Sawan Somwar 2021 : भोलेनाथ, महादेव, शिव, भोले शंकर या फिर नीलकंठ. शिव भगवान को ना जाने कितने नामों से जाना जाता है. शिव भगवान के स्वभाव के बारे में कहा जाता है कि वो भोले होने के साथ-साथ क्रोधित होने वाले देव भी हैं. सावन का महीना समझिये बस आ ही चुका है, वो महीना जो भोले बाबा का प्रिय है और जिसका भक्तों को भी बेसब्री से इंतजार होता है.
अब जगह-जगह मंदिरों में रुद्राभिषेक होते हैं, पूरे विधि विधान के साथ भगवान शिव की आराधना की जाती है और शिवलिंग को दूध से स्नान करवाया जाता है. कहा जाता है कि भोले बाबा को दूध से अभिषेक किया जाना पसंद है. हम हर सावन अलग-अलग मंदिरों में शिवलिंग को दूध से नहलाते हैं लेकिन क्या आप जानते हैं कि शिवलिंग को दूध से स्नान क्यों करवाया जाता है. दरअसल इसके पीछे एक कहानी है जो समुद्र मंथन की पूरी कथा भागवत पुराण और शिव पुराण में वर्णित है.
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समुद्र मंथन से निकले विष को किया ग्रहण
इस कथा के अनुसार समुद्र मंथन के दौरान विष की उत्पत्ति हुई थी और उस वक्त पूरा संसार विष के प्रभाव में आ गया था. इस विपत्ति के बाद सभी लोग भोले बाबा की शरण में पहुंचे क्योंकि केवल भगवान शिव के पास ही इस विष की तीव्रता को सहने की ताकत थी. महादेव ने संसार के कल्याण के लिए बिना किसी देर किए विष का पान कर लिया. विष का तीखापन इतना ज्यादा था कि भोले बाबा का कंठ नीला हो गया.
दूध से कम हुई विष की तीव्रता
जब विष का घातक प्रभाव शिव और शिव की जटा में विराजमान देवी गंगा पर पड़ने लगा तो उन्हें शांत करने के लिए जल की शीतलता कम पड़ रही थी. उस वक्त सभी देवताओं ने महादेव से दूध ग्रहण करने का आग्रह किया ताकि विष का प्रभाव कम हो सके. उसके बाद प्रत्येक जीव की चिंता करने वाले भगवान शिव ने दूध से उनके द्वारा ग्रहण करने की अनुमति मांगी. निर्मल और शीतल दूध ने शिव के इस विनम्र निवेदन को तत्काल ही स्वीकार कर लिया, जिसके बाद भोले शंकर ने दूध ग्रहण किया जिससे विष की तीव्रता काफी कम हो गई लेकिन उनका गला यानि कि कंठ हमेशा के लिए नीला हो गया और उन्हें नीलकंठ के नाम से जाना जाने लगा. तब से ही शिवलिंग पर दूध चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है. कहते हैं कि दूध भोले बाबा का प्रिय है और उन्हें सावन के महीने में दूध से स्नान कराने पर सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं.
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