गणेश चतुर्थी के पावन अवसर पर देशभर में भगवान गणेश की आराधना की जा रही है. कहीं घरों में गणपति की स्थापना हुई है, तो कहीं भव्य पंडाल सजाए गए हैं. लेकिन बस्तर की धरती पर भगवान गणेश का एक ऐसा स्वरूप है, जो अपनी प्राचीनता, प्राकृतिक परिवेश और रहस्यमयी लोककथाओं के कारण खास पहचान रखता है.
दंतेवाड़ा जिले की बैलाडीला पर्वत श्रृंखला में करीब 3 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित ढोलकल गणेश घने जंगलों और पहाड़ों के बीच विराजमान हैं. जिला प्रशासन के अनुसार यहां करीब 3 फीट ऊंची पत्थर की गणेश प्रतिमा है, जिसे पुरातात्विक विशेषज्ञ 10वीं से 11वीं शताब्दी के आसपास का मानते हैं और इसे नागवंशी काल से जोड़ा जाता है.
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हजार साल पुरानी प्रतिमा का रहस्य
ढोलकल गणेश की सबसे बड़ी पहेली यह है कि आखिर इतनी दुर्गम और ऊंची पहाड़ी पर इस प्रतिमा को किसने स्थापित किया और उस दौर में इसे यहां तक कैसे पहुंचाया गया. प्रतिमा की स्थापना किस शासक या शिल्पकार ने की, इसका कोई निश्चित ऐतिहासिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है. यही रहस्य ढोलकल को और भी खास बनाता है. स्थानीय परंपराओं और उपलब्ध ऐतिहासिक मान्यताओं में इसे छिंदक नागवंशी शासकों से भी जोड़ा जाता है.
परशुराम और गणेश के युद्ध की किवदंतीढोलकल से जुड़ी सबसे चर्चित लोककथा भगवान गणेश और भगवान परशुराम से जुड़ी है. स्थानीय जनश्रुति के अनुसार, एक समय भगवान परशुराम भगवान शिव से मिलने कैलाश पहुंचे. उस समय भगवान गणेश द्वार पर पहरा दे रहे थे. गणेश जी ने परशुराम को अंदर जाने से रोक दिया. इसी बात को लेकर दोनों के बीच विवाद हुआ और फिर युद्ध की स्थिति बन गई.
किवदंती के अनुसार, युद्ध के दौरान परशुराम के फरसे के प्रहार से भगवान गणेश का एक दांत टूट गया. इसी वजह से भगवान गणेश को 'एकदंत' कहा जाता है. स्थानीय मान्यता इस पौराणिक कथा को ढोलकल की पहाड़ी से जोड़ती है और कहा जाता है कि इसी क्षेत्र में यह घटना हुई थी.
फरसपाल नाम से भी जुड़ी लोकमान्यताइसी किवदंती से जुड़ी एक और स्थानीय मान्यता बेहद रोचक है. कहा जाता है कि परशुराम के फरसे से गणेश जी का दांत टूटने की घटना की स्मृति में पहाड़ी के नीचे बसे गांव का नाम फरसपाल पड़ा.
प्रतिमा में भी दिखाई देती है कथा की झलकढोलकल गणेश की प्रतिमा की शिल्पकला भी अपने आप में खास है. प्रतिमा में भगवान गणेश के हाथों में अलग-अलग आयुध और प्रतीक दिखाई देते हैं. यही स्वरूप स्थानीय लोगों की उस मान्यता को और मजबूत करता है कि ढोलकल का संबंध गणेश और परशुराम की कथा से है.
जंगल के बीच आस्था का शिखरढोलकल की यात्रा भी अपने आप में किसी रोमांच से कम नहीं है. सड़क से आगे बढ़ने के बाद घने जंगलों और पहाड़ी रास्तों से होकर ट्रेकिंग करनी पड़ती है. कठिन चढ़ाई के बाद जब श्रद्धालु पहाड़ी की चोटी पर पहुंचते हैं, तो सामने खुले आसमान के नीचे विराजमान गणपति बप्पा के दर्शन होते हैं. चारों तरफ हरियाली, दूर तक फैली पहाड़ियां और बीच में सदियों पुरानी गणेश प्रतिमा यह दृश्य श्रद्धालुओं और प्रकृति प्रेमियों, दोनों के लिए खास अनुभव बन जाता है.
बस्तर की सांस्कृतिक पहचानस्थानीय लोगों के लिए ढोलकल केवल एक पुरानी प्रतिमा नहीं है. यह आस्था, प्रकृति और बस्तर की सांस्कृतिक विरासत से जुड़ा महत्वपूर्ण स्थान है. पीढ़ियों से चली आ रही मान्यताओं ने इस स्थल को धार्मिक महत्व दिया है, जबकि इसकी प्राचीन प्रतिमा इसे ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बनाती है.
गणेश चतुर्थी पर खास महत्वगणेश चतुर्थी के अवसर पर ढोलकल की आस्था और भी विशेष हो जाती है. जब देशभर में गणपति बप्पा की प्रतिमाएं घरों और पंडालों में स्थापित होती हैं, उसी समय बस्तर की पहाड़ी पर गणपति खुले आसमान के नीचे सदियों से विराजमान हैं. यहां न भव्य पंडाल हैं, न कोई चमकदार सजावट और न ही शहरों जैसी भीड़. बल्कि घने जंगल, पहाड़ और प्रकृति के बीच विराजमान गणपति बप्पा ही यहां की सबसे बड़ी पहचान हैं. यही ढोलकल गणेश की सबसे खास बात है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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