Khichdi History : आज देश में धूम-धाम के साथ मकर संक्रांति का पर्व मनाया जा रहा है. यह दिन हिंदू धर्म में खास महत्व रखता है. क्योंकि मकरसंक्रांति के दिन सूर्यदेव दक्षिणायन से उत्तरायण होते हैं. यह दिन देवताओं का दिन भी कहा जाता है. इस दिन तिल और गुड़ का दान और सेवन करना बहुत शुभ माना जाता है. इसके अलावा मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी जरूर बनती है. यह इस पर्व का मुख्य भोजन है, जिसके पीछे की कहानी बहुत ही रोचक है. बिना देर किए आइए जानते हैं..
अमीरी-गरीबी का अंतर मिटाती है खिचड़ी
अमीरी-गरीबी के अंतर को मिटाने वाला भोजन खिचड़ी को 'सामाजिक भोजन' कहा जाता है. यह एक ऐसा पकवान है जो अमीर के डाइनिंग टेबल पर भी होता है और गरीब की थाली में भी. मकर संक्रांति के मौके पर खिचड़ी भोज का आयोजन इसीलिए किया जाता है ताकि हर वर्ग, जाति और धर्म के लोग एक साथ बैठकर खा सकें. रोचक बात यह है कि इसी खिचड़ी के जरिए भगवान ने दुनिया को एकता का पाठ पढ़ाया था.

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ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर से जुड़ी एक पुरानी लोककथा है. पुरी में श्रिया नाम की एक महिला रहती थी. वह गरीब और समाज की नजरों में निम्न जाति की थी, लेकिन भगवान जगन्नाथ और माता लक्ष्मी की परम भक्त थी. एक बार उसने 'अष्टलक्ष्मी व्रत' करने की ठानी. जब वह पुजारियों से व्रत की विधि पूछने गई, तो उन्होंने उसे दुत्कार दिया.
भक्ति में डूबी श्रिया दर-दर भटकती रही. उसकी तड़प देख भगवान जगन्नाथ की आंखों से आंसू निकल आए. राजा को समझ आ गया कि मंदिर में कुछ गलत हुआ है और भगवान वहां से चले गए हैं. उधर, नारद मुनि ने श्रिया को व्रत की विधि बताई और माता लक्ष्मी उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसके घर पहुंच गईं. लक्ष्मी जी ने श्रिया को धन-धान्य से भर दिया.
12 साल तक भूखे रहे भगवान12 साल तक भूखे रहे भगवान जब माता लक्ष्मी श्रिया के घर से वापस मंदिर आईं, तो जगन्नाथ जी के बड़े भाई बलभद्र नाराज हो गए. उन्होंने कहा कि लक्ष्मी ने एक 'अछूत' के घर जाकर मंदिर को अपवित्र कर दिया है. गुस्से में बलभद्र ने लक्ष्मी जी को मंदिर से निकाल दिया.
लक्ष्मी जी ने दिया था श्रापजाते-जाते लक्ष्मी जी ने श्राप दिया कि "जब तक आप किसी निम्न कुल के व्यक्ति के हाथ का भोजन नहीं करेंगे, आप भूखे रहेंगे." उनके जाते ही मंदिर का वैभव खत्म हो गया. अनाज सड़ गया, रत्न भंडार खाली हो गया और दोनों भाई (जगन्नाथ-बलभद्र) दाने-दाने को मोहताज हो गए. 12 सालों तक वे भूखे-प्यासे भटकते रहे. उन्हें कहीं भी भीख या भोजन नसीब नहीं हुआ.
भटकते हुए दोनों भाई एक महलनुमा घर पहुंचे, जहां हवन हो रहा था. वहां की मालकिन (जो असल में रूप बदलकर रह रहीं माता लक्ष्मी थीं) ने उन्हें भोजन का सामान भिजवाया. बलभद्र ने खुद खिचड़ी बनाने की कोशिश की, लेकिन आग ही नहीं जली. हार मानकर बलभद्र ने कहा- "जगन, भूख के आगे जात-पात कैसी? जो मिलता है वही खा लेते हैं."
जब उन्होंने वहां की खिचड़ी खाई, तो उन्हें अहसास हुआ कि यह स्वाद तो माता लक्ष्मी के हाथों का है. भगवान ने अपनी गलती मानी और लक्ष्मी जी को ससम्मान मंदिर वापस लाए. उस दिन के बाद से पुरी में ऊंच-नीच का भेदभाव खत्म हो गया. आज भी जगन्नाथ मंदिर में खिचड़ी का 'महाप्रसाद' मिलता है, जिसे हर कोई एक साथ मिलकर ग्रहण करता है.
(अस्वीकरण: सलाह सहित यह सामग्री केवल सामान्य जानकारी प्रदान करती है. यह किसी भी तरह से योग्य चिकित्सा राय का विकल्प नहीं है. अधिक जानकारी के लिए हमेशा किसी विशेषज्ञ या अपने चिकित्सक से परामर्श करें. एनडीटीवी इस जानकारी के लिए ज़िम्मेदारी का दावा नहीं करता है.)
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