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महाभारत में सबसे पहले किसे मिला इच्छामृत्यु का वरदान, जानिए भीष्म पितामह की अनोखी कहानी

महाभारत में भीष्म पितामह को इच्छामृत्यु का वरदान मिला था. उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए राजगद्दी छोड़ दी और आजीवन ब्रह्मचर्य की प्रतिज्ञा ली, जिसके बाद उन्हें ये विशेष वरदान मिला.

महाभारत में सबसे पहले किसे मिला इच्छामृत्यु का वरदान, जानिए भीष्म पितामह की अनोखी कहानी
भीष्म पितामह की ये कहानी हमें त्याग, कर्तव्य और मजबूत संकल्प का महत्व समझाती है.

Bhishma Pitamah ichha mrityu : भारतीय धर्मग्रंथों में कई ऐसी कहानियां मिलती हैं जो सिर्फ धर्म या आस्था से जुड़ी नहीं होतीं, बल्कि जीवन के बड़े सबक भी सिखाती हैं. महाभारत की भीष्म पितामह की कहानी भी ऐसी ही है. कहा जाता है कि इच्छामृत्यु का वरदान सबसे पहले भीष्म पितामह को मिला था. यानी उन्हें ये शक्ति थी कि वे जब चाहें तभी अपने प्राण त्याग सकते थे. लेकिन ये वरदान उन्हें यूं ही नहीं मिला था. इसके पीछे उनका बहुत बड़ा त्याग छिपा था. भीष्म का असली नाम देवव्रत था. वे हस्तिनापुर के राजा शांतनु और देवी गंगा के पुत्र थे. अपने पिता की खुशी के लिए उन्होंने ऐसा फैसला लिया, जिसकी वजह से उनका नाम हमेशा के लिए इतिहास में अमर हो गया.

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पिता की खुशी के लिए लिया बड़ा फैसला

कहानी उस समय की है जब राजा शांतनु को मत्स्यगंधा नाम की एक युवती से प्रेम हो गया था. आगे चलकर यही मत्स्यगंधा सत्यवती के नाम से जानी गईं. जब राजा शांतनु ने सत्यवती से विवाह की इच्छा जताई, तो उनके पिता ने एक शर्त रख दी. उन्होंने कहा कि सत्यवती से जन्म लेने वाला पुत्र ही हस्तिनापुर का राजा बनेगा. लेकिन उस समय शांतनु के बड़े पुत्र देवव्रत पहले से ही राजगद्दी के उत्तराधिकारी थे. इस वजह से राजा शांतनु परेशान रहने लगे और मन ही मन दुखी रहने लगे.

देवव्रत की कठिन प्रतिज्ञा

जब देवव्रत को अपने पिता की परेशानी का कारण पता चला, तो उन्होंने एक बड़ा फैसला लिया. उन्होंने खुद ही राजगद्दी का अधिकार छोड़ दिया. इसके साथ ही उन्होंने आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत भी ले लिया, ताकि उनकी कोई संतान भविष्य में राजगद्दी पर दावा न कर सके. देवव्रत की ये प्रतिज्ञा इतनी कठिन थी कि देवताओं और ऋषियों ने इसे भीषण प्रतिज्ञा कहा. तभी से देवव्रत को भीष्म के नाम से जाना जाने लगा.

ऐसे मिला इच्छामृत्यु का वरदान

देवव्रत के इस बड़े त्याग से राजा शांतनु बहुत खुश हुए. उन्होंने अपने पुत्र को एक खास वरदान दिया. ये वरदान था इच्छामृत्यु का. यानी भीष्म पितामह जब चाहें तभी अपने प्राण त्याग सकते थे. महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की सेना के सेनापति बने. युद्ध के दसवें दिन अर्जुन के बाणों से वे घायल होकर बाणों की शय्या पर गिर पड़े. लेकिन उन्होंने तुरंत प्राण नहीं छोड़े. उन्होंने सूर्य के उत्तरायण होने तक इंतजार किया और फिर उसी समय देह त्यागी.

त्याग और कर्तव्य की प्रेरक कहानी

भीष्म पितामह की ये कहानी हमें त्याग, कर्तव्य और मजबूत संकल्प का महत्व समझाती है. यही वजह है कि महाभारत में उन्हें सबसे महान और सम्मानित योद्धाओं में गिना जाता है. आज भी लोग उन्हें श्रद्धा और सम्मान के साथ याद करते हैं.

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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