अगर आप भी 30 या 35 की उम्र छू रहे हैं और आपको लग रहा है कि बस बुढ़ापा आ गया, तो मोहतरमा ऐसे कैसे... एक नजर जरा 56 साल की मनीषा कोइराला पर डालिए. 56 की उम्र में भी वे शायद आपको मात दे दें. वे जिस शिद्दत से अपनी फिटनेस का ख्याल रख रही हैं, वह वाकई काबिले-तारीफ है. उनका वर्कआउट साफ दिखाता है कि एक्टिव रहने का मतलब सिर्फ मसल्स बनाना नहीं होता.
हाल ही में मनीषा कोइराला ने इंस्टाग्राम पर अपने वर्कआउट सेशन की एक झलक शेयर की, जिसमें योग मोबिलिटी और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग का बेहतरीन तालमेल देखने को मिला. मनीषा कोइराला के इस वर्कआउट को देखकर ही उनकी फिटनेस का अंदाजा लगाया जा सकता है. उम्र के इस पड़ाव पर भी लचीलापन, शरीर का संतुलन, फुर्ती और मजबूत मसल्स का टारेगेट पूरा कर पाना वाकई चैलेंजिंग होता है और मनीषा कोइराला ने इस चैलेंज को बखूबी निभाया है. उनका यह रूटीन इसी बात को पुख्ता करता है.
अदाकारा ने अपने वर्कआउट की शुरुआत कुछ आसान योगा स्ट्रेच के साथ की. सबसे पहले उन्होंने ‘कैट-काउ पोज' किया, जो रीढ़ की हड्डी को फ्लेक्सिबल बनाए रखने के लिए बेहद मुफीद माना जाता है.
इसके बाद ‘थ्रेड-द-नीडल' स्ट्रेच, जिससे पीठ के ऊपरी हिस्से, गर्दन और कंधों की जकड़न खुलती है. फिर कुछ लंजिंग स्ट्रेच के जरिए उन्होंने लोअर बॉडी को वॉर्म-अप किया और इसके बाद शुरू हुई स्ट्रेंथ ट्रेनिंग.
मनीषा कोइराला का दमदार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग सेशन
स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के लिए मनीषा ने हल्के डंबल हाथ में लेकर लंज लगाना शुरू किया. लंज एक ऐसी कसरत है जो जांघों (क्वाड्स और हैमस्ट्रिंग्स) के साथ-साथ हिप्स की मांसपेशियों पर गहरा असर डालती है. इससे शरीर का बैलेंस और तालमेल भी सुधरता है.
इसके बाद उन्होंने डंबल के साथ लेटरल लेग मूवमेंट्स किए, ताकि आउटर थाइज और हिप्स मजबूत हो सकें. फिर मैट पर लेटकर लेग रेज और लेग सर्कल जैसी कोर-इंगेजिंग एक्सरसाइज कीं.
सीधी बात यह है- उम्र बढ़ने के साथ मोबिलिटी पर भी उतना ही ध्यान देना जरूरी है जितना ताकत पर.
उम्र के साथ क्यों ढीली पड़ने लगती है मोबिलिटी?
जैसे-जैसे साल बीतते हैं, मांसपेशियों का घनत्व घटने लगता है, जोड़ सख्त होने लगते हैं और शरीर का संतुलन पहले जैसा नहीं रहता. खासकर तब, जब फिजिकल एक्टिविटी कम हो.
इसका सीधा असर रोजमर्रा के छोटे-मोटे कामों पर पड़ता है- जैसे सीढ़ियां चढ़ना, नीचे झुककर सामान उठाना या कुर्सी से उठना भी भारी लगने लगता है.
शारदाकेयर - हेल्थसिटी के फिजियोथेरेपिस्ट डॉ. धर्म पांडे के मुताबिक,
सही तरीके से किए जाएं तो कैट-काउ, बॉडीवेट स्क्वैट्स और लंज भी इसमें बहुत मददगार साबित होते हैं.
ताकत और मोबिलिटी: दोनों का साथ जरूरी
बहुत से लोग सोचते हैं कि या तो वजन उठा लो या फिर सिर्फ स्ट्रेचिंग कर लो. लेकिन 50 के पार दोनों का बैलेंस ही असली फायदा देता है. मजबूत मांसपेशियां जोड़ों को सहारा देती हैं, जबकि अच्छी मोबिलिटी आपको बिना दर्द के हिलने-डुलने की आजादी देती है. साथ ही, जब शरीर का बैलेंस सुधरता है, तो फिसलने या गिरने की चोटों का जोखिम भी कम हो जाता है.
मनीषा कोइराला का वर्कआउट भी इसी बात की सीख देता है.
रोजाना कितनी देर है काफी?
इसके लिए घंटों जिम में पसीना बहाने की कतई जरूरत नहीं है. रोज के महज 10 से 15 मिनट भी काफी हैं- बशर्ते आप इसे नियम से करें.
डॉ. पांडे की सलाह है कि शरीर के साथ जबरदस्ती न करें. खिंचाव उतना ही दें जितना शरीर आराम से बर्दाश्त कर सके. अगर जोड़ों में पहले से कोई दर्द या पुरानी चोट है, तो बेहतर यही होगा कि किसी एक्सपर्ट की निगरानी में ही शुरुआत करें.
उम्र के साथ फिटनेस की परिभाषा भारी वजन उठाने तक सीमित नहीं रह जाती. असल मकसद यह होना चाहिए कि आपका शरीर चलने-फिरने के लिए दूसरों पर निर्भर न रहे. दिखने में फिट होने से कहीं ज्यादा जरूरी है कि रोजमर्रा की जिंदगी में आपका शरीर हल्का, मजबूत और एक्टिव महसूस करे.
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