आज यानी 14 जुलाई को आषाढ़ अमावस्या मनाई जा रही है. हिन्दू धर्म में हर माह की अमावस्या तिथि का अपना महत्व होता है. लेकिन आषाढ़ मास की अमावस्या तिथि को खास महत्व दिया जाता है. इस दिन पवित्र नदियों में स्नान करना और जरूरतमंदो को दान करना बेहद लाभदायी माना जाता है. साथ ही इस दिन पितरों को याद कर उनका तर्पण करने से उनकी कृपा सदैव बनी रहती है. आषाढ़ माह की अमावस्या को आषाढ़ी अमावस्या और हलहारिणी अमावस्या के नाम से जाता है. इसी कड़ी में आज हम आपको इसके पीछे का कारण और महत्व बताने जा रहे हैं. इसकी जानकारी ज्योतिषाचार्य मदन मोहन ने NDTV से बातचीत के दौरान दी है.
आषाढ़ अमावस्या को क्यों कहा जाता है हलहारिणी अमावस्या?
ज्योतिषाचार्य मदन मोहन बताते हैं कि आषाढ़ मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या या हलहारिणी अमावस्या कहा जाता है. इस दिन हल और कृषि उपकरणों की पूजा मुख्य रूप से कृषि के प्रति सम्मान व्यक्त करने और मां धरती से प्रार्थना करने के लिए की जाती है कि हमारे कृषि कार्य में प्रगति प्राप्त हो. इसी कारण इसे हलहारिणी अमावस्या भी कहा जाता है.
हलहारिणी अमावस्या का महत्व
हलहारिणी अमावस्या पर पितरों की पूजा करना अत्यंत लाभदायक माना जाता है. इस दिन सुबह ब्रह्म मुहूर्त में स्नान कर पितरों का तर्पण करना चाहिए. इसके अलावा आप अपनी क्षमता के अनुसार जरूरतमंद लोगों को अन्न, वस्त्र और अन्य चीजों का दान कर सकते हैं.
आषाढ़ अमावस्या का समय
वैदिक पंचांग के अनुसार, आषाढ़ कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि 13 जुलाई 2026 की शाम 6:49 बजे शुरू होगी और 14 जुलाई 2026 दोपहर 3:12 बजे तक रहेगी. उदया तिथि के अनुसार यह पर्व 14 जुलाई को मनाया जाएगा.
अमावस्या पर करें पितृ स्तोत्रं का पाठ
अर्चितानाममूर्तानां पितृणां दीप्ततेजसाम् ।
नमस्यामि सदा तेषां ध्यानिनां दिव्यचक्षुषाम् ॥
इन्द्रादीनां च नेतारो दक्षमारीचयोस्तथा ।
सप्तर्षीणां तथान्येषां तान् नमस्यामि कामदान् ॥
मन्वादीनां मुनीन्द्राणां सूर्याचन्द्रमसोस्तथा ।
तान् नमस्याम्यहं सर्वान् पितृनप्सूदधावपि ॥
नक्षत्राणां ग्रहाणां च वाय्वग्न्योर्नभसस्तथा।
द्यावापृथिवोव्योश्च तथा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥
देवर्षीणां जनितृंश्च सर्वलोकनमस्कृतान् ।
अक्षय्यस्य सदा दातृन् नमस्येsहं कृताञ्जलि: ॥
प्रजापते: कश्यपाय सोमाय वरुणाय च ।
योगेश्वरेभ्यश्च सदा नमस्यामि कृताञ्जलि: ॥
नमो गणेभ्य: सप्तभ्यस्तथा लोकेषु सप्तसु ।
स्वयम्भुवे नमस्यामि ब्रह्मणे योगचक्षुषे ॥
सोमाधारान् पितृगणान् योगमूर्तिधरांस्तथा ।
नमस्यामि तथा सोमं पितरं जगतामहम् ॥
अग्रिरूपांस्तथैवान्यान् नमस्यामि पितृनहम् ।
अग्नीषोममयं विश्वं यत एतदशेषत: ॥
ये तु तेजसि ये चैते सोमसूर्याग्निमूर्तय:।
जगत्स्वरूपिणश्चैव तथा ब्रह्मस्वरूपिण: ॥
तेभ्योsखिलेभ्यो योगिभ्य: पितृभ्यो यतमानस:।
नमो नमो नमस्ते मे प्रसीदन्तु स्वधाभुज: ॥
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