हाल ही में मध्य प्रदेश के उमरिया में कथित कुपोषण से एक बच्चे की मौत की खबर चर्चा में रही. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि बच्चों में कुपोषण (Malnutrition) सिर्फ वजन कम होने की समस्या नहीं है, बल्कि यह उनकी इम्युनिटी, शारीरिक विकास और दिमागी क्षमता को भी प्रभावित कर सकता है. बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. रोली मुंशी बता रही हैं कुपोषण के लक्षण, खतरे और बचाव के तरीके.
वे सोचते हैं कि बच्चा थोड़ा बड़ा होगा तो खुद ब खुद ठीक हो जाएगा, या फिर इसे नजरअंदाज कर देते हैं. लेकिन एक बाल रोग विशेषज्ञ के तौर पर कुपोषण सिर्फ वजन कम होना भर नहीं है. यह धीरे-धीरे बच्चे के शरीर के हर मुख्य अंग, उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता और उसके दिमाग पर गहरा असर डालता है.
कुपोषण का असली मतलब क्या है
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO के मुताबिक कुपोषण केवल पेट भरने या कम खाना खाने से जुड़ा मामला नहीं है. इसका सीधा संबंध इस बात से है कि बच्चे के शरीर को जरूरी विटामिन, मिनरल्स, प्रोटीन और कैलोरी सही मात्रा में मिल रहे हैं या नहीं. मेडिकल भाषा में बच्चों में कुपोषण मुख्य रूप से तीन रूपों में देखा जाता है.
- वेस्टिंग: इसमें बच्चे का वजन उसकी लंबाई के अनुपात में बहुत ज्यादा कम हो जाता है. बच्चा एकदम सूख जाता है. यह स्थिति सबसे खतरनाक और जानलेवा होती है.
- स्टंटिंग: इसमें उम्र के हिसाब से बच्चे की लंबाई नहीं बढ़ती. यह लंबे समय से चले आ रहे पोषण के अभाव को दिखाता है.
- अंडरवेट: इसमें उम्र के हिसाब से वजन का सामान्य से काफी कम होना शामिल है.
कमजोर इम्युनिटी और बार-बार होने वाले संक्रमण
लंबे समय तक प्रोटीन, आयरन, जिंक, विटामिन ए और अन्य जरूरी माइक्रोन्यूट्रिएंट्स की कमी का सबसे पहला और गहरा असर बच्चे के इम्यून सिस्टम पर पड़ता है. जब शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता टूटने लगती है, तो आम बीमारियां भी विकराल रूप ले लेती हैं.
- सामान्य दस्त और उल्टी की समस्या भी गंभीर डिहाइड्रेशन में बदल जाती है.
- सर्दी-जुकाम और सीने का संक्रमण बहुत तेजी से निमोनिया का रूप ले लेता है.
- किसी भी छोटी बीमारी से उबरने में बच्चे को सामान्य से तीन गुना ज्यादा समय लगता है.
यूनिसेफ की रिपोर्ट भी यही कहती है कि गंभीर रूप से वेस्टेड बच्चों में कमजोर इम्युनिटी के कारण मौत का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.
दिमाग और शारीरिक विकास पर पड़ता है सीधा असर
शुरुआती सालों में बच्चे का दिमाग और शरीर बहुत तेजी से ग्रो करता है. इस नाजुक उम्र में अगर नन्हे शरीर को सही पोषण न मिले, तो उसकी सोचने-समझने की शक्ति और बौद्धिक क्षमता कमजोर रह जाती है.
स्टंटिंग का शिकार बच्चों में सीखने की क्षमता कम हो जाती है. स्कूल में उनका ध्यान नहीं लगता और उनकी याददाश्त पर बुरा असर पड़ता है. इसके अलावा हड्डियों का घनत्व कम रह जाता है और मांसपेशियां पूरी तरह विकसित नहीं हो पातीं. आगे चलकर वयस्क होने पर भी ऐसे लोग शारीरिक रूप से जल्दी थक जाते हैं और कई बीमारियों से घिर जाते हैं. इसलिए बच्चे के विकास की नियमित निगरानी बहुत जरूरी है.
किन लक्षणों को कभी नजरअंदाज न करें
माता-पिता को घर पर बच्चे के व्यवहार और शरीर में दिखने वाले इन बदलावों को लेकर हमेशा सतर्क रहना चाहिए.
- लगातार वजन का गिरना या उम्र के हिसाब से वजन बिल्कुल न बढ़ना.
- बच्चे की लंबाई का अपनी उम्र के अन्य साथियों से काफी कम रह जाना.
- हर वक्त सुस्ती, चिड़चिड़ापन और खेलकूद या खिलौनों में कोई रुचि न दिखाना.
- बच्चे की भूख एकदम खत्म हो जाना या खाना देखकर उल्टी जैसा महसूस होना.
- हर महीने बार-बार बुखार, खांसी या पेट खराब होने की सम्स्या होना.
- चेहरे और पैरों पर हल्की सूजन दिखना या त्वचा का सूखा व बेजान हो जाना.
गंभीर मामलों में सिर्फ घरेलू टोटकों के भरोसे न बैठें. अगर बच्चा बहुत ज्यादा कमजोर दिख रहा है, तो तुरंत नजदीकी डॉक्टर के पास जाकर उसका चिकित्सकीय परीक्षण करवाएं.
थाली में क्या होना चाहिए
माता-पिता अक्सर सोचते हैं कि बच्चे को भरपेट चावल या रोटी खिला दी तो काम हो गया. ऐसा सोचना बिल्कुल गलत है. केवल कैलोरी देना काफी नहीं है, खाने में विविधता होना बेहद जरूरी है.
- प्रोटीन के स्रोत: रोज के भोजन में दालें, चना, अंडा, दूध, पनीर या दही जरूर शामिल करें ताकि मांसपेशियों का सही निर्माण हो सके.
- ऊर्जा के लिए साबुत अनाज: दलिया, खिचड़ी, बाजरा और रागी जैसे पारंपरिक अनाज बच्चों के लिए बहुत फायदेमंद होते हैं.
- मौसमी फल और सब्जियां: हरी पत्तेदार सब्जियां, गाजर, पपीता और केला विटामिन्स और मिनरल्स की कमी को पूरा करते हैं.
- साफ-सफाई और पानी: कई बार खराब पानी और गंदगी की वजह से पेट में कीड़े पड़ जाते हैं, जिससे खाया-पिया शरीर को नहीं लगता. इसलिए पीने का पानी हमेशा उबालकर या साफ ही दें.
डॉक्टर की सलाह
अगर आपके बच्चे का वजन लगातार कम हो रहा है या आंगनवाड़ी व अस्पताल के ग्रोथ चार्ट पर उसका विकास सामान्य रेखा से नीचे जा रहा है, तो बिना देर किए पीडियाट्रिशियन की सलाह लें. शुरुआती चरण में सही डाइट और जरूरी सप्लीमेंट्स की मदद से कुपोषण को पूरी तरह ठीक किया जा सकता है. याद रखिए, आज का सही पोषण ही आपके बच्चे के कल के उज्ज्वल भविष्य की मजबूत बुनियाद है.
लेखक: डॉ. रोली मुंशी (सीनियर कंसल्टेंट – पीडियाट्रिक्स एवं नियोनेटोलॉजी, यथार्थ हॉस्पिटल, नोएडा 110)
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