ताई ची (Tai Chi), जो प्राचीन काल में एक मार्शल आर्ट के रूप में शुरू हुआ था, आज हर उम्र के लोगों के लिए एक सुरक्षित और सरल व्यायाम (low impact exercise) बन चुका है. चाहे युवा हों या बुज़ुर्ग, ताई ची की सहज और गोल घुमावदार मुद्राएं शरीर को कोई नुकसान नहीं पहुंचाती हैं. जिम या हाई-इंटेंसिटी वर्कआउट किए बिना भी फिट रहा जा सकता है. Tai Chi Walking नाम की 2500 साल पुरानी यह कला इन दिनों भारत में तेजी से लोकप्रिय हो रही है. जानिए इसके फायदे और क्यों बुजुर्ग इसे पसंद कर रहे हैं.
भारतीय प्राचीन काल से ही 'माईपायट्टू' (Maipayattu) का अभ्यास करते आ रहे हैं, जिसे ताई ची और किगोंग (Qigong) का शुरुआती रूप माना जाता है. इन दोनों कलाओं के बुनियादी नियम, हरकतें और सांस लेने का तरीका एक जैसा ही है. इनकी मुद्राएं घोड़ा, सांप और शेर जैसे जानवरों की सधी हुई चालों की नकल करती हैं. इसमें योग की तरह गहरी सांस (प्राणायाम) ली जाती है, जो शरीर के चक्रों और ऊर्जा को संतुलित करती है.
शारीरिक फायदे:
ताई ची के अभ्यास से हृदय गति और शरीर के सभी अंदरूनी अंग धीरे-धीरे और एक लय में काम करने लगते हैं, जिससे आप शरीर की प्राकृतिक घड़ी (circadian rhythm) से जुड़ जाते हैं. यह आपको कुदरत की लय के साथ तालमेल बिठाने और मन व शरीर दोनों को जोड़कर खुद की गहराई में उतरने में मदद करता है. इससे मन को परम शांति मिलती है.
जागरूकता और संतुलन:
सांसों को अपने शरीर की गतिविधियों के साथ जोड़कर लोग तनाव से राहत पा सकते हैं. खिंची हुई मांसपेशियों को ढीला छोड़कर और गहरी सांसें लेकर शरीर की मुद्रा (posture), संतुलन और तालमेल सुधरता है. साथ ही, मन शांत होता है और ऊर्जा बढ़ती है.
भारत में ताई ची वॉकिंग का नया ट्रेंड:
भारत में 'ताई ची वॉकिंग' एक नया चलन बन गया है. इसे 'चाइनीज योग' भी कहा जा रहा है और पार्कों व सोशल मीडिया पर यह खूब लोकप्रिय हो रहा है. भारी-भरकम वर्कआउट या जोड़ों पर ज़ोर डालने वाली तेज़ चाल की तुलना में, यह हल्का और सुरक्षित तरीका बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है. खासकर बुजुर्ग इसे बहुत पसंद कर रहे हैं, क्योंकि वे जोड़ों को बिना कोई नुकसान पहुंचाए सक्रिय रह सकते हैं.
हाल ही में चेन्नई में एक ताई ची वर्कशॉप आयोजित की गई थी, जिसका आयोजन भारत में ऑथेंटिक यांग फैमिली ताई ची के प्रमुख 'शिफू जॉर्ज थॉमस' ने किया था. इसमें यांग परिवार की पांचवीं और छठी पीढ़ी के ग्रैंडमास्टर फू शेंग युआन और उनके बेटे फू चिंग क्वान (जेम्स) शामिल हुए थे.
ताई ची को कम से कम 2500 साल पुराना माना जाता है. योग की तरह यह भी स्वास्थ्य और तंदुरुस्ती की एक प्राचीन कला है. इसमें 'ची' (ऊर्जा) एक लहर की तरह बहती है. यह ब्रह्मांड से ऊर्जा लेकर शरीर में जहाँ ज़रूरत होती है, वहाँ पहुँचाती है. यह तकनीक 'यिन और यांग' (संतुलन) के सिद्धांतों पर आधारित है. इसमें शरीर का वज़न एक पैर पर टिका होता है जबकि दूसरा पैर हल्का रहता है. इससे जोड़ों पर बहुत कम दबाव पड़ता है, गिरने का खतरा घटता है और यह बुजुर्गों के लिए पूरी तरह सुरक्षित बन जाता है.
सामंजस्य और शांति:
नियमित रूप से ताई ची करने से विपरीत मुद्राओं के बीच का बदलाव सहज हो जाता है, जिससे व्यक्ति के भीतर तालमेल और संतुलन की समझ बढ़ती है. यह अभ्यास ज़िंदगी की उथल-पुथल के बीच भी मन को शांत और स्थिर रखना सिखाता है.
(लेखक: डॉ. मिकी मेहता, जो दुनिया भर में मशहूर होलिस्टिक हेल्थ एक्सपर्ट हैं. उनके पास 55 साल का योग अभ्यास और भारत में 47 वर्षों तक वेलनेस आंदोलन का नेतृत्व करने का अनुभव है. उन्होंने दुनिया भर में कई मेडिकल व वेलनेस रिसर्च पेपर प्रकाशित किए हैं और वे टाटा मेमोरियल, जसलोक, ब्रीच कैंडी और एशियन कैंसर इंस्टीट्यूट जैसे प्रमुख संस्थानों से जुड़े रहे हैं.)
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