- सुप्रीम कोर्ट ने कोमा में पड़े हरीश राणा को इच्छामृत्यु की अनुमति दी, जिससे परिवार को राहत मिली
- हरीश के परिवार का ब्रह्माकुमारी संस्था से लंबा संबंध है, जिसने उनकी आध्यात्मिक देखभाल की जिम्मेदारी ली
- मां निर्मला देवी ने 13 साल तक सेवा के बाद बेटे की पीड़ा खत्म करने के लिए इच्छामृत्यु का फैसला किया
13 साल का लंबा इंतजार, एक मां की अटूट तपस्या और आखिरकार सुप्रीम कोर्ट से मिली इच्छा मृत्यु की अनुमति. कोमा में पड़े हरीश राणा की अंतिम विदाई का एक वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल है, जिसने हर किसी की आंखों को नम कर दिया. वीडियो में ब्रह्माकुमारी संस्था की सिस्टर लवली, हरीश के माथे पर तिलक लगाकर उनसे कह रही हैं- “हरीश अब जाओ… सबको माफ करते हुए और सबसे माफी मांगते हुए.” आखिर इन शब्दों के पीछे का आध्यात्मिक रहस्य क्या है? ब्रह्माकुमारी सिस्टर लवली दीदी वायरल वीडियो में नजर आ रही है. हर कोई ये जनाने के लिए इच्छुक है कि वीडियो में दिखने वाली दोनों महिलाएं कौन हैं और वो उसमें क्या कहती दिख रही हैं. एनडीटीवी से खास बातचीत में सिस्टर लवली ने इस मर्मस्पर्शी क्षण की पूरी कहानी साझा की है.
हरीश राणा को अंतिम विदाई देने वाली सिस्टर लवली ने बताया वायरल वीडियो की पूरी कहानी...@ravishranjanshu | #HarishRana pic.twitter.com/SxW3NeBHtC
— NDTV India (@ndtvindia) March 17, 2026
आध्यात्मिक विदाई: क्यों कहा 'सबको माफ कर दो'?
सिस्टर लवली ने बताया कि हरीश का परिवार पिछले 18 वर्षों से ब्रह्माकुमारी संस्था से जुड़ा हुआ है. जब सुप्रीम कोर्ट ने हरीश को इच्छामृत्यु की इजाजत दी, तो परिवार ने उन्हें आध्यात्मिक साधना के लिए बुलाया. सिस्टर लवली के अनुसार, "मन और मस्तिष्क का संपर्क भले ही टूट गया हो, लेकिन आत्मा शरीर में कैद होकर भी सब कुछ महसूस करती है. हम चाहते थे कि हरीश जब इस दुनिया से जाएं, तो उनके मन में कोई दुख, बोझ या अपराधबोध न रहे. इसीलिए उन्हें माफी और शांति का संदेश दिया गया, ताकि उनकी आगे की यात्रा आसान हो सके." उन्होंने तिलक के महत्व को समझाते हुए कहा कि यह विजय, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है, जो आत्मा को शक्ति देता है.
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एक मां का कठिन फैसला
हरीश 13 साल से कोमा में थे. इस दौरान उनकी मां निर्मला देवी ने दिन-रात उनकी सेवा की. पिता अशोक राणा एक समय पर टूट गए थे, लेकिन मां की ममता और साहस ही था, जिसने 11 साल तक इलाज की उम्मीद को जिंदा रखा. हालांकि, बेटे की असहनीय पीड़ा को देखते हुए आखिरकार मां ने ही अपनी ममता पर पत्थर रखकर इच्छा मृत्यु के दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए. सिस्टर लवली ने बताया कि यह फैसला लेना आसान नहीं था, लेकिन बेटे को कष्ट से मुक्ति दिलाने के लिए परिवार ने इस कड़वी हकीकत को स्वीकार किया.
इलाज के लिए बेच दिया तीन मंजिला मकान
हरीश एक बेहद महत्वाकांक्षी और सक्रिय युवक थे, लेकिन एक हादसे ने सब कुछ बदल दिया. उनके इलाज के लिए परिवार ने अपनी पूरी जमा-पूंजी लगा दी. दिल्ली का अपना तीन मंजिला मकान तक बेच दिया ताकि बेहतर इलाज मिल सके. इलाज की सहूलियत के लिए 5 साल पहले परिवार दिल्ली से गाजियाबाद के राजनगर एक्सटेंशन शिफ्ट हो गया. सालों तक हरीश फीडिंग ट्यूब और मशीनों के सहारे रहे. लाखों रुपये खर्च करने और हर डॉक्टर का दरवाजा खटखटाने के बाद भी जब सुधार नहीं हुआ, तब परिवार ने 'मुक्ति' का रास्ता चुना.
प्रार्थना की अपील
सिस्टर लवली ने अंत में लोगों से अपील की है कि वे हरीश की आत्मा की शांति के लिए सकारात्मक ऊर्जा भेजें. यदि आत्मा खुद को शरीर के पिंजरे में कैद या बोझ महसूस कर रही है, तो हमारी सामूहिक प्रार्थनाएं उसकी नई यात्रा को सरल बनाएंगी.
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