FIFA World Cup 2026: 'सफलता का मतलब मुश्किलों से बचना नहीं है, बल्कि यह है कि आप उनका सामना कैसे करते हैं." पेड्रो पोरो का करियर इसी सोच का एक बेहतरीन उदाहरण है. दरअसल, स्पेन ने फीफा वर्ल्ड कप 2026 के फाइनल का टिकट हासिल कर लिया है, सेमीफाइनल मुकाबले में स्पेन ने शानदार प्रदर्शन करते हुए फ्रांस को 2-0 से हराया, स्पेन की जीत में पेड्रो पोरो हीरो रहे जिन्होंने मैच के 58वें मिनट में शानदार गोल करते हुए स्पेन की बढ़त को 2-0 कर दिया जिसके बाद फ्रांस के लिए वापसी करना मुश्किल हो गया.

गोल करने के बाद अपने बेटे के लिए मनाया जश्न
गोल करने के बाद पोरो ने अनोखे अंदाज में जश्न मनाया, उन्होंने पहले अपने साथियों के साथ गोल का जश्न मनाया, फिर जमीन पर पालथी मारकर बैठ गए और हवा में अपनी दाहिनी मुट्ठी उठाई. सोशल मीडिया पर यह सेलिब्रेशन वायरल हो रहा है. दरअसल, यह जश्न उनके नन्हे बेटे के लिए था, जो बीमार है और अपने पिता को खेलते हुए देखने नहीं आ सका. पेड्रो पोरो ने मैच के बाद हुए इंटरव्यू में टोटेनहम हॉटस्पर के राइट-बैक ने कहा, "मेरा बेटा, जो आज मेरे साथ नहीं आ सका क्योंकि उसे बुख़ार है"
बता दें कि आज स्पेन फाइनल में हैं जिसमें पेड्रो पोरो ने अहम भूमिका निभाई है. लेकिन यहां तक पहुंचने में पेड्रो पोरो का सफर बहुत ज़्यादा त्याग और मुश्किलों भरा रहा है
स्पेन के जीत के हीरो पेड्रो पोरो की प्रेरणादायक कहानी
पेड्रो पोरो का जन्म 13 सितंबर 1999 को लुइस और ईवा पोरो के घर हुआ था, वे स्पेनिश मूल के हैं और उनका परिवार और पालन-पोषण पश्चिमी स्पेन के एक्सट्रेमादुरा इलाके में हुआ है. पोरो के पिता एक बिल्डर थे, जबकि उनकी मां डॉन बेनिटो में परिवार की मदद के लिए एक लोकल सुपरमार्केट में काम करती थीं. काम के व्यस्त शेड्यूल के कारण, पोरो और उनके भाई विक्टर की परवरिश मुख्य रूप से उनके नाना-नानी, एंटोनियो सॉसेडा और मारिया डेल कारमेन ने की थी.

नाना की कही बात हमेंशा रखते हैं याद
पेड्रो के नाना का उनके जीवन पर बहुत गहरा असर था, एक इंटरव्यू में, पेड्रो पोरो ने उस बात को याद किया जो उनके नाना अक्सर उनसे कहते थे, "मुझे किसी जेल में छोड़ दो और मैं वहाँ का मालिक बन जाऊंगा" लपोरो ने कहा, "यह बात मेरे नाना ने मुझे सिखाई थी, और इसीलिए मैं इसे दोहराता हूं. यह भावना ज़रूरी नहीं कि बुरी हो. यह जीतने की भावना भी है. खेल में यह सकारात्मक हो सकती है. जब से मैंने शुरुआत की है, यह मेरे स्वभाव का हिस्सा रही है."
14 साल की उम्र में छोड़ना पड़ा घर
जब पोरो सिर्फ़ 14 साल के थे, तो उन्होंने अपने सपने को पूरा करने के लिए एक बड़ा फ़ैसला लिया, अपना होमटाउन 'डॉन बेनिटो' छोड़कर मैड्रिड में 'रायो वैलेकानो' की अकादमी में शामिल हो गए. यह जगह उनके घर से 205 मील दूर थी, यानी उन सभी लोगों और जगहों से तीन घंटे की ड्राइव की दूरी पर, जिन्हें वह जानते थे. पोरो कहते हैं, "मैं बहुत कम उम्र में घर से निकल गया था और सच कहूं तो, वह मेरी ज़िंदगी के सबसे मुश्किल पलों में से एक था."
आर्थिक अनिश्चितता को सहना
एक छोटे शहर से निकलकर मैड्रिड जैसे बड़े शहर में जाना किसी के लिए भी चुनौतीपूर्ण होता है और खासकर किसी बच्चे के लिए, पेड्रो पोरो के लिए यह संघर्ष दिल को तोड़ने जैसा था. पोरो के माता-पिता ने अपनी सीमित आय में से उनके खेल के उपकरणों (जूते, किट), कोचिंग फीस और शहर से बाहर रहने के खर्चों का प्रबंध किया. उन्होंने इस दौरान अपनी बचत का एक बड़ा हिस्सा पेड्रो के भविष्य पर दांव पर लगा दिया था.

मां-बाप के त्याग ने पेड्रो को बनाया मैदान का जादूगर
पेड्रो जब 15-16 साल की उम्र में थे तो उन्हें अपने मां और पिता को छोड़कर मैड्रिड जाना पड़ा. मां-बाप से दूर रहकर पेड्रो फुटबॉल अकेडमी में गए और अकेले रहकर अपने करियर के लिए मेहनत करते रहे, बिना किसी पारिवारिक सुरक्षा के अकेले छोड़ना हर माता-पिता के लिए एक बड़ा भावनात्मक बलिदान होता है. पेड्रो के माता-पिता ने उस अकेलेपन को सहा जिससे उनका बच्चा अपने फुटबॉल के सपनों को जी सके. पेड्रो के माता-पिता ने कभी भी अपने लिए सुख-सुविधाओं को प्राथमिकता नहीं दी. हमेशा उन्होंने पेड्रो को वह सभी सुख-सुविधाओं दी जिसके वह हकदार था. मां-बाप के इस त्याग ने पेड्रो को मोटिवेट किया और जिससे वह अपने सपने को साकार कर सके.
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