New Delhi:
हॉस्टल से पढ़ाई पूरी करके घर लौटी अरुणिमा के ज़ेहन में बार-बार एक ही सवाल उठता है कि उसकी मां की मौत कैसे हुई। धीरे-धीरे अरुणा के शक की सुई अपने ओवरप्रोटेक्टिव और कभी-कभार एग्रेसिव होने वाले पिता पर घूमने लगती है और फिर एक ऐसा मोड़ आता है जब मां के कत्ल की गुत्थी सुलझाती बेटी अपने बाप के सामने आ जाती है। फिल्म 'ये फासले' की कई खूबियां हैं। जैसे शुरू से अंत तक फिल्म इसी सस्पेंस के बीच झूलती है कि खून किसने किया। अरुणा के पिता ने या किसी और ने जब लगने लगता है कि हत्यारा मिल गया तब उसे निर्दोष साबित करने की जद्दोजहद शुरू हो जाती है। अच्छा बैकग्राउंड म्यूज़िक रोमांच को ऊंचाई देता है और फिर एकदम नीचे ले आता है। अनुपम खेर, पवन मल्होत्रा और टीना देसाई की परफॉरमेंस अच्छी है। हालांकि कुछ कमियां हैं जिन पर ज़रा भी यकीन नहीं किया जा सकता। वकीलों की ज़िरह सुनते-सुनते अचानक जज आरोपी को फांसी की सजा सुना देती है। अरुणिमा क्यों नहीं जानती कि वह राजघराने से है। दरअसल, डायरेक्टर योगेश मित्तल की ये फासले रियेलिटी और फिक्शन के बीच घूमती है। इसीलिए सिर्फ रियेलिटी और फैक्ट्स ढूंढने वालों को थोड़ी निराशा हो सकती है। सस्पेंस और थ्रिलर का ये ड्रामा दिमाग से ज्यादा दिल को छूता है। 'ये फासले' के लिए मेरी रेटिंग है 3 स्टार।