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अस्सी और नब्बे के दशक में पैदा हुए लोग क्यों दिखते हैं अलग? मिलेनियम की एजिंग पर क्या कहती है रिसर्च

क्या 80-90 के दशक में पैदा हुए मिलेनियल्स सच में जवान दिखते हैं? रिसर्च बताती है कम स्क्रीन टाइम, बोरियत और मेंटल बैलेंस कैसे एजिंग धीमा करते हैं.

अस्सी और नब्बे के दशक में पैदा हुए लोग क्यों दिखते हैं अलग? मिलेनियम की एजिंग पर क्या कहती है रिसर्च
क्या मिलेनियल्स सच में अपनी उम्र से कम दिखते हैं.

क्या अस्सी और नब्बे के दशक में पैदा हुए लोग यानी मिलेनियल्स (1981-1996) सच में अपनी उम्र से कम दिखते हैं? कई लोग मानते हैं कि यह पीढ़ी न तो पूरी तरह पुरानी सोच वाली है और न ही पूरी तरह डिजिटल दुनिया में खोई हुई. शायद यही वजह है कि उनकी एजिंग बाकी जेनरेशन से थोड़ी अलग दिखाई देती है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि मिलेनियल्स ने बचपन बिना स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और लगातार स्क्रीन टाइम के बिताया. उन्होंने असली दोस्ती, रिश्तेदारी और ऑफलाइन दुनिया को करीब से जिया. वहीं बड़े होने पर इंटरनेट और डिजिटल लाइफ को भी अपनाया. यही बैलेंस उन्हें मानसिक रूप से ज्यादा स्थिर बना सकता है.

स्क्रीन टाइम और बढ़ता तनाव

आज की नई पीढ़ी यानी Gen-Z का बड़ा हिस्सा दिन का काफी समय स्क्रीन के सामने बिताता है. लगातार सोशल मीडिया इस्तेमाल करने से दूसरों से तुलना, एंग्जायटी और मानसिक तनाव बढ़ सकता है.

अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) की रिपोर्ट के अनुसार युवा पीढ़ी में स्ट्रेस और एंग्जायटी लेवल काफी ज्यादा देखा गया है. एक्सपर्ट मानते हैं कि लगातार डिजिटल एक्सपोजर और सोशल मीडिया प्रेशर इसका एक बड़ा कारण हो सकता है.

तनाव बढ़ने पर शरीर में कॉर्टिसोल हार्मोन ज्यादा बनने लगता है. हेल्थ एक्सपर्ट्स के अनुसार लंबे समय तक हाई कॉर्टिसोल नींद, स्किन और मेंटस हेल्थ पर असर डाल सकता है. यही वजह है कि लोग अक्सर कहते हैं कि बुढ़ापा सिर्फ उम्र से नहीं, तनाव से आता है."

जर्नल BMC Medicine में प्रकाशित एक नई स्टडी में पाया गया कि स्मार्टफोन और स्क्रीन टाइम कम करने से मानसिक स्वास्थ्य, नींद और तनाव के स्तर में सुधार देखा गया। इस रिसर्च में युवाओं पर 3 हफ्ते तक स्क्रीन टाइम घटाने का असर देखा गया, जिसमें स्ट्रेस, एंग्जायटी और खराब नींद जैसी समस्याओं में कमी दर्ज की गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि लगातार स्क्रीन एक्सपोज़र मानसिक दबाव और कॉर्टिसोल जैसे स्ट्रेस हार्मोन को बढ़ा सकता है, जो लंबे समय में चेहरे और ओवरऑल एजिंग पर असर डाल सकता है। यह स्टडी फरवरी 2025 में मेडिकल जर्नल BMC Medicine में प्रकाशित हुई थी।

बोरियत भी बन सकती है फायदा

मिलेनियल्स की एक खास बात यह रही कि उन्होंने बोर होना महसूस किया. बचपन में घंटों बिना फोन के समय बिताना, दोस्तों के साथ खेलना और खाली बैठकर सोचना उनकी लाइफ का हिस्सा था.

मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि कभी-कभी बोरियत क्रिएटिविटी और इमोशनल कंट्रोल बढ़ाने में मदद करती है. वहीं आज लगातार स्क्रीन एंटरटेनमेंट के कारण दिमाग को आराम मिलने का समय कम हो गया है.

NIH में प्रकाशित रिसर्च के अनुसार जरूरत से ज्यादा स्क्रीन टाइम मानसिक थकान, तनाव और सोशल डिस्कनेक्शन बढ़ा सकता है.

सिर्फ स्किनकेयर नहीं, मानसिक शांति भी जरूरी

एक्सपर्ट्स के मुताबिक जवान दिखना सिर्फ फिल्टर्स, फिलर्स या महंगे स्किनकेयर प्रोडक्ट्स पर निर्भर नहीं करता. अच्छी नींद, इमोशनल सेफ्टी, मजबूत रिश्ते और कम तनाव भी उतने ही जरूरी हैं.

हालांकि यह कहना पूरी तरह वैज्ञानिक रूप से साबित नहीं है कि मिलेनियल्स Gen Z से ज्यादा जवान दिखते हैं, लेकिन रिसर्च यह जरूर बताती है कि मानसिक शांति, बैलेंस लाइफस्टाइल और असली सामाजिक जुड़ाव एजिंग की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं.

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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)

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