
Schizophrenia: गुरुग्राम स्थित Emoneeds की एक नई रिसर्च ने सिजोफ्रेनिया से जूझ रहे मरीजों के लिए उम्मीद की किरण दिखाई है. अध्ययन में पाया गया कि दवाओं के साथ डिजिटल रिहैबिलिटेशन प्रोग्राम जोड़ने से मरीजों की जीवन-गुणवत्ता, रोज़मर्रा की कार्यक्षमता और बीमारी के लक्षणों में काफी सुधार देखा गया. इस शोध को Indian Journal of Health and Well-being में प्रकाशित किया गया है.
इमोनीड्स की संस्थापक, मनोवैज्ञानिक और शोधकर्ता डॉक्टर नीरजा अग्रवाल ने बताया कि करीब डेढ़ साल तक चले इस शोध में 20 से 60 साल के 70 मरीजों को लिया गया. और इनको दो ग्रुप्स में बांटा गया. ट्रीटमेंट और कंट्रोल ग्रुप. डिजिटल प्रोग्राम पूरा करने वाले मरीजों की ज़िंदगी में एक बड़ा बदलाव दिखा.
प्रोग्राम में क्या-क्या शामिल था?
- रोज़ाना 5-10 मिनट की टेली-मॉनिटरिंग कॉल
- नियमित अंतराल पर टेली-साइकेट्रिस्ट से परामर्श
- हफ्ते में एक बार ऑनलाइन साइकोथेरेपी (CBT व सपोर्टिव थेरेपी)
- परिवार के लिए मासिक सेशन और साप्ताहिक वेबिनार
- ज़रूरत पड़ने पर Cognitive Remediation Therapy (CRT) और Social Skills Training (SST)
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डॉक्टर नीरजा कहती हैं कि शोध से ये साबित हुआ कि ट्रीटमेंट के साथ साथ डिजिटल प्रोग्राम के साथ जुड़ने से जीवन की गुणवत्ता, कार्य क्षमता और सिजोफ्रेनिया के लक्षण में कमी देखी गई.
भारत में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की कमी और इलाज की सीमित उपलब्धता को देखते हुए डिजिटल रिहैबिलिटेशन एक सस्ता, सुलभ और असरदार विकल्प बन सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इससे परिवार पर देखभाल का बोझ घटेगा और मरीजों की दोबारा अस्पताल भर्ती होने की आशंका भी कम होगी.
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(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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