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Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री का व्रत क्यों किया जाता है? जानें इसकी पूरी कथा, जिसे पढ़े बगैर नहीं मिलता पुण्यफल

Vat Savitri Vrat Katha: पंचांग के अनुसार हर साल ज्येष्ठ या फिर कहें जेठ महीने की अमावस्या तिथि वाले दिन वट सावित्री का व्रत रखा जाता है. सनातन परंपरा में सुहागिन स्त्रियों के द्वारा रखे जाने वाले इस पावन व्रत की कथा का धार्मिक महत्व क्या है? वट सावित्री व्रत की कथा को कब और कैसे पढ़ना चाहिए, विस्तार से जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख.

Vat Savitri Vrat 2026: वट सावित्री का व्रत क्यों किया जाता है? जानें इसकी पूरी कथा, जिसे पढ़े बगैर नहीं मिलता पुण्यफल
Vat Savitri Vrat Story: वट सावित्री व्रत की कथा और पूजा विधि 
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Vat Savitri Vrat Ki Katha: हिंदू धर्म में ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि पर रखे जाने वाले वट सावित्री व्रत का बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. मान्यता है कि विवाहित महिलाओं द्वारा इस व्रत को विधि-विधान से रखने पर उन्हें अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है. पंचांग के अनुसार पति की उम्र बढ़ाने वाला वट सावित्री का व्रत इस साल 16 मई 2026, शनिवार को रखा जाएगा. हिंदू मान्यता के अनुसार वट सावित्री के जिस उपवास से महिलाओं को अखंड सौभाग्यवती होने का वरदान प्राप्त होता है, उसमें न सिर्फ पूजा बल्कि इससे जुड़ी पावन कथा को कहने पर पुण्य की प्राप्ति होती है. आइए वट सावित्री व्रत की संपूर्ण कथा और उसे कहने की विधि के बारे में विस्तार से जानते हैं. 

वट सावित्री व्रत की कथा (Vat savitri Vrat Ki Katha)

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मान्यता है कि एक समय मद्र देश में अश्वपति नाम का राजा राज करता था. वह अत्यंत ही दयालु एवं धार्मिक प्रवृत्ति का था, लेकिन उसके कोई संतान न थी. मान्यता है कि उसने ज्योतिषियों की सलाह पर संतान की मनोकामना को पूरा करने के लिए बड़ा यज्ञ किया. जिसके बाद उसके यहां एक सुंदर कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम उसने सावित्री रखा. जब सावित्री बड़ी हुई तो उसने विवाह के लिए सत्यवान नाम के नवयुवक को चुना. जब यह बात देवर्षि नारद को जब यह बात पता चली तो उन्होंने सावित्री के पिता अश्वपति को बताया कि जिस सत्यवान् से सावित्री विवाह करने जा रही है, उसकी आयु बहुत कम है, ऐसे में उसे कोई दूसरा वर चुनना चाहिए. नारद मुनि से यह बात पता चलते ही राजा अश्वपति ने सावित्री को बहुत समझाने का प्रयास किया, लेकिन सावित्री ने यह तर्क देते हुए अपनी बात पर अड़ी रही कि हिन्दू स्त्रियां वर के रूप में केवल एक ही बार किसी पुरुष को चुनती हैं. इसके बाद राजा अश्वपति ने ने सावित्री का विवाह सत्यवान के साथ कर दिया.

तब नारद ने बताया सत्यवान की मृत्यु का समय  

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Photo Credit: AI Generated Image @ gemini

सत्यवान के पिता का नाम द्युमत्सेन था, जिनका राजपाट छिन चुका था. सत्यवान के माता और पिता दोनों की दृष्टि भी जा चुकी थी और वे वन में रहा करते थे. विवाह के बाद सावित्री भी अपने पति के सत्यवान के साथ उसी वन में रहकर अपने पति के साथ सास-ससुर की सेवा करने लगी. कुछ दिनों बाद नारद मुनि सावित्री के पास आए और उसे बताया कि अब सत्यवान की मृत्यु का समय आ गया है. जब यह बात सावित्री को पता चली तो उसने अपने पति की लंबी आयु की प्राप्ति के लिए उपवास करना प्रारंभ कर दिया. मान्यता है कि जिस तिथि पर सत्यवान की मृत्यु की बात नारद मुनि ने बताई थी, सावित्री ने उस दिन भी अपना व्रत रखा. 

तब सावित्री यमराज के पीछे-पीछे चल पड़ीं 

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सत्यवान उस दिन जब जंगल में लकड़ी काटने के लिए जाने लगा तो सावित्र भी उसके साथ गई. जंगल में सत्यवान जब लकड़ी काट रहा था तो उसके सिर में अचानक से बहुत ज्यादा पीड़ा होने लगी औ वह सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गया. सावित्री ने अचानक देखा कि वहां पर यम देवता अपने दूतों के साथ आ पहुंचे हैं. इसके बाद जब यमराज सत्यवान के प्राण हर ने के बाद दक्षिण दिशा की ओर जाने लगे तो सावित्री भी उनके पीछे-पीछे चलने लगी.   सावित्री को पीछे आता देख यमराज ने कहा कि हे पतिव्रता नारी! जहां तक तमु अपने पति का साथ दे सकती थी तुमने दिया, अब तुम वापस लौट जाओ. तब सावित्री ने कहा कि "जहां मेरे पति रहेंगे, मुझे भी उनके साथ वहीं रहना है. यही मेरा पति के प्रति धर्म है. 

फिर यमराज ने दिया सावित्री को ये वरदान 

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सावित्री की बात को सुनकर यमराज प्रसन्न हो गये और उन्होंने उससे वर मांगने को कहा. तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर की आंखों की रोशनी लौटाने को कहा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए सावित्री को लौट जाने को कहा, लेकिन फिर सावित्री उनके पीछे-पीछे चलती रही. सावित्री की पतिव्रता को देखते हुए एक बार फिर यमराज ने उससे वर मांगने को कहा. तब सावित्री ने उनसे अपने सास-ससुर से खोया हुआ राज्य वापस मांगा. यमराज ने तथास्तु कहते हुए उसकी यह मनोकामना भी पूरी कर दी, लेकिन सावित्री फिर भी यम देवता के पीछे-पीछे चलती रही.

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सावित्री के द्वारा पतिव्रत धर्म को निभाता देख एक बार फिर यमराज ने सावित्री से वर मांगने को कहा, तब उसने बोला मैं सत्यवान के 100 पुत्रों की मां बनना चाहती हूं. यमराज ने सावित्री के ​पतिव्रता को देखते हुए यह वरदान भी दिया और सत्यवान के प्राण वापस लौटा दिये. इस प्रकार सावित्री ने न ​सिर्फ अपने पति के प्राण बल्कि अपने सास-ससुर की दृष्टि और राज्य को भी वापस दिलवा दिया. मान्यता है कि इस वट सावित्री की इस पावन कथा को कहने या सुनने से विवाहित महिलाओं को अखंड सौभाग्य का वरदान प्राप्त होता है. 

वट सावित्री व्रत कथा की विधि 

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हिंदू मान्यता के अनुसार वट सावित्री की पावन कथा को कहकर या फिर सुनकर पुण्यलाभ लेने के लिए प्रात:काल स्नान-ध्याान करने के बाद शुभता और सौभाग्य को बढ़ाने वाले लाल या पीले रंग के वस्त्र धारण करना चाहिए. इसके बाद किसी स्वच्छ वट वृक्ष के नीचे या फिर घर में वट की टहनी को गमले में लगाकर उसके पास सावित्री और सत्यवान का चित्र रखना चाहिए. इसके बाद उसकी विधि-विधान से पूजा और परिक्रमा करने के बाद वट सावित्री व्रत की कथा को कहना या फिर श्रद्धापूर्वक उसको सुनना चाहिए. 
 

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