हमारे जीवन से जुड़े तीन शब्द हैं - परीक्षा, समीक्षा और प्रतीक्षा. परीक्षा किसकी ली जाती है? यह हमेशा शिष्य की ली जाती है. यह परीक्षा गुरु लेता है और भगवान सबके गुरु हैं. अगर आपको परीक्षा लेनी है तो कभी भगवान की परीक्षा मत लो बल्कि परीक्षा तो आपको दुनिया की लेनी चाहिए, भगवान की तो प्रतीक्षा होनी चाहिए. आपके आस-पास जितने भी लोग रहते हैं, उनकी समय-समय पर परीक्षा लो क्योकि उनका जुड़ाव स्वार्थ पर आधारित है. किसी ने बहुत सही कहा है कि - सैकड़ो दर्द मंद मिलते हैं, काम के लोग चंद मिलते हैं, जब मुसीबत आती है तो सबके दरवाजे बंद मिलते हैं.
क्यों लेनी चाहिए अपनो की परीक्षा?
आप लोगों में बहुत से ऐसे लोग होंगे जिनका बड़ा अनुभव होगा कि जब कभी भी विपत्ति आती है तो सबके मोबाइल आउट ऑफ रीच होते हैं, समय पर शायद ही कोई काम आता है. इसलिए परीक्षा किसकी लेनी है, संसार से जुड़े लोगों की लेनी है न कि परमात्मा की. आपको उनकी परीक्षा लेनी चाहिए कि क्या वाकई विपत्ति के समय में आपके साथ खड़े होते हैं या नहीं. अभी हाल में कोरोना काल आया था, जिसमें पिता बेटे को छूने को तैयार नहीं था तो वहीं बेटा पिता को छूने को तैयार नहीं था. पत्नी अपने पति को छूने को तैयार नहीं थी. कोरोना काल भी सिखा गया है कि यह दुनिया किसी की नहीं. सभी को यह डर सता रहा था कि वो तो चले गये, कहीं हम भी न चले जाएं.
कठिन समय कराता है अपनों की पहचान
हमारे एक पंडित जी है हैं जो अपने गांव में जजमानी करके अपना गुजारा करते हैं. एक बार उन्होंने अपने जजमानों की परीक्षा लेने के लिए एक प्रयोग किया ताकि वह जान सकें कि विपत्ति में वह मदद करने आएंगे या नहीं. पंडित जी ने अपना फोन रिचार्ज नहीं कराया, जिसके कारण वह बंद हो गया. कुछ समय बाद लोगों ने उनके भाई को फोन करके कहा कि आपका फोन बंद हो गया, जिसके कारण आपसे बात नहीं हो पा रही है. तब पंडित जी ने कहा कि वह रिचार्ज नहीं है. इसके बाद पूरा एक महीना बीत गया और लोग उनके भाई के फोन के जरिए उनसे संपर्क करते रहे, लेकिन किसी ने उनका फोन रिचार्ज नहीं कराया. परखो तो कोई अपना नहीं, समझो तो कोई पराया नहीं. भगवद् दृष्टि से सभी अपने हैं, लेकिन काम की दृष्टि से देखो तो कोई अपना नहीं है. कोरोना काल हमें सिखा गया कि वास्तव में कौन अपना है.
स्वयं की समीक्षा कैसे करनी चाहिए?
पहला शब्द परीक्षा जो कि हमेशा दुनिया की करनी चाहिए और दूसरा शब्द है समीक्षा जो हमेशा स्वयं की करनी चाहिए. अमूमन हम सभी दूसरों की समीक्षा करते हैं कि फलां व्यक्ति कैसा है? जबकि हमें हमेशा स्वयं की समीक्षा करना चाहिए.
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय.
जो मन खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय.
जब कभी भी दो व्यक्ति बैठते हैं तो उनकी आपस की चर्चा का विषय हमेशा कोई तीसरा व्यक्ति होता है. ऐसे में सवाल उठता है कि हम अपनी समीक्षा कैसे करें. हमारे संतों ने एक विधि बताई है अपने आप को पवित्र करने की. जब कभी भी आप रात्रि में सोने के लिए जाएं तो सोने से पूर्व 5 मिनट अपने आपको दो और उसमें सुबह जागने से लेकर बिस्तर तक जाने तक आपने क्या-क्या किया इसका निरीक्षण और मूल्यांकन करो कि क्या आपने अच्छा और बुरा किया. यदि आप प्रतिदिन ऐसा करना प्रारंभ कर देते हैं तो निश्चित मानिए एक दिन आपसे भविष्य में कुछ भी बुरा नहीं होगा ओर आपका जीवन परम पवित्र बन जाएगा.
ईश्वर की प्रतीक्षा का महत्व
परीक्षा और समीक्षा के बाद आती है प्रतीक्षा, जिसका संबंध परमपिता परमात्मा से जुड़ा है. आप परमात्मा की जितनी बेसब्री से प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहोगे, उतना वो परमात्मा आपके सम्मुख आने के लिए तैयार रहेगा. एक बार दो संत में से एक केले के झाड़ के नीचे बैठकर तपसया कर रहे थे तो दूसरे पीपल के वृक्ष के नीचे अपना तप कर रहे थे. उनके पास जब नारद जी पहुंचे तो उन्होंने उनसे अपना-अपना संदेश पहुंचाया कि हमें भगवान कब मिलेंगे. इसकेबाद नारद मुनि ब्रह्मलोक को गये और वहां से परमात्मा का संदेश लेकर आए और सबसे पहले केले के झाड़ के नीचे बैठे संत को बताया कि केले के झाड़ में जितने पत्ते हैं, उतने जन्म के बाद तुम्हें ईश्वर के दर्शन होंगे.
उसने सोचा ईश्वर के दर्शन में 5 से 6 जन्म लग जाएंगे तो उसने अपना आसन उठाया और कहा भगवान मिलें चाहे नहीं, मुझे नहीं करनी इतनी बड़ी तपस्या. जब नारद मुनि ने पीपल के पेड़ के नीचे बैठे को यही संदेश सुनाया कि उसे पीपल के जितने पत्ते हैं, उसके बाद ईश्वर के दर्शन होंगे. इतना सुनते ही वह संत यह सोचकर वह आंख बंद करके नाचने लगा कि यह बात तो तय हो कि ईश्वर के दर्शन होंगे. मान्यता है कि जब नाचते-नाचते जब उसने आंखे खोली तो उसके सामने साक्षात ईश्वर खड़े थे. कहने का तात्पर्य यह है कि हम जितनी प्रतीक्षा करने के लिए तैयार रहेंगे उतनी जल्दी भगवान आने के लिए तैयार रहेंगे. शबरी की प्रतीक्षा का ही परिणाम था कि भगवान राम को खुद चल कर अयोध्या से उसके पास जाना पड़ा. इस प्रकार हमें परीक्षा दुनिया की, समीक्षा स्वयं की और प्रतीक्षा परमात्मा की करनी चाहिए.
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