Sickle Cell Disease: सिकल सेल बीमारी (Sickle Cell Disease–SCD) से जुड़े सामाजिक भेदभाव को अब मापा जा सकेगा. नई दिल्ली स्थित भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद (ICMR) के वैज्ञानिकों ने ऐसा स्केल विकसित किया है, जिसके जरिए बीमारी से जुड़ी सामाजिक असमानता को मापा जाएगा. खास बात ये है कि यह भारत का पहला वैज्ञानिक स्केल है, जिसमें मरीज और उसकी देखभाल करने वाले व्यक्ति, दोनों को शामिल किया गया है.
आईसीएमआर के वैज्ञानिकों ने यह स्केल देश के छह अलग-अलग सिकल सेल प्रभावित जिलों में परीक्षण के बाद तैयार किया है. ये स्केल मरीजों और उनके परिजनों पर पड़ने वाले सामाजिक और मानसिक प्रभाव को समझने में सहायता करेगा. इसके अलावा भविष्य में इलाज व सरकारी नीतियों को बेहतर बनाने में लाभकारी साबित होगा.

वैज्ञानिकों ने क्या विकसित किया?
भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के वैज्ञानिकों ने आईसीएमआर– भारत के लिए सिकल सेल कलंक पैमाना (ISSSI) नाम का स्केल तैयार किया है. इसमें सिकल सेल बीमारी से पीड़ित मरीजों के लिए आईएसएसएसआई-पीटी (ISSSI-Pt) और मरीजों की देखभाल करने वाले परिजनों के लिए आईएसएसएसआई-सीजी (ISSSI-Cg) टूल को शामिल किया गया है.
क्यों महत्वपूर्ण है यह स्केल?
सिकल सेल बीमारी भारत में एक बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है, विशेषकर मध्य, पश्चिमी और दक्षिणी भारत के आदिवासी बहुल इलाकों में जिसमें छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, ओडिशा, झारखंड और तमिलनाडु के आदिवासी क्षेत्र शामिल हैं. यहां लोग सिर्फ बीमारी से शारीरिक रूप से पीड़ित नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक परेशानियों का भी सामना करते हैं. उन्हें समाज में भेदभाव का डर, शादी और परिवार से जुड़ी चिंताएँ, बीमारी छिपाने की मजबूरी, बार-बार अस्पताल जाने की वजह से सामाजिक दूरी, मानसिक तनाव और जीवन की गुणवत्ता में कमी जैसी सामाजिक असमानता का सामाना करना पड़ता है. इन समस्याओं को मापने का भारत में अब तक कोई मानकीकृत वैज्ञानिक तरीका उपलब्ध नहीं था.
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सिकल सेल उन्मूलन मिशन की दिशा में बड़ा कदम
आईसीएमआर-राष्ट्रीय जनजातीय स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान जबलपुर के निदेशक बोनथा वी. बाबू ने बताया कि यह स्केल बीमारी से जुड़े भेदभाव के कई पहलुओं की पहचान करेगा. इसमें पारिवारिक और वैवाहिक दबाव, बीमारी बताने का डर, सामाजिक व्यवहार में बदलाव, स्वास्थ्य सेवाओं में अनुभव होने वाली कठिनाइयाँ और खुद को बोझ समझे जाने की भावना शामिल है. उन्होंने कहा कि स्केल के जरिए मरीजों की मानसिक और सामाजिक जरूरतें बेहतर समझी जा सकेंगी और उपचार योजनाएं अधिक प्रभावी बनेंगी. इससे जागरूकता कार्यक्रमों को दिशा मिलेगी और राष्ट्रीय सिकल सेल उन्मूलन मिशन को भी मजबूती मिलेगी.
कर्नाटक के मैसूर स्थित जेएसएस मेडिकल कॉलेज में प्रमाणित जेनेटिक काउंसलर और एनाटॉमी की प्रोफेसर डॉ. दीपा भट के अनुसार, यह नया स्केल सिकल सेल बीमारी से जुड़े सामाजिक भेदभाव को पहचानने और कम करने की दिशा में भारत का एक बड़ा वैज्ञानिक कदम है, जिससे मरीजों की जीवन गुणवत्ता सुधारने में मदद मिलेगी.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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