Samasya Ka Samadhan Kaise Nikale : आज का युग आपाधापी, तमाम तरह की चुनौतियां, एक दूसरे से आगे निकलने की होडत्र और अनिश्चितताओं से भरा हुआ है. लगभग हर आदमी अपने लक्ष्य की प्राप्ति, भौतिक सुखों और सामाजिक दबावों के बीच उलझा नजर आता है. इस दौड़ में अक्सर व्यक्ति के मन की शांति, संतुलन और विवेक अक्सर खो जाता है. ऐसे समय में भगवान के नाम का आश्रय केवल एक धार्मिक कर्म नहीं, बल्कि एक गहन मानसिक, आत्मिक और व्यवहारिक समाधान बनकर सामने आता है. भगवद् गीता और रामायण-दोनों ग्रंथ इस सत्य को जीवन के व्यवहारिक स्तर पर स्पष्ट करते हैं. इन्हीं पावन ग्रंथों के जरिए जीवन में आने वाले संकटों का समाधान बता रहे हैं स्वामी श्री चिदम्बरानन्द सरस्वती जी महाराज.
भगवद् गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को उपदेश देते हुए कहते हैं-
'अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते.
तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥' (गीता 9.22)
अर्थात जो भक्त अनन्य भाव से मेरा स्मरण करते हैं, उनके योग (आवश्यकताओं) और क्षेम (रक्षा) का दायित्व मैं स्वयं वहन करता हूँ. यह श्लोक आज के युग के लिए अत्यंत प्रासंगिक है. जब मनुष्य ईश्वर के नाम का स्मरण करता है, तो उसकी चिंता “मैं कैसे करूं?” से हटकर “वह संभालेगा” की अवस्था में पहुँच जाती है. यही भाव मन को शांति देता है और तनाव को जड़ से कम करता है.
भगवान का नाम एक मानसिक स्थिरता का आधार बनता है. गीता कहती है-
'युक्ताहारविहारस्य युक्तचेष्टस्य कर्मसु.
युक्तस्वप्नावबोधस्य योगो भवति दुःखहा॥' (गीता 6.17)
जब मन नाम-स्मरण में टिकता है, तब विचार, आहार-विहार और कर्म संतुलित होते हैं. परिणामस्वरूप दुःखों का क्षय होता है. नाम-स्मरण मन की चंचलता को रोककर उसे वर्तमान में टिकाता है, जिससे भय और भविष्य की आशंकाएँ कमजोर पड़ जाती हैं.
रामायण में तुलसीदास जी भी नाम-महिमा को अत्यंत सरल और प्रभावी शब्दों में बताते हैं-
'कलियुग केवल नाम अधारा.
सुमिर-सुमिर नर उतरहिं पारा॥'
कलियुग में केवल भगवान का नाम ही आधार है. निरंतर स्मरण से मनुष्य संसार-सागर को पार कर सकता है. यह चौपाई स्पष्ट करती है कि नाम कोई जटिल साधना नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में सुलभ संबल है-चाहे व्यक्ति संकट में हो, निर्णय-दुविधा में हो या मानसिक अशांति से घिरा हो.
एक अन्य चौपाई में तुलसीदास जी कहते हैं-
'राम नाम मनि दीप धरु जीह देहरी द्वार.
तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजियार॥'
अर्थात यदि भीतर-बाहर प्रकाश चाहिए, तो जिह्वा के द्वार पर राम-नाम का दीपक जला दो. आज के तनावग्रस्त जीवन में यह “प्रकाश” आत्मविश्वास, धैर्य और सकारात्मक दृष्टि के रूप में प्रकट होता है.
भगवान के नाम का आश्रय लेने से मनुष्य का दृष्टिकोण बदलता है. गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं-
' मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा.' (गीता 3.30)
जब हम अपने कर्म ईश्वर को समर्पित कर देते हैं, तब असफलता का भय कम हो जाता है और संकट भी साधना का माध्यम बन जाते हैं.
निष्कर्ष: आज के आपाधापी भरे युग में भगवान का नाम मानसिक शांति, आत्मबल और संकट-समाधान का सबसे सरल और प्रभावी उपाय है. गीता का दर्शन और रामायण की चौपाइयां यह सिखाती हैं कि जब मन नाम में टिक जाता है, तब परिस्थितियां नहीं बदलतीं, पर हम बदल जाते हैं-और यही परिवर्तन संकटों का सबसे बड़ा समाधान बन जाता है.भगवान का नाम जपने से मन की चंचलता कम होती है. चिंता, भय और अशांति धीरे-धीरे शांत होने लगती है. नाम स्मरण मन को वर्तमान में टिकाता है, जिससे तनाव कम होता है.ईश्वर पर विश्वास होने से डर कम होता है. व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में भी आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ता है.
भगवान का नाम वह दीपक है जो अंधेरे मन को प्रकाश देता है, वह सहारा है जो जीवन की आपाधापी में भी हमें टूटने नहीं देता. इसलिए ईश्वर या फिर कहें अपने आराध्य का जितना अधिक नाम-स्मरण, उतनी अधिक शांति, शक्ति और संतुलन.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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