श्रीमद्भगवद्गीता केवल धर्म का ग्रंथ नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला भी सिखाती है. इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, ज्ञान और भक्ति का महत्व समझाते हुए भक्तों के भी अलग-अलग स्वरूप बताए हैं. ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख किया है और यह भी बताया है कि इनमें सबसे श्रेष्ठ भक्त कौन होता है.
गीता में बताए गए हैं चार प्रकार के भक्त
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय बताते हैं कि भगवद्गीता के सातवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि चार प्रकार के पुण्यात्मा लोग उनकी शरण में आते हैं आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी. गीता का प्रसिद्ध श्लोक है-
"चतुर्विधा भजन्ते मां जना: सुकृतिनोऽर्जुन।
आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।।"
कौन होते हैं आर्त और अर्थार्थी भक्त
बता दें कि आर्त भक्त वे होते हैं जो दुख, बीमारी या किसी संकट के समय भगवान को याद करते हैं. वहीं अर्थार्थी भक्त वे माने जाते हैं जो धन, सुख, ऐश्वर्य या भौतिक इच्छाओं की पूर्ति के लिए ईश्वर की आराधना करते हैं. गीता में इन्हें सबसे निम्न श्रेणी का भक्त बताया गया है.
जिज्ञासु भक्त की क्या होती है पहचान
उन्होंने बताया कि जिज्ञासु भक्त वह होता है, जिसके मन में ईश्वर और सत्य को जानने की इच्छा होती है. ऐसे लोग केवल इच्छा पूर्ति के लिए नहीं, बल्कि आध्यात्मिक ज्ञान की खोज में भगवान की शरण लेते हैं.
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भगवान श्रीकृष्ण ने किसे बताया सबसे प्रिय
ज्योतिषाचार्य पंडित कौशल पांडेय के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ज्ञानी भक्त को सबसे श्रेष्ठ और अपना सबसे प्रिय बताया है. ज्ञानी भक्त बिना किसी स्वार्थ और इच्छा के केवल भगवान में मन लगाता है. गीता के अनुसार, ऐसे भक्त का योगक्षेम स्वयं भगवान वहन करते हैं. यही कारण है कि ज्ञानी भक्त को भक्ति का सर्वोच्च स्वरूप माना गया है.
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