Daan Dene Aur Lene Ke Niyam: सनातन परंपरा में तीज-त्योहार, व्रत-पूजा और पावन तिथियों आदि पर दान देना अत्यंत ही पुण्यदायी कार्य माना गया है. हिंदू धर्म में जीवन से जुड़े तमाम तरह के दोष और पाप से मुक्ति तथा पुण्य की प्राप्ति के लिए कई प्रकार के दान बताए गये हैं. जिसे हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार करने का प्रयास भी करता है, लेकिन क्या आपको पता है कि हमें किसे, क्या और कैसे दान करना चाहिए? यदि नहीं तो आपको दान से जुड़े जरूरी नियम और इससे जुड़ी महत्ता को समझने के लिए महामंडलेश्वर आचार्य स्वामी भास्करानंद की सीख को जरूर जानना-समझना चाहिए.
दान से जुड़ी श्रीमद्भागवत की कथा
श्रीमद्भागवत पुराण में शुकदेव जी ने राजा परीक्षित को दान की महत्ता को बताते हुए इक्ष्वाकु वंश के प्रतापी राजा नृग कथा सुनाई है. राजा नृग महादानी और प्रतापी राजा थे. मान्यता है कि उनके समान कोई भी दानवीर नहीं था. राजा नृग प्रतिदिन हजरों गाय का दान किया करते थे. राजा नृग आम गाय नहीं बल्कि सोने के सींग मढ़ी हुई और चांदी के खुर वाली सुंदर रेशमी वस्त्रों से सुसज्जित बछड़े समेत गाय ब्राह्मणों को दान किया करते थे, लेकिन इतना दान करने के बाद भी उन्हें अगले जन्म में गिरगिट के रूप में क्यों जन्म लेना पड़ा? आइए इस कथा को विस्तार से जानते हैं.
किस भूल के कारण गिरगिट रूप में लेना पड़ा जन्म?
मान्यता है कि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण और बलराम के पुत्र खेलते-खेलते जब एक सूखे कुंए के पास पहुंचे तो उन्हें उसमें एक बड़ा विशाल गिरगिट दिखाई दिया. इससे पहले उन लोगों ने कभी इतना बड़ा गिरगिट नहीं देखा था. पहले-पहल तो उन बच्चों ने उस गिरगिट को निकालने का प्रयास किया लेकिन जब वे असफल रहे तो उन्होंने इसकी सूचना भगवान श्री कृष्ण को दी. इसके बाद भगवान श्री कृष्ण ने जब उस गिरगिट को अपने हाथ से बाहर निकाला तो उनका स्पर्श पाते ही राजा नृग अपने दिव्य स्वरूप में प्रकट हो गये. जब भगवान नृग ने उनसे उनका परिचय पूछा तो नृग ने पूर्व जन्म से लेकर गिरगिट बनने तक की पूरी कथा उन्हें सुना दी.
तब गाय को लेकर दो ब्राह्मणों के बीच हुआ विवाद
भगवान श्रीकृष्ण के याद दिलाते ही राजा नृग को अपने जीवनकाल की वह घटना याद आ गई. जब एक बार उनके द्वारा दान दी गई गाय को लेकर एक ब्राह्मण जा रहा था तो दूसरे ब्राह्मण ने उसे अपनी गाय बताते हुए आपत्ति जताई थी. जब वे दोनों राजा नृग के पास गये तो ब्राह्मण ने उन्हें कहा कि आपने मेरी गाय को दान करके पाप किया ह. तब राजा ने कहा कि मुझे यह गाय तो गौशाला से मिली है. तब ब्राह्मण ने बताया कि उसकी गाय भटकते-भटकते आपकी गौशाला में पहुंच गई थी.
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इस पर राजा ने कहा कि मैं आपको इस गाय के बदले 10 गाय दे देता हूं आप ले जाएं, लेकिन उस ब्राह्मण ने कहा कि मैं अयाचक ब्राह्मण हूं और मैं दान नहीं लेता हूं. तब राजा असमंजस में फंस गये क्योंकि दान में दी गई गाय को वे वापस ले नहीं सकते थे और अगला ब्राह्मण दूसरी गाय नहीं लेना चाहता था. मान्यता है कि अनजाने में दान से जुड़े इसी पाप के कारण उन्हें गिरगिट के रूप में जन्म लेना पड़ा था.
दान देते समय नहीं करनी चाहिए ये बड़ी भूल
दान से जुड़ी यह कथा बताती है कि हमेशा सही व्यक्ति को सही चीज का दान करना चाहिए. जो वस्तु आपकी नहीं है, उसका दान भूलकर भी नहीं करना चाहिए. दान देते समय भूलकर भी अभिमान या दिखावा नहीं करना चाहिए. जिस तरह दान देने का नियम, उसी तरह दान लेने का भी नियम होता है. दान लेने वाले व्यक्ति को उसके बदले गायत्री मंत्र का जप, साधना-आराधना करना पड़ता है, तभी जाकर वह उसे पचा पाता है.
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