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महादेव ने अपने माथे पर क्यों धारण किया चंद्रमा? जानें शिव पूजा से चंद्र दोष दूर करने का महाउपाय

सनातन परंपरा से जुड़े कई ऐसे तीज-त्योहार हैं जो चंद्र देवता से जुड़े हुए हैं. 16 कलाओं से परिपूर्ण चंद्र देवता का भगवान शिव से क्या संबंध है? महादेव ने इन्हें अपने माथे पर आखिर क्येां धारण कर रखा है? शिव पूजा से कैसे दूर होता है चंद्र दोष, जानने के लिए पढ़ें ये लेख.

महादेव ने अपने माथे पर क्यों धारण किया चंद्रमा? जानें शिव पूजा से चंद्र दोष दूर करने का महाउपाय
भगवान शिव और चंद्र देवता की पौराणिक कथा
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Shiv ji ke sir par chandrama kyon hai: सनातन पंरपरा में भगवान शिव एक ऐसे देवता हैं, जिनकी पूजा सबसे सरल और शीघ्र ही फलदायी मानी गई है. शिव का कोई भक्त उन्हें देवों के देव यानि महादेव तो कोई भोलेनाथ तो कोई औघड़दानी तो कोई उन्हें चंद्रशेखर कहकर बुलाता है. महादेव ने अपने हाथों में जहां त्रिशूल और डमरू धारण कर रखा है तो वहीं उनके गले में सर्प की माला और मस्तक पर चंद्रमा शोभायमान है. भगवान शिव ने अपने माथे पर आखिर चंद्रमा को कब और क्यों धारण किया? भगवान शंकर और चंद्र देवता का क्या संबंध है? इससे जुड़ी कथा और इसका धार्मिक महत्व आइए विस्तार से जानते हैं. 

राजा दक्ष की पुत्रियों से जुड़ी चंद्रमा की कहानी 

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पौराणिक कथा के अनुसार राजा दक्ष प्रजापति की 27 कन्याओं का विवाह चंद्र देवता के साथ हुआ. राज दक्ष की सभी कन्याओं में रोहिणी अत्यंत ही सुंदर थीं, जिसके कारण चंद्रमा उन पर ज्यादा स्नेह किया करते थे. चंद्र देवता द्वारा रोहिणी को ज्यादा प्रेम और अपनी उपेक्षा के बाद बाकी कन्याएं दुखी होकर अपने पिता राजा दक्ष के पास पहुंची. हिंदू मान्यता के अनुसार जब कन्याओं ने अपना दुख राजा दक्ष से बताया तो उन्होंने क्रोध में आकर चंद्र देवता को क्षय रोग होने का श्राप दे दिया. मान्यता है कि इसके बाद क्षय रोग के कारण चंद्र देवता की कलाएं धीरे धीरे क्षीण हो गईं. इसके बाद दुखी चंद्र देवता को देखकर नारद जी ने उन्हें शिव की शरण में जाने को कहा. इसके बाद भगवान शिव की कठिन साधना और तप करने बाद महादेव ने न सिर्फ उन्हें रोग मुक्त किया बल्कि उन्हें अपने मस्तक पर धारण भी किया. 

समुद्र मंथन से जुड़ी चंद्रमा की पौराणिक कथा

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भगवान शिव द्वारा चंद्रमा को अपने माथे पर धारण करने के पीछे दूसरी पौराणिक कथा भी मिलती है. जिसके अनुसार समुद्र मंथन के समय जब तमाम अनमोल रत्न के साथ हलाहल विष निकला तो देवता और दैत्य दोनों उसे देखकर परेशान हो गये और कोई भी उसे लेने को तैयार न हुए. इसके बाद सभी चिंतित हो गये कि उस विष का क्या किया जाए. मान्यता है कि तब देवों के देव महादेव ने सृष्टि क रक्षा के लिए उस हलाहल विष का पान किया और उसे अपने कंठ में समाहित कर लिया. जिसके कारण वे नीलकंठ कहलाए. मान्यता है कि जब विष के प्रभाव के कारण महादेव के शरीर का तापमान बढ़ने लगा तो सभी देवी-देवताओं ने भगवान शिव से प्रार्थना की कि वे चंद्र देवता को अपने मस्तक पर रखें, जिससे वे अपनी शीतलता से विष की गर्मी को दूर कर सकें. मान्यता है​ कि इसके महादेव ने चंद्र देवता को अपने मस्तक पर धारण कर लिया. 

शिव पूजा से चंद्र दोष दूर करने का उपाय

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  • चंद्र दोष से मुक्ति पाने के लिए सोमवार के दिन चांदी के लोटे या फिर ग्लास से शिव को दूध अर्पित करें. 
  • ज्योतिष के अनुसार कुंडली में स्थित चंद्र दोष को दूर करने और उसकी शुभता को पाने के लिए सोमवार के दिन व्यक्ति को सोमनाथ ज्योतिर्लिंग की विशेष पूजा करनी चाहिए. 
  • हिंदू मान्यता के अनुसार यदि कुंडली में चंद्रमा पीड़ित होकर बड़े कष्टों का कारण बन रहा हो तो सोमवार के दिन किसी भी शिवालय में जाकर भगवान शिव का दूध से अभिषेक करना चाहिए. 

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  • चंद्र दोष से मुक्ति पाने के लिए सोमवार के दिन शिवलिंग पर सफेद चंदन का तिलक लगाकर पूजा करनी चाहिए. साथ ही साथ सफेद चंदन को प्रसाद स्वरूप अपने माथे पर धारण करना चाहिए. 
  • हिंदू मान्यता के अनुसार सोमवार के दिन यदि भगवान शिव की पूजा अक्षत और सफेद पुष्प जैसे आक, मोगरे आदि से की जाए शिव शीघ ही प्रसन्न होकर चंद्र दोष के प्रभाव को दूर करते हैं. 
  • हिंदू मान्यता के अनुसार सोमवार के दिन किसी शिवालय में जाकर भगवान शिव की पूजा करने के बाद रुद्राक्ष की माला से चंद्र देवता के मंत्र ॐ श्रां श्रीं श्रौं सः चंद्रमसे नमः का जप करने से शीघ्र ही चंद्र दोष दूर होता है. 

(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)

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