19 अगस्त को वर्ल्ड फोटोग्राफी डे मनाया जाता है. ये दिन हर साल उन फोटोग्राफर के सम्मान का होता है जो दुनिया के अहम पलों को फोटो में कैप्चर करने का काम करते हैं. दुनिया की त्रासदियों, खुशी, मिलने-बिछड़ने, राजनीतिक घटनाक्रम आदि को अपने कैमरे में रिकॉर्ड करके उसे यादगार बना देते हैं. वर्ल्ड फोटोग्राफी डे पर हम आपको बीते साल 2025 की दो यादगार तस्वीरों के बारे में बता रहे हैं, जिनके पीछे की कहानी बेहद मार्मिक है.

Photo Credit: Miami Herald
पहली तस्वीर 'Separated by ICE' है. इसे पुलित्जर प्राइज विजेता कैरल गुजी ने कैमरे में कैद किया. इसे वर्ल्ड प्रेस फोटो ऑफ द ईयर का प्राइज मिला है.
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न्यूयॉर्क की एक सरकारी इमारत का वो संकरा सा गलियारा. जहां जाने की इजाजत गिने-चुने कैमरों को ही थी. मशहूर फोटो-जर्नलिस्ट कैरल गुजी हर रोज वहां सिर्फ इसलिए पहरा देती थीं ताकि दुनिया के सामने उस खौफनाक सच को ला सकें, जिसे अक्सर फाइलों में दबा दिया जाता है. और फिर 26 अगस्त 2025 की तारीख को उनके कैमरे ने वो मंजर कैद किया, जिसने हर देखने वाले का कलेजा छलनी कर दिया. जब एक पूरे के पूरे परिवार को सरकारी हुक्म के नाम पर बेरहमी से दो टुकड़ों में बांट दिया गया.
न्यूयॉर्क के 26 फेडरल प्लाजा की इमिग्रेशन कोर्ट. जहां हर रोज सैकड़ों लोग इस उम्मीद में आते हैं कि शायद उन्हें अमेरिका में सिर छुपाने की पनाह मिल जाएगी. लेकिन पिछले साल मई से यह इमारत उम्मीद की नहीं, बल्कि खौफ की पहचान बन चुकी है. यहां ICE के एजेंट्स साए की तरह मंडराते हैं और लोगों को दबोच लेते हैं.

Photographer: Carol Guzy
इसी कोर्ट में पहुंचा था इक्वाडोर से आया एक सीधा-साधा परिवार. घर का मुखिया लुइस, उसकी पत्नी कोचा और तीन मासूम बच्चे 13 और 15 साल की दो बेटियां और महज 7 साल का एक छोटा बेटा. जैसे ही सुनवाई खत्म हुई और एजेंट्स ने लुइस के हाथों में हथकड़ियां पहनाईं, कोर्ट का वो गलियारा चीखों और सिसकियों से गूंज उठा. मासूम बच्चे अपने पिता से लिपटकर पागलों की तरह रो रहे थे, लेकिन कानून के पहरेदारों का दिल नहीं पसीजा.
Aid Emergency in Gaza
दूसरी तस्वीर मानवता को झकझोरने वाली Aid Emergency in Gaza है. इसे फोटोग्राफर साबिर नूरलदीन ने अपने कैमरे में कैप्चर किया.

Photo Credit: EPA Images
एक बाप अपने भूखे बच्चों के लिए आटे की एक बोरी लेने निकले और घर उसकी लाश लौटे क्या आपने कभी सुना है कि दो वक्त की रोटी की तलाश किसी के लिए मौत का परवाना बन जाए? गाजा में साल 2025 का मंजर कुछ ऐसा ही रहा. जहां एक तरफ संयुक्त राष्ट्र की मानवाधिकार जांच ने इसे 'नरसंहार' करार दिया. हालांकि इजराइल इन आरोपों को सिरे से खारिज करता रहा. लेकिन जमीन की हकीकत यह थी कि वहां भुखमरी ने हर घर को अपने शिकंजे में कस लिया था. इंसानों को भूखा मारकर घुटनों पर लाने की ऐसी खौफनाक रणनीति दुनिया ने शायद ही कभी देखी हो.
मार्च 2025 में जब गाजा की हर सीमा पर मुकम्मल ताला जड़ दिया गया, तो मानवाधिकार संस्थाओं ने इसे सीधे तौर पर 'भूख का हथियार' कहा. दुनिया का दबाव बढ़ा, तो मई में रास्ते थोड़े खुले जरूर, लेकिन मदद पहुंचाने का जिम्मा संयुक्त राष्ट्र से छीनकर अमेरिका और इजराइल की बनाई नई एजेंसी GHF (गाजा ह्यूमैनिटेरियन फाउंडेशन) को सौंप दिया गया.
राहत बांटने की कमान फौजियों के हाथ में थी. दुनिया भर के कानूनविदों ने चीख-चीख कर कहा कि यह इंसानियत और अंतरराष्ट्रीय कानूनों का खुला कत्ल है. लेकिन इस चेतावनी को अनसुना कर दिया गया. और फिर जो हुआ, उसने रूह कंपा दी. मई से अक्टूबर के बीच, सिर्फ राशन और आटे का पैकेट लेने पहुंचे 2,435 से ज्यादा बेबस फलस्तीनियों को मौत के घाट उतार दिया गया. सोचिए, जहां लोग जिंदगी की भीख मांगने यानी खाना लेने पहुंचे थे, वही जगहें खून से लाल हो गईं.

अक्टूबर में एक नाजुक युद्धविराम के बाद इस विवादास्पद एजेंसी GHF का बोरिया-बिस्तर तो सिमट गया, लेकिन लोगों की किस्मत नहीं बदली. दिसंबर आते-आते भी गाजा की 75 फीसदी से ज्यादा आबादी भूखे पेट सोने और कुपोषण की मार झेलने को मजबूर थी.
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