Best Tips for Staying Positive During Difficult Times: जीवन लगातार बदलाव और उतार-चढ़ाव की प्रक्रिया है. सुख-दुःख, लाभ-हानि, सफलता-असफलता-ये सभी जीवन यात्रा के स्वाभाविक पड़ाव हैं, लेकिन इन परिस्थितियों को हम किस दृष्टि से देखते हैं, वही हमारे जीवन की सरलता, सहजता और मानसिक संतुलन को तय करता है. जब मनुष्य संघर्ष को बोझ या दंड न मानकर आत्मविकास का अवसर मानता है, तब जीवन अपने आप अधिक सामान्य, संतुलित और सार्थक हो जाता है. उपनिषदों की शिक्षा हमें इसी सकारात्मक दृष्टिकोण की गहन प्रेरणा देती है. जीवन से जुड़ा कठिन समय आपका शत्रु नहीं, बल्कि गुरु कैसे है, इसे विस्तार से बता रहे हैं स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज.
आत्मशक्ति जाग्रति का साधन
उपनिषद कहते हैं- 'नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः' (मुण्डकोपनिषद). अर्थात् निर्बल मन से आत्मबोध संभव नहीं. यहां बल का अर्थ शारीरिक शक्ति नहीं, बल्कि मानसिक दृढ़ता और सकारात्मक दृष्टि है. संघर्ष के क्षणों में यदि मनुष्य स्वयं को असहाय मान ले, तो वह टूट जाता है; परंतु यदि वही व्यक्ति चुनौतियों को आत्मशक्ति जाग्रत करने का साधन माने, तो संघर्ष उसे भीतर से मजबूत बनाता है. इस दृष्टि से देखा जाए तो कठिन परिस्थितियां जीवन की शत्रु नहीं, बल्कि गुरु बन जाती हैं.
शांत चित्त से समाधान
उपनिषदों की एक मूल शिक्षा है-आत्मा अजर, अमर और अविनाशी है. कठोपनिषद में कहा गया है- 'न जायते म्रियते वा कदाचित्.' जब व्यक्ति यह समझ लेता है कि उसका वास्तविक स्वरूप परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता, तब बाहरी संघर्ष उसे विचलित नहीं कर पाते. यह ज्ञान मन को स्थिरता देता है और जीवन की जटिलताओं को सरल बना देता है. ऐसी स्थिति में व्यक्ति समस्याओं से भागता नहीं, बल्कि शांत चित्त से समाधान खोजता है.
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यही अंतिम सत्य नहीं
संघर्ष को सकारात्मक रूप में देखने से जीवन में सहजता आती है, क्योंकि तब अपेक्षाओं का बोझ कम हो जाता है. बृहदारण्यक उपनिषद का संदेश - 'नेति नेति' - यह हमें सिखाता है कि जो क्षणिक है, वही अंतिम सत्य नहीं. जब असफलता या संकट आता है, तब यह भाव कि 'यह भी स्थायी नहीं है' मन को हल्का करता है. परिणामस्वरूप जीवन अधिक सामान्य और संतुलित प्रतीत होने लगता है.
अंतर्निहित दिव्यता का बोध
सकारात्मक दृष्टि से संघर्ष को स्वीकार करने का सबसे बड़ा लाभ आत्मविश्वास के रूप में प्रकट होता है. हर बार जब मनुष्य कठिनाई से जूझकर आगे बढ़ता है, तो उसके भीतर यह विश्वास दृढ़ होता है कि वह भविष्य की चुनौतियों का भी सामना कर सकता है. छांदोग्य उपनिषद का महावाक्य- 'तत्त्वमसि' - मनुष्य को उसकी अंतर्निहित दिव्यता का बोध कराता है. जब व्यक्ति स्वयं को शक्तिहीन नहीं, बल्कि चेतन आत्मा के रूप में देखता है, तब आत्मविश्वास स्वतः जाग्रत होता है.
नया आत्मविश्वास अनुभव
अंततः उपनिषदों की शिक्षा हमें सिखाती है कि जीवन की सरलता परिस्थितियों के अभाव से नहीं, बल्कि दृष्टिकोण की शुद्धता से आती है. संघर्ष यदि सकारात्मक भाव से स्वीकार किया जाए, तो वह जीवन को बोझिल नहीं, बल्कि अर्थपूर्ण बनाता है. ऐसे में जीवन सहज, सामान्य और संतुलित होता है, और मनुष्य हर परिस्थिति में अपने भीतर एक नया आत्मविश्वास अनुभव करता है - जो उसे निरंतर आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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