NDTV की खास पेशकश मोहर्रम में करबला के शहीदों की दास्तां में जहां आपने पिछले पार्ट में इमाम हुसैन के बेटे अली अकबर (Hazrat Ali Akbar) के बारे में और कैसे उनकी शहादत हुई थी वो पढ़ा था.. आइये अब आपको लेकर चलते हैं एक और शहीद की दास्तां बताने.. जिनका नाम था हज़रत अब्बास (Hazrat Abbas ibn Ali). जब भी वफ़ादारी, बहादुरी और भाई के लिए जान न्योछावर करने की बात होती है, तो सबसे पहले हज़रत अब्बास अलमदार (अ.स.) का नाम लिया जाता है...कर्बला के मैदान में उन्होंने जो वफ़ा दिखाई, उसकी मिसाल पूरी इंसानियत में नहीं मिलती..आज भी लोग उन्हें "सक़्क़ा-ए-कर्बला", "अलमदार-ए-हुसैन" और "वफ़ा के सरदार" के नाम से याद करते हैं..
हजरत अब्बास की कहानी (Story of Hazrat Abbas)
हज़रत अब्बास (अ.स.) का जन्म 4 शाबान 26 हिजरी में हुआ.. आपके पिता हजरत अली (अ.स.) और वालिदा हज़रत उम्मुल बनीन (स.अ.) थीं..हजरत अली की एक बीवी हजरत फातिमा ज़हरा (स. अ) हैं जिनके दो बेटे इमाम हसन और हुसैन और दो बेटी जनाबे ज़ैनब और जमाने कुलसुम हैं.. हजरत ज़हरा की शहादत के कई साल बाद बच्चों के ख्याल के लिये हजरत अली ने उम्मुल बनींन से शादी की, जिससे उनके बेटे हजरत अब्बास हुए..
हजरत अब्बास के बचपन से ही चेहरे में शान, आंखों में हैबत और दिल में इबादत थी..लोग कहते थे कि अब्बास (अ.स.) अपने पिता अली (अ.स.) की बहादुरी के वारिस हैं. ज़ाकिर कहते हैं कि हजरत अब्बास की लंबाई इतनी थी कि ऊंट पर बैठे इंसान के माथे को चूम सकते थे..उन्होंने अपने पिता हजरत अली के साथ शामिल होकर जंग ए सिफ़्फ़ीन में भी जीत हासिल की थी.. कहा जाता है कि हजरत अली ने खुद परवरदिगार से रात में नमाज ए शब तक में उन्हें मांगा था.. की जैसा मै बहादुर हूं वैसे ही एक मेरे जैसा बहादुर बेटा अता कर.. जिसके बाद हजरत अब्बास का जन्म हुआ..और वो पिता की तरह बहुत बहादुर थे..
लेकिन उनकी सबसे बड़ी पहचान उनकी ताकत नहीं, बल्कि उनकी वफ़ादारी थी..हजरत अली के आखिरी वक्त के दौरान उन्होंने हजरत हुसैन का हाथ हजरत अब्बास के हाथ में दे दिया था.. और कहा था कि अब्बास कभी भी हुसैन को तनहा न छोड़ना.. बस वो दिन था तब से लेकर करबला के मैदान तक में हजरत अब्बास ने हमेशा इमाम हुसैन को आका कहकर पुकारा न कि कभी भाई..
जब भी इमाम हुसैन (अ.स.) सामने आते, हज़रत अब्बास (अ.स.) अदब से सिर झुका लेते वह सिर्फ भाई नहीं मानते थे, बल्कि उन्हें अपना इमाम और अपने दीन का रहबर समझते थे..
भाई से मोहब्बत का अनोखा रिश्ता
हज़रत अब्बास (अ.स.) का दिल अपने भाई इमाम हुसैन (अ.स.) के लिए धड़कता था..उन्होंने कभी अपनी खुशी, अपनी ज़िंदगी या अपनी इच्छा को इमाम हुसैन (अ.स.) से आगे नहीं रखा.. जब कर्बला का सफर शुरू हुआ, तब भी अब्बास (अ.स.) जानते थे कि यह सफर शहादत की ओर जा रहा है लेकिन उन्होंने एक पल के लिए भी अपने भाई का साथ छोड़ने का नहीं सोचा..
उनकी ज़ुबान पर बस एक ही बात थी
"जब तक अब्बास ज़िंदा है, हुसैन अकेले नहीं हैं।"
कर्बला में वफ़ा का सबसे बड़ा इम्तिहान

हजरत अब्बास Story of Hazrat Abbas (a.s.) करबला में इमाम हुसैन के लश्कर के अलमबरदार थे.. जब 2 मोहर्रम को काफिला करबला की जमीन पर पहुंचा था तभी उन्होंने वहां अपने खेमे लगा लिए थे.. लेकिन यजीद की फौज ने दरिया के किनारे से खेमे हटाने को कहा जिस पर हजरत अब्बास को गुस्सा आया लेकिन इमाम हुसैन ने उन्हें रोका और कहा कि हमें कोई जंग शुरू नहीं करनी.. जिसके बाद दूर जाकर खेमे लगाए गए.. और हजरत अब्बास ने सब्र किया.. 7 मोहर्रम से इमाम हुसैन के काफिले का पानी रोक दिया गया लेकिन तब भी हजरत अब्बास ने सब्र किया..इसी तरह 10 मोहर्रम का दिन आ जाता है..फ़ुरात नदी का पानी दुश्मनों ने बंद कर दिया था..कई दिनों से बच्चे प्यासे थे..मासूमों की "अल-अतश, अल-अतश" (हाय प्यास, हाय प्यास) की सदाएं पूरे ख़ेमे में गूंज रही थीं..
हजरत अब्बास अस ने फिर से इजाजत मांगी कि मुझे जंग की इजाजत दे दीजिए लेकिन इमाम हुसैन ने उन्हें इजाजत नहीं दी..
आखिरकार जब कई इमाम हुसैन के साथियों में से उनके साथी शहीद हो गए.. जब छोटे भांजे हजरत औन और मोहम्मद भी शहीद हो गए.. और खेमों में छोटे बच्चे जिनमें इमाम हुसैन की चार साल की बेटी जनाबे सकीना भी थी, और खेमों से प्यास हाय प्यास की सदाएं आने लगी.. तब फिर हजरत अब्बास ने जंग की इजाजत मांगी. जिसके बाद इमाम हुसैन ने कहा कि ऐ मेरे भाई अब्बास, तुम्हे कैसे में जंग की इजाजत दे दूं तुम तो मेरे काफिले के अलमबरदार हो.. फिर हजरत अब्बास ने कहा कि अब वो काफिला ही कहां बचा जिसका मैं अलमदार था.. अब मुझसे कम उम्र के भी शहीद हो गए.. बच्चे भी खेमों में प्यास से तड़प रहे हैं.. मुझे जाने दीजिए आक़ा..जिसके बाद
इमाम हुसैन (अ.स.) ने अपने भाई अब्बास (अ.स.) को पानी लाने की इजाज़त दी..
हजरत अब्बास (अ.स.) मश्क लेकर फ़ुरात नहर की तरफ बढ़े.. दुश्मनों की फौज उनके सामने टिक नहीं सकी.. और उन्हें देखकर कि भागने लगी..आखिरकार वह नहर तक पहुंच गए...और किसी की हिम्मत न हुई कि उन्हें रोक पाते..
जब पानी हाथ में था, लेकिन पिया नहीं
हज़रत अब्बास (अ.स.) कई दिनों की प्यास के बाद फ़ुरात के किनारे पहुंचे...उन्होंने अपने हाथों में पानी लिया.. लेकिन तभी उन्हें अपने भाई हुसैन (अ.स.), सकीना (स.अ.) और प्यासे बच्चों की याद आ गई..
उन्होंने पानी को वापस नदी में गिरा दिया और कहा:
"अब्बास! क्या तू पानी पी ले और हुसैन प्यासे रह जाएं? यह हरगिज़ नहीं हो सकता..
यह वह लम्हा था जिसने उन्हें वफ़ा का सरदार बना दिया...
चाहते तो हजरत अब्बास पानी पी सकते थे लेकिन दरिया तक पहुंचने के बाद ,हाथ के चुल्लू में पानी लेने के बाद तक 3 दिन के प्यासे हजरत अब्बास ने पानी नहीं पिया..इसी से दिखता है कि कितने वफादार थे वो..
बस फिर हजरत अब्बास ने खुद न पानी पिया.. और मशक निकाली जिसमें पानी भर लिया..
शहादत का दर्दनाक मंज़र
हज़रत अब्बास (अ.स.) मश्क में पानी भरकर ख़ेमों की तरफ लौट रहे थे..जिसके बाद से यजीद की फौज ने हुकुम दिया कि अब्बास पानी खेमों में न ले जाये, सब हमला करो.. लेकिन अब्बास की हैबत की वजह से कोई सामने नहीं आ पा रहा था, तभी उन यजीद की फौज ने पेड़ों के पीछे छिपकर हमला करना शुरू किया.. और चारों तरफ से हमला कर दिया..
सबसे पहले हजरत अब्बास का दायां हाथ काट दिया गया.. लेकिन हाथ कटने के बाद भी हजरत अब्बास नहीं रुकें उन्होंने मशक को गले में रखा.. और काफिले की तरफ बढ़ते रहे.. लेकिन तभी एक ज़ालिम ने फिर से हमला किया और हजरत अब्बास का दूसरा हाथ भी कांट दिया.. अब हजरत अब्बास के दोनों हाथ नहीं बचे थे.. लेकिन उनकी सारी ताकत उस पानी में थी जो उनके मशकिजे में थी.. हजरत अब्बास चलते रहे और जालिमों ने तीरों, तलवार की बारिश भी कर दी.. फिर बस वो हुआ जिसे हजरत अब्बास कभी नहीं चाहते थे.. दोनों हाथ कंटने के बाद से यजीद की फौज में हिम्मत आई.. और उन्होंने सामने से तीर बरसाना शुरू कर दिया.. जिसमें एक तीर आकर उस मशक पर लगा और मशक को चीरता हुआ हजरत अब्बास के सीने में जा लगा.. बस मशक से जैसे ही पानी बहने लगा तभी हजरत अब्बास की सारी उम्मीद ही जैसे पानी के साथ बहने लगी.. उन्हें खेमों में प्यासे बच्चे नजर आ रहे थे.. हाय प्यास की सदाएं की आवाज आ रही थी..

बस फिर जालिमों ने एक तीर हजरत अब्बास की आँख पर मारा जिससे उन्हें दिखना बंद हो जाए, और जब आंख पर तीर मारा तो हजरत अब्बास निकाल भी नहीं सकते थे क्योंकि उनके हाथ ही नहीं थे.. तभी एक ज़ालिम ने उनके सर पर वार किया जिससे वो सीधे घोड़े से जमीन पर आ गए.. मौलाना कल्बे रुशेद रिजवी कहते हैं कि जब भी कोई घोड़े से जमीन पर गिरता है तो वो अपने हाथों का सहारा लेता है.. लेकिन हाय रे ज़ुल्म.. किस तरह से हजरत अब्बास जमीन पर आए होंगे जब उन्हें हाथ ही नहीं थे.. बस जैसे ही हजरत अब्बास जमीन पर गिरे तो जालिमों ने उनपर हमला शुरू कर दिया.. किसी ने तलवार मारी, तो किसी ने नैज़ा.. जिसपर कुछ न था उसने पत्थर मारे.. बस ये देखकर इमाम हुसैन मैदान में पहुंचे.. और हजरत अब्बास के सर को अपनी गोद में रखा..
हजरत अब्बास की साँस चल रही थी तभी हजरत अब्बास ने इमाम हुसैन से कहा कि आक़ा जब मैं पैदा हुआ था तब आपका चेहरा देखा था अब मैं जा रहा हूं तो आपका चेहरा देखना चाहता हूं, बस एक बार अपना चेहरा मुझे दिखा दीजिए, मेरी एक आंख में तीर है और दूसरी में खून जमा हुआ है.. इमाम हुसैन ने कहा कि अब्बास तुम्हारे बाद मेरी कमर टूट गई.. हजरत अब्बास की आँख से तीर निकाला गया.. इमाम हुसैन ने भी हजरत अब्बास से कहा कि मेरी भी एक ख्वाहिश अब्बास पूरी कर दो, हजरत अब्बास ने कहा कि आक़ा में इस वक्त क्या ख्वाहिश पूरी कर सकता हूं, बस आप मेरे लाशे को खेमों में न ले जाएगा, मैं शर्मिंदा हूं कि मैं पानी खेमों तक न पहुँचा सका.. बस हजरत हुसैन ने कहा कि भाई तुमने मुझे जिंदगी भर आका कहा है.. बस एक बार मुझे भाई कह दो.. हज़रत अब्बास ने अपने आका की बात मानी और कहा ऐ मेरे भाई... खुदा हाफिज.. मेरे लाशे को खेमों में न ले जाएगा..
वफ़ा के सरदार क्यों कहलाते हैं हज़रत अब्बास (अ.स.) ?

हज़रत अब्बास (अ.स.) को "वफ़ा का सरदार" इसलिए कहा जाता है क्योंकि उन्होंने:
- हर हाल में इमाम हुसैन (अ.स.) का साथ दिया।
- अपनी जान से ज्यादा इमाम की हिफाज़त को अहमियत दी।
- फ़ुरात पर पहुंचकर भी पानी नहीं पिया।
- आख़िरी सांस तक बच्चों के लिए पानी पहुंचाने की कोशिश की।
- अपने इमाम से की हुई बैअत और वादा निभाया..
उनकी पूरी ज़िंदगी वफ़ादारी, इख़लास और कुर्बानी का नाम है।
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कर्बला में बहुत से बहादुर शहीद हुए, लेकिन हज़रत अब्बास (अ.स.) की वफ़ा का मुकाम सबसे अलग है..
उन्होंने दुनिया को सिखाया कि सच्ची मोहब्बत सिर्फ शब्दों से नहीं, बल्कि कुर्बानी से साबित होती है..
आज भी जब उनका नाम लिया जाता है, आंखें नम हो जाती हैं और दिल से यही आवाज़ निकलती है—
"सलाम हो अब्बास पर, जो वफ़ा के सरदार बने और अपने भाई हुसैन (अ.स.) के लिए सब कुछ कुर्बान कर गए।"
हजरत अब्बास को इतना बड़ा वफ़ा का तोहफा मिला कि इराक में करबला में जहां इमाम हुसैन का श्राईन बना है तो उसी के सामने हजरत अब्बास का भी रोज़ा(श्राईन) है.. कहते हैं कि जब भी कोई ज़ियारत करने जाता है तो पहले हजरत अब्बास के श्राइन पर जाता है फिर हजरत हुसैन के श्राइन पर जाता है..
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