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Magh Mela 2026: हिंदुओं के लिए आखिर क्यों खास माना जाता है माघ मेला? जानें धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व

Prayagraj Magh Mela 2026 significance:  तीर्थों का राजा कहे जाने वाले जिस प्रयागराज को कुंभ नगरी के नाम से जाना जाता है, वहां आखिर हर साल माघ महीने में आस्था का महाजुटान क्यों होता है? आखिर क्यों इस पावन नगरी में अलग-अलग भाषाओं, परंपराओं और देवी-देवताओं को मानने वाले लोग यहां खिंचे चले आते हैं? माघ मेले में पवित्र संगम तट पर पुण्य की डुबकी लगाने से लेकर पर्व के दान का महत्व जानने के लिए जरूर पढ़ें ये लेख.

Magh Mela 2026: हिंदुओं के लिए आखिर क्यों खास माना जाता है माघ मेला? जानें धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व
Prayagraj Magh Mela 2026: माघ मेला का धार्मिक और आध्यात्मिक महत्व 
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Prayagraj Me Magh Mela Kyu Lagta Hai: पौराणिक ग्रंथों में प्रयागराज की बड़ी महत्ता बताई गई है. तीर्थों के राजा कहलाने वाले प्रयागराज में वैसे तो साल भर श्रद्धालु मकरवाहिनी मां गंगा और कूर्मवाहिनी मां यमुना और हंसवाहिनी मां सरस्वती की पवित्र त्रिवेणी संगम पर डुबकी लगाने के लिए पहुंचते हैं, लेकिन इसका महत्व माघ के महीने में और भी ज्यादा बढ़ जाता है. हिंदू मान्यता के अनुसार जिस प्रयागराज में मां गंगा और मां यमुना की लहरें तीर्थराज की चंवर की तरह प्रतीत होती हैं, उसके दर्शन मात्र से ही व्यक्ति के दुख दूर हो जाते हैं. माघ मास और तीर्थों के राजा प्रयागराज की महत्ता को बताते हुए गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं कि - 

माघ मकरगत रवि जब होई, तीरथ पतिहिं आव स​ब कोई. 
देवदनुज किन्नर नर श्रेनी, सादर मज्जहिं सकल त्रिवेनी.

अर्थात् माघ मास के दौरान यज्ञों की इस पावन भूमि पर सिर्फ मनुष्य ही नहीं बल्कि देवतागण स्नान कर मोक्ष को प्राप्त होते हैं. 

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Photo Credit: PTI

प्रयागराज का पावन संगम 

हिंदू मान्यता के अनुसार जिस स्थान पर मकरवाहिनी मां गंगा और कूर्मवाहिनी मां यमुना और हंसवाहिनी मां सरस्वती का पवित्र त्रिवेणी संगम है, वहां पर श्रद्धा और विश्वास के साथ तीन डुबकी लगाने मात्र से व्यक्ति के सारे पाप और दोष दूर हो जाते हैं और वह सभी सुखों को भोगते हुए अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है. माघ मेले के दौरान पड़ने वाले मकर संक्रांति पर्व के दौरान संगम पर नहाने वाले व्यक्ति को दिव्य लोक की प्राप्ति होती है और वह पुनर्जन्म के चक्र से मुक्त हो जाता है. 

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तब प्रयाग में आते हैं 3 करोड़ 10 हजार तीर्थ 

महाभारत में प्रयागराज में माघ मास के दौरान किए जाने वाले स्नान-दान आदि को लेकर विस्तार से बताया गया है. महाभारत के अनुशासन पर्व में माघ मास की महिमा को बताते हुए कहा गया है कि प्रयागराज में माघ मास के दौरान 3 करोड़ 10 हजार तीर्थों का समागम होता है. यानि यज्ञों की इस पावन भूमि पर महान तपस्वी साधु संतों के साथ देवताओं का भी समागम होता है. 

संगम में माघ स्नान का फल

हिंदू मान्यता के अनुसार जिस प्रयागराज को यज्ञों की भूमि के नाम से जाना जाता है, वहां पर माघ मास के दौरान संगम में स्नान करने पर व्यक्ति को 100 अश्वमेध यज्ञ और 1000 राजसूय यज्ञ के बराबर पुण्यफल प्राप्त होता है. पर्व एवं तिथियों पर स्नान करने पर व्यक्ति के कष्ट दूर और कामनाएं पूरी होती हैं. 

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कहां से आता है मां सरस्वती का जल?

प्रयागराज में अमृतवाहिनी मां गंगा और पुण्यवाहिनी मां यमुना के दर्शन आपको प्रत्यक्ष रूप से होते हैं. यहां पर आने वाला हर तीर्थ यात्री मां गंगा की श्वेत जलधारा और मां यमुना की श्याम जलधारा से स्वत: दोनों ही नदियों के अंतर को जान जाता है, लेकिन यदि बात करें मां सरस्वती की तो यहां गुप्त रूप से बहती हैं. अदृश्य मां सरस्वती के बारे में लोगों का मानना है कि उसका जल सरस्वती कूप से जुड़ा हुआ है तो वहीं कुछ इसे यहां पर संतों के जरिए की जाने वाली ज्ञान चर्चा और उनकी पावन वाणी से जोड़कर देखते हैं. 

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माघ मास में किए जाते हैं ये 10 दान

हिंदू मान्यता के अनुसार प्रयागराज में माघ मास के दौरान न सिर्फ स्नान बल्कि दान का भी बहुत ज्यादा महत्व माना गया है. धर्म शास्त्र में प्रयागराज में माघ मास के दौरान जिन 10 चीजों का दान अत्यंत ही पुण्यदायी माना गया है, उसमें गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण, घृत, वस्त्र, अन्न, गुड़ , चांदी और नमक शामिल है. 

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कल्पवास से होता है कायाकल्प 

हिंदू मान्यता के अनुसार प्रयागराज में जो व्यक्ति पूरे माघ के दौरान नियम-संयम का पालन करते हुए कल्पवास करता है उसका कायाकल्प हो जाता है. साधना और तप से न सिर्फ पुण्य की प्राप्ति होता है, बल्कि उसके भीतर तेज उत्पन्न होता है. माघ स्नान के पुण्य प्रभाव से नकारात्मक शक्तियां दूर होती हैं और उसका जुड़ाव सकारात्मक ऊर्जा से होता है. मान्यता है कि माघ मास की साधना के पुण्यफल से वह सभी सुखों को भोगता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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