कदर पैर पसारे कि कई परिवारों की गोद सूनी हो गई. आठ मासूमों की मौत, सैकड़ों लोगों के बीमार होने और बच्चों के अस्पताल पहुंचने की खबरों ने पूरे इलाके को चिंता में डाल दिया है. प्रशासन बीमारी पर नियंत्रण का दावा कर रहा है.

बैगा अंचल के कई गांव बने बीमारी के हॉटस्पॉट

बालाघाट जिले के बैगा बाहुल्य क्षेत्रों में इन दिनों कई तरह की बीमारियां फैलने की जानकारी सामने आई है. मछुरदा, अडोरी, बोंदारी, कोरका और कुंडेकसा गांव सबसे अधिक प्रभावित बताए जा रहे हैं. इनमें भी कुंडेकसा गांव बीमारी के सबसे बड़े केंद्र के रूप में सामने आया है. यहां फंगल इंफेक्शन, मलेरिया, टायफाइड, हैजा, मीजल्स, स्कैबीज, सर्दी-खांसी और बुखार जैसी स्वास्थ्य समस्याएं एक साथ देखने को मिली हैं. हालात को देखते हुए स्वास्थ्य विभाग ने गांव-गांव में स्वास्थ्य परीक्षण अभियान शुरू किया है और कुंडेकसा के सरकारी स्कूल में अस्थायी अस्पताल भी बनाया गया.

सरकारी आंकड़े क्या बताते हैं?

स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, बिरसा विकासखंड के कुंडेकसा, अडोरी, कोरका और बांदरी गांवों में बीमार बच्चों के उपचार के लिए लगातार अभियान चलाया जा रहा है. अब तक 100 बच्चों को अस्पताल में भर्ती किया, जिनमें से 93 बच्चे स्वस्थ होकर घर लौट चुके हैं. बुधवार को एहतियात के तौर पर 8 अन्य बच्चों को भी अस्पताल लाया. फिलहाल 15 बच्चे उपचाररत हैं और विभाग का दावा है कि सभी की हालत सामान्य और संतोषजनक है.

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बच्चों को गोद में लेकर इलाज का इंतजार करती मां. 

372 मरीज मिले, स्वास्थ्य विभाग की टीमें मैदान में

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. परेश उपलप के मुताबिक, प्रभावित गांवों में 20 सर्वेक्षण टीमों को लगाया है, जो घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रही हैं. मरीजों को अस्पताल पहुंचाने के लिए 10 चिकित्सा अधिकारी और चार एम्बुलेंस भी तैनात की हैं. अब तक किए गए सर्वे में 372 मरीज अलग-अलग बीमारियों से प्रभावित मिले हैं. इनमें से कई लोगों का अस्पताल में इलाज हुआ, जबकि बड़ी संख्या में मरीजों का घर पर उपचार कर उन्हें स्वस्थ किया है.

40 दिनों में आठ मासूमों की मौत ने बढ़ाई चिंता

बीमारी के इस दौर में बच्चों की मौतों ने सबसे ज्यादा चिंता बढ़ाई है. सरकारी रिकॉर्ड में सात बच्चों की मौत दर्ज होने की बात कही गई है, जबकि स्थानीय स्तर पर आठ मौतों की चर्चा हो रही है. 26 जून से शुरू हुआ यह सिलसिला जुलाई के अंत तक जारी रहा. अलग-अलग गांवों से सामने आई इन मौतों ने परिवारों को झकझोर दिया है. ग्रामीणों का दावा है कि वास्तविक संख्या सरकारी आंकड़ों से अधिक हो सकती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.

क्या अंधविश्वास भी है एक कारण?

प्रशासन का मानना है कि बैगा समुदाय के कुछ इलाकों में स्वास्थ्य जागरूकता की कमी अब भी बड़ी चुनौती बनी हुई है. कई लोग बीमारी की शुरुआती स्थिति में अस्पताल पहुंचने के बजाय झाड़-फूंक, पंडा-पुजारी और पारंपरिक तरीकों का सहारा लेते हैं. हाल ही में ऐसे वीडियो भी सामने आए, जिनमें महामारी को दूर करने के लिए धार्मिक अनुष्ठान और बलि जैसी गतिविधियां दिखाई दीं. प्रशासन का कहना है कि इलाज में देरी भी कई मामलों में स्थिति को गंभीर बना देती है.

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बच्चों को इलाज के लिए अस्पताल लेकर पहुंचे परिजन.  

लेकिन पूरी कहानी सिर्फ अंधविश्वास की नहीं

स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि समस्या को केवल अंधविश्वास से जोड़कर नहीं देखा जा सकता. आदिवासी इलाकों में आज भी कुपोषण एक बड़ी समस्या है. कमजोर प्रतिरोधक क्षमता वाले बच्चों को संक्रमण जल्दी घेर लेता है. इसके अलावा स्वास्थ्य सुविधाएं भी कई गांवों से काफी दूर हैं. ऐसे में गंभीर मरीजों को समय पर इलाज मिलना मुश्किल हो जाता है. यही वजह है कि बीमारी का असर यहां ज्यादा गंभीर रूप में सामने आता है.

अस्पताल दूर, इलाज में देरी का भी आरोप

31 जुलाई को जान गंवाने वाले एक बच्चे के परिजन चैन सिंह मरकाम ने बताया कि उनके इलाके के सबसे नजदीकी अस्पताल तक पहुंचने के लिए करीब 20 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है. उन्होंने दावा किया कि पहले बच्चे को जिला अस्पताल ले जाया गया, बाद में उसे महाराष्ट्र के गोंदिया स्थित एक निजी अस्पताल रेफर किया. परिजनों का कहना है कि समय पर उचित इलाज नहीं मिलने से बच्चे को बचाया नहीं जा सका. ऐसे कई सवाल अब स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी उठ रहे हैं.

बीमारी पर नियंत्रण का दावा, लेकिन सवाल बाकी

स्वास्थ्य विभाग का कहना है कि हालात अब नियंत्रण में हैं और प्रभावित क्षेत्रों में लगातार निगरानी रखी जा रही है. अस्पताल में भर्ती बच्चों और उनके परिजनों के लिए भोजन की व्यवस्था भी की है. लेकिन आठ मासूमों की मौत, 372 मरीजों के सामने आने और सुदूर आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि विकास और योजनाओं का लाभ आखिर अंतिम व्यक्ति तक कब पहुंचेगा.  

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