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बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद भी अधूरी रह सकती है काशी यात्रा, जानिए कौन-सी परंपरा है जरूरी

काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है. यहां देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं. लेकिन कई लोग दो गलतियां कर देते हैं, जिसकी वजह से उनकी यात्रा अधूरी मानी जाती है.

बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद भी अधूरी रह सकती है काशी यात्रा, जानिए कौन-सी परंपरा है जरूरी
काशी से गंगाजल लाने को लेकर क्या मान्यता है?
(Photo Credit: NDTV)

काशी की यात्रा को हिंदू धर्म में बेहद पवित्र माना जाता है. वाराणसी में स्थित काशी विश्वनाथ मंदिर भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक है और देश-दुनिया से लाखों श्रद्धालु यहां दर्शन के लिए पहुंचते हैं. मान्यता है कि काशी भगवान शिव की नगरी है, जहां स्वयं बाबा विश्वनाथ विराजमान हैं. काशी विश्वनाथ मंदिर को सोने का मंदिर भी कहा जाता है, क्योंकि इसके शिखर को सोने की परतों से सजाया गया है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, काशी को खुद भगवान शिव ने बसाया था, यहां मृत्यु को भी मोक्ष का मार्ग माना जाता है.

काशी में बाबा विश्वनाथ के साथ विराजते हैं काल भैरव

धार्मिक ग्रंथों में काशी का विशेष महत्व बताया गया है. स्कंद पुराण के काशी खंड में उल्लेख मिलता है कि भगवान शिव ने काशी को अपना निवास बनाया. यहां बाबा विश्वनाथ को काशी का राजा माना जाता है, जबकि भगवान काल भैरव को उनका रक्षक या कोतवाल कहा जाता है. मान्यता है कि काल भैरव भगवान शिव के ही स्वरूप हैं और वे काशी की रक्षा करते हैं. भक्तों के बीच यह विश्वास है कि काल भैरव के दर्शन करने से नकारात्मक शक्तियों और कई परेशानियों से मुक्ति मिलती है.

विश्वनाथ दर्शन के बाद काल भैरव के दर्शन क्यों जरूरी माने जाते हैं?

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, अगर कोई भक्त काशी विश्वनाथ के दर्शन करता है, लेकिन उसके बाद काल भैरव मंदिर नहीं जाता, तो उसकी काशी यात्रा अधूरी मानी जाती है. ऐसा माना जाता है कि बाबा विश्वनाथ के दर्शन के बाद काल भैरव के दर्शन करने से यात्रा पूर्ण होती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है. यही वजह है कि कई श्रद्धालु काशी यात्रा के दौरान काल भैरव मंदिर जाना अपनी धार्मिक परंपरा का हिस्सा मानते हैं.

काशी से गंगाजल लाने को लेकर क्या मान्यता है?

काशी जाने वाले कई श्रद्धालु गंगा स्नान करते हैं और पवित्र गंगाजल अपने साथ ले आते हैं. हालांकि, कुछ धार्मिक मान्यताओं में काशी से गंगाजल लेकर आने को उचित नहीं माना गया है. इसके पीछे मान्यता है कि काशी को मोक्ष की नगरी कहा जाता है, जहां मणिकर्णिका घाट जैसे स्थानों पर अंतिम संस्कार किए जाते हैं. धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है- 'काश्यां मरणं मुक्ति', यानी काशी में मृत्यु मोक्ष का मार्ग मानी जाती है.

काशी की यात्रा केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि आस्था, परंपरा और आध्यात्मिक अनुभव से जुड़ी मानी जाती है. बाबा विश्वनाथ के दर्शन, काल भैरव की पूजा और गंगा के प्रति श्रद्धा का काशी की धार्मिक परंपराओं में विशेष महत्व बताया गया है.

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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