हाल ही में एलन मस्क की कंपनी Neuralink ने एक वीडियो शेयर किया, जिसने दुनियाभर का ध्यान अपनी ओर खींचा. वीडियो में जो व्यक्ति बोल नहीं सखता उस मरीज ने दिमाग में लगी N1 ब्रेन चिप की मदद से बिना मुंह खोले अपने पार्टनर को 'I Love You' कहा. कंप्यूटर ने उसके दिमागी संकेतों को आवाज में बदल दिया और उसके इमोशन शब्द बनकर बाहर आ गए. ये सिर्फ एक टेक्नोलॉजी डेमो नहीं था, बल्कि उन लाखों लोगों के लिए उम्मीद की किरण भी था, जो बीमारी या चोट के कारण बोलने की क्षमता खो चुके हैं.
इसी विषय पर सीके बिड़ला हॉस्पिटल के न्यूरोलॉजी डिपार्टमेंट के डायरेक्टर डॉ. केके जिंदल बताते हैं कि ALS (Amyotrophic Lateral Sclerosis) जैसी बीमारी में अक्सर मरीज की आवाज चली जाती है, लेकिन उसकी सोचने, समझने और कम्युनिकेशन करने की क्षमता बरकरार रहती है. ऐसे में Brain-Computer Interface (BCI) और ब्रेन-टू-वॉइस तकनीक भविष्य में मरीजों को फिर से अपनी बात कहने की ताकत दे सकती है.
ALS में आवाज क्यों चली जाती है?
डॉ. जिंदल बताते हैं कि Amyotrophic Lateral Sclerosis (ALS) एक प्रोग्रेसिव न्यूरोलॉजिकल बीमारी है, जो उन मोटर न्यूरॉन्स को नुकसान पहुंचाती है, जो दिमाग से मांसपेशियों तक संदेश पहुंचाते हैं. बीमारी बढ़ने के साथ जीभ, होंठ, जबड़े और गले की मांसपेशियां कमजोर होने लगती हैं, जिससे बोलना मुश्किल हो जाता है.
खासकर Bulbar-onset ALS में बोलने और निगलने से जुड़ी समस्याएं शुरुआती चरण में ही दिखाई दे सकती हैं. मरीज की आवाज़ लड़खड़ाने लगती है, शब्द स्पष्ट नहीं निकलते और धीरे-धीरे सामान्य बातचीत भी चुनौती बन जाती है.
आवाज चली जाती है, लेकिन संवाद करने की इच्छा नहीं
डॉक्टर कहते हैं कि ALS को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी ये है कि लोग अक्सर मान लेते हैं कि जब मरीज बोल नहीं पा रहा तो शायद वह सोच भी नहीं पा रहा होगा. जबकि सच्चाई बिल्कुल अलग है.
डॉ. जिंदल बताते हैं कि बोलना एक बहुस्तरीय प्रक्रिया है. सबसे पहले दिमाग में विचार बनते हैं, फिर भाषा तैयार होती है, उसके बाद न्यूरल सिग्नल मांसपेशियों तक पहुंचते हैं और अंत में आवाज पैदा होती है.
ALS इस प्रक्रिया के अंतिम हिस्से को प्रभावित करता है. यानी मरीज का दिमाग पूरी तरह सक्रिय हो सकता है, उसके पास कहने के लिए बहुत कुछ हो सकता है, लेकिन वह उन शब्दों को आवाज नहीं दे पाता.
ब्रेन-टू-वॉइस कैसे काम करती है?
ये टेक्नीक दिमाग की गतिविधियों को रिकॉर्ड करती है और विशेष एल्गोरिदम की मदद से उन संकेतों को समझने की कोशिश करती है, जो व्यक्ति के बोलने के इरादे से जुड़े होते हैं. इसके बाद उन संकेतों को टेक्स्ट या सिंथेटिक आवाज में बदला जा सकता है.
Neuralink की ओर से दिखाए गए हालिया डेमो में भी यही देखने को मिला, जहां मरीज के दिमागी संकेतों को कंप्यूटर की आवाज में बदला गया और उसने 'I Love You' कहकर अपनी भावना व्यक्त की. हालांकि, कंपनी ने ये भी स्पष्ट किया है कि यह अभी शुरुआती चरण की तकनीक है और इसके परिणाम सभी लोगों में समान हों, यह जरूरी नहीं है.
क्या यह 'माइंड रीडिंग' है?
डॉ. जिंदल कहते हैं कि इस तकनीक को लेकर लोगों में सबसे बड़ा भ्रम यही है कि यह किसी के मन की हर बात पढ़ सकती है.
असल में ऐसा नहीं है. BCI सिस्टम किसी व्यक्ति के निजी विचारों को स्कैन नहीं करता. यह केवल उन न्यूरल गतिविधियों को पहचानने की कोशिश करता है जो जानबूझकर बोलने या संवाद करने के प्रयास के दौरान उत्पन्न होती हैं. यानी मरीज को अपनी बात कहने की इच्छा और प्रयास करना पड़ता है.
सिर्फ बोलने के लिए नहीं, पहचान बचाने के लिए भी अहम
अगर यह तकनीक सफल होती है, तो इसका फायदा सिर्फ बातचीत तक सीमित नहीं रहेगा. ALS मरीजों के लिए संवाद करना अपने दर्द, जरूरत, भावनाएं और निर्णय बताने का जरिया होता है. इसके अलावा वैज्ञानिक ऐसी सिंथेटिक आवाजों पर भी काम कर रहे हैं जो मरीज की अपनी पुरानी आवाज जैसी सुनाई दें.
डॉ. जिंदल के मुताबिक, किसी ऐसे व्यक्ति के लिए जिसने बीमारी के कारण अपनी आवाज खो दी हो, अपनी जैसी आवाज फिर से सुन पाना भावनात्मक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अनुभव हो सकता है.
अभी लंबा सफर है बाकी
डॉक्टर कहते हैं कि Brain-to-Voice Technology लोगों में उम्मीद जगाती है, लेकिन यह अभी ट्रायल स्टेप में है. इसकी लंबी अवधि की विश्वसनीयता, सर्जिकल जोखिम, ब्रेन एनाटॉमी में व्यक्तिगत अंतर और आम मरीजों तक पहुंच जैसी कई चुनौतियां अभी बाकी हैं. फिर भी विशेषज्ञ मानते हैं कि यह रिसर्च ALS मरीजों के लिए एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है.
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