हमारे हिंदुस्तान के हर घर में देसी घी का एक अलग ही रुतबा है. चाहे दाल में तड़का लगाना हो, त्योहार की मिठाइयां हों, या गरमा-गरम रोटी पर चुपड़ना हो, इसके बिना खाना अधूरा लगता है. घर के बुजुर्ग हमेशा यही कहते आए हैं कि घी खाओगे तो ही हड्डियां मजबूत होंगी और जिस्म में ताकत आएगी. माएं भी बच्चों को जबरदस्ती कटोरी भरकर घी खिलाती हैं. सच कहें तो हमारे यहां घी पर आंख बंद करके भरोसा किया जाता है. ये भरोसा सदियों पुरानी आदतों से बना है, किसी ने बैठकर इसके नफे-नुकसान का हिसाब नहीं लगाया. और बस यहीं से असल मुश्किल शुरू होती है. जब किसी चीज को हम एकदम अमृत मान लेते हैं और वो खाने में भी बेइंतहा लाजवाब हो, तो हम उसकी मात्रा नापना भूल जाते हैं.
इसी बारे में ज्यादा जानकारी के लिए एनडीटीवी ने बात की भारत के एक प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) और इंटरनल मेडिसिन के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. मोहसिन वली (डॉ. एम. वली) से. पद्मश्री से सम्मानित डॉ. एम. वली ने बताया कि घी सबसे सेफ फैट है. आप इसे आहार में बिना डरे शामिल कर सकते हैं.
घी को लेकर इतना भरोसा क्यों है
आयुर्वेद और हमारे पुराने नुस्खों में घी को केवल खाना पकाने वाला तेल नहीं, बल्कि एक औषधि का दर्जा दिया गया है. लेकिन जब आप इसकी न्यूट्रिशनल वैल्यू को ध्यान से देखते हैं, तो कहानी थोड़ी बदल जाती है.
घी में लगभग 62 प्रतिशत सैचुरेटेड फैट होता है. केवल 100 ग्राम घी के अंदर करीब 883 किलोकैलोरी ऊर्जा छुपी होती है.
डॉ. एम. वली ने बताया कि ये कोई छोटी-मोटी ऊर्जा नहीं है. ये इतनी भारी कैलोरी है जिसे लोग बिना सोचे-समझे चम्मचों के हिसाब से थाली में उड़ेल लेते हैं. घी अपने आप में कोई जहर नहीं है. असली परेशानी ये है कि हम दिनभर में कितना घी गटक रहे हैं.
जरा सोचिए, एक चम्मच तड़के में चला गया, दूसरा चावल के ऊपर पिघल गया, और तीसरा गरम रोटी पर ये सोचकर लगा दिया कि स्वाद बढ़ जाएगा. उस पल तो एक-एक चम्मच बिल्कुल मामूली लगता है. लेकिन जब पूरे दिन या हफ्ते का हिसाब जोड़ेंगे, तो आंकड़ा देखकर होश उड़ जाएंगे.
स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार एक स्वस्थ वयस्क व्यक्ति दिन में 1 से 2 छोटी चम्मच (लगभग 5-10 ग्राम) देसी घी का सेवन कर सकता है. ज्यादा मात्रा में घी खाने से सैचुरेटेड फैट बढ़ सकता है, जिससे कोलेस्ट्रॉल, मोटापा और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है.
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ज्यादा सैचुरेटेड फैट जिस्म के साथ क्या करता है
जब हमारे शरीर में सैचुरेटेड फैट जरूरत से ज्यादा पहुंचने लगता है, तो लिवर खून से बैड कोलेस्ट्रॉल को बाहर नहीं निकाल पाता. अब ये बचा हुआ कोलेस्ट्रॉल कहीं गायब तो होगा नहीं. ये धीरे-धीरे खून ले जाने वाली धमनियों यानी आर्टरीज की दीवारों पर चिपकने लगता है. वक्त के साथ ये नसें संकरी होती जाती हैं और दिल तक खून पहुंचना मुश्किल होने लगता है.
डॉ. एम. वली ने बताया कि भारतीयों के लिए ये खतरा और भी ज्यादा बड़ा है. हमारी बनावट ऐसी होती है कि हम बाहर से भले दुबले-पतले दिखें, लेकिन अंदर विसरल फैट बहुत तेजी से जमा होता है. यही वजह है कि डॉक्टरों ने एशियाई लोगों के लिए ओवरवेट का बीएमआई स्तर 25 के बजाय 23 ही तय किया है. अब सोचिए, एक तरफ तो हमारा शरीर पहले से इस खतरे के मुहाने पर है, और ऊपर से हम बिना नापे-तोले घी के बड़े-बड़े चमचे खाने में उड़ेल रहे हैं. ये तो वही बात हुई कि आग में जानबूझकर घी डालना.
तो फिर आखिर एक दिन में कितना घी खाना सही है
घी अच्छा है या बुरा, इस बहस में लोग अक्सर उलझ कर रह जाते हैं. पर इसका सीधा और साफ जवाब मौजूद है:
- एक तंदुरुस्त वयस्क इंसान दिनभर में 1 से 2 छोटी चम्मच घी आराम से खा सकता है.
- दिनभर का पूरा फैट, जिसमें कुकिंग ऑयल, मक्खन और घी सब शामिल हैं, वो 20 से 50 ग्राम के बीच ही रहना चाहिए. ये इस बात पर निर्भर करता है कि आप दिनभर में कितनी मेहनत या कसरत करते हैं.
- आपकी रोज की कुल कैलोरी में सैचुरेटेड फैट की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत से कम होनी चाहिए.
- जिन लोगों को पहले से दिल की बीमारी, शुगर या बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रॉल है, उनके लिए ये लिमिट और कम हो जाती है. ऐसे मरीजों को दिन में सिर्फ 1 छोटी चम्मच घी तक ही सीमित रहना चाहिए. बाकी खाना पकाने के लिए सरसों का तेल, मूंगफली या तिल का तेल इस्तेमाल करना दिल के लिए ज्यादा सुरक्षित रहता है.
सुधार का रास्ता बहुत ही आसान है
इसका ये मतलब कतई नहीं है कि आप आज ही से घी खाना पूरी तरह छोड़ दें और संडे की दाल का स्वाद बिगाड़ लें. न ही आपको एक चम्मच घी खाने के बाद गिल्ट महसूस करने की जरूरत है. बस अपनी एक छोटी सी आदत बदलनी है.
- घी को खाना पकाते वक्त कढ़ाई में अंधाधुंध डालने के बजाय, खाना बनने के बाद ऊपर से खुशबू के लिए इस्तेमाल करें.
- प्लेट में परोसते वक्त सिर्फ आधा या एक चम्मच ऊपर से डाल लें. इससे स्वाद और महक दोनों भरपूर मिलेंगे और शरीर को नुकसान भी नहीं पहुंचेगा.
- सबसे जरूरी बात ये है कि अंदाजे से डालना बंद करें और चम्मच से नापकर ही इस्तेमाल करें.
घी हमारी रसोई का कोई विलेन या दुश्मन नहीं है. बस फर्क इतना है कि हमें बड़े वाले करछुल को छोड़कर छोटी चम्मच का सहारा लेना होगा. अगर आपने ये संतुलन सीख लिया, तो हमारी पुरानी परंपरा और दिल की सेहत, दोनों खुशी-खुशी एक ही थाली में साथ निभाएंगे.
यह लेख डॉ. मोहसिन वली (डॉ. एम. वली) भारत के एक प्रख्यात हृदय रोग विशेषज्ञ (कार्डियोलॉजिस्ट) और इंटरनल मेडिसिन के वरिष्ठ चिकित्सक से बातचीत पर आधारित है.
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