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Guru Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा आज, जरूर पढ़ें गुरू-शिष्य की ये 3 रोचक पौराणिक कथाएं

आज गुरु पूर्णिमा का पर्व मनाया जा रहा है. इस दिन शिष्य अपने गुरु और मार्गदर्शक की पूजा करते हैं, जिनसे उन्हें शैक्षिक और आध्यात्मिक ज्ञान मिला है. शास्त्रों में गुरु का स्थान देवताओं से भी ऊपर बताया गया है, क्योंकि गुरु जीवन में सफलता पाने का और परमात्मा की प्राप्ति का मार्ग बताते हैं.

Guru Purnima 2026: गुरु पूर्णिमा आज, जरूर पढ़ें गुरू-शिष्य की ये 3 रोचक पौराणिक कथाएं
गुरु पूर्णिमा 2026
Photo Credit: NDTV

आज 29 जुलाई को गुरु पूर्णिमा मनाई जा रही है. हिन्दू पंचांग के अनुसार हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है. महाभारत के रचयिता महान ऋषि वेद व्यास का जन्म भी आषाढ़ पूर्णिमा पर ही हुआ था, यही कारण है कि गुरु पूर्णिमा को व्यास पूर्णिमा भी कहा जाता है. इस खास अवसर पर अपने गुरु, इष्ट और आराध्य की पूजा कर आशीर्वाद जरूर लेना चाहिए. आज हम आपको 3 कथाओं के बारे में बताने जा रहे हैं जिन्हें गुरु पूर्णिमा पर जरूर पढ़ना चाहिए.

द्रोणाचार्य और अर्जुन की कथा

द्रोणाचार्य कौरव व पांडव राजकुमारों के गुरू थे. एक बार उन्होंने अपने गुरुकुल में एक ऊंचे वृक्ष पर नकली पक्षी बांधकर अपने शिष्यों से पक्षी की आंख पर निशाना साधने को कहा. सभी राजकुमारों से पूछा गया कि उन्हें क्या दिखाई दे रहा है. सभी ने वृक्ष, पक्षी, आकाश, पत्ते, शाखें दिखाई देने की बात कहीं, लेकिन उनके परम प्रिय शिष्य अर्जुन ने कहा कि मुझे केवल वह लक्ष्य दिखाई दे रहा है, जिसे निशाना बनाने के लिए आपने आदेश दिया है, यानि पक्षी की आंख. गुरू अपने शिष्य अर्जुन के इस उत्तर से अति प्रसन्न हुए और अर्जुन लक्ष्यभेद में पूर्णत: सफल रहा.

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एकलव्य-गुरू द्रोण की कथा

ये कथा द्वापर युग की है. एकलव्य नामक एक निषाद बालक ने महान गुरू द्रोणाचार्य को मन ही मन अपना गुरू मान लिया और उनकी पाषाण प्रतिमा बनाकर धनुर्विद्या का अभ्यास करने लगा. इस प्रकार वह एक बेहतरीन धनुर्धर बन गया. एक बार जब द्रोणाचार्य ने एकलव्य को धनुर्विद्या का अभ्यास करते देखा तो स्वयं चौंक गए. द्रोणाचार्य ने एकलव्य से गुरुदक्षिणा के रूप में उसके दाएं हाथा का अंगूठा मांगा और एकलव्य ने प्रसन्नता से अपने गुरू के चरणों में अपना अंगूठा अर्पित कर दिया.

आरुणि की गुरू भक्ति

आरुणि, ऋषि आयोदधौम्य का शिष्य था. एक बार आचार्य ने आरुणि को खेत में मेड़ जांचने के लिए भेजा. मेड़ एक ओर से टूट गई थी और वहां से पानी बह रहा था. आरुणि ने मेड़ बनाने का प्रयत्न किया लेकिन लगातार हो रही वर्षा के कारण वह मेड़ बनाने में सफल नहीं हो पा रहा था. आखिरकार आरुणि गुरू के आदेश के पालन के लिए स्वयं खेत की मेड़ पर इस प्रकार लेट गया कि पानी बहने से रोका जा सके. कई घंटे वह इसी प्रकार लेटा रहा. बाद में जब आचार्य आयोदधौम्य और दूसरे शिष्य आरुणि को ढूंढते हुए वहां पहुंचे तो आरुणि की गुरूभक्ति देश आश्चर्य में पड़ गए. आचार्य ने आरुणि को अपने ह्रदय से लगा लिया.

Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.

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