आज 7 सितंबर, सोमवार को अजा एकादशी का व्रत रखा जा रहा है. सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विषेश महत्व माना गया है. यह दिन भगवान विष्णु को समर्पित माना जाता है. धार्मिक मान्यता है कि एकादशी के दिन श्रद्धा और नियम से व्रत करने और भगवान श्रीहरि की पूजा करने से व्यक्ति के पाप दूर होते हैं और जीवन में सुख-शांति आती है. वहीं, एकादशी की पूजा में कथा का पाठ या श्रवण करना जरूरी माना जाता है. मान्यताओं के अनुसार, एकादशी की पूजा का पूरा फल तभी मिलता है, जब पूजा के बाद व्रत कथा सुनी या पढ़ी जाए. कथा के बिना पूजा अधूरी मानी जाती है. ऐसे में आज भगवान विष्णु की पूजा के बाद आप यहां से अजा एकादशी की व्रत कथा का श्रवण कर सकते हैं.
अजा एकादशी की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार राजा युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी के बारे में पूछा. तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें अजा एकादशी की महिमा बताते हुए राजा हरिश्चंद्र की कथा सुनाई.
राजा हरिश्चंद्र अपनी सच्चाई और वचन निभाने के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध थे. वह किसी भी परिस्थिति में झूठ नहीं बोलते थे और दिए हुए वचन से पीछे नहीं हटते थे. लेकिन एक समय उनके जीवन में ऐसी कठिन परिस्थितियां आईं, जब उन्हें अपना राजपाट, धन और परिवार तक छोड़ना पड़ा.
कथा के अनुसार, एक दिन राजा को अपने सपने में विश्वामित्र मुनि दिखाई दिए. स्वप्न में उन्होंने विश्वामित्र मुनि को अपना पूरा राज्य दान करने का वचन दे दिया. अगले दिन जब विश्वामित्र राजा के पास पहुंचे और उनसे राज्य दान में मांगा, तो हरिश्चंद्र ने बिना किसी सवाल के अपना पूरा राजपाट उन्हें सौंप दिया. हालांकि, राज्य हाथ से जाने के बाद भी राजा की परेशानी खत्म नहीं हुई. विश्वामित्र ने उनसे दक्षिणा की मांग की. अब राजा के पास देने के लिए कुछ नहीं था. ऐसे में उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र को भी बेचने की स्थिति का सामना करना पड़ा. आखिर में उन्हें खुद भी एक चांडाल की सेवा करनी पड़ी. वह श्मशान में मृत लोगों के कफन लेने का काम करने लगे.
लेकिन इतने बड़े दुख और परेशानी के बावजूद राजा हरिश्चंद्र ने सत्य का साथ नहीं छोड़ा. समय बीतता गया और वह लगातार दुखी रहने लगे. उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि इस कठिन जीवन से बाहर निकलने का रास्ता क्या है. इसी दौरान उनकी मुलाकात महर्षि गौतम से हुई.
महर्षि गौतम ने राजा की पूरी परेशानी सुनी और उन्हें भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी. उन्होंने बताया कि यह एकादशी बहुत पुण्य देने वाली है और इसके व्रत से पापों का नाश होता है. महर्षि ने राजा को व्रत की महिमा समझाई और वहां से चले गए.
महर्षि की बात मानकर राजा हरिश्चंद्र ने अजा एकादशी का व्रत पूरी श्रद्धा और नियम से रखा. उन्होंने भगवान श्रीहरि की पूजा की और रात में जागरण किया. धार्मिक मान्यता के अनुसार, अजा एकादशी के व्रत के प्रभाव से राजा के जीवन के दुख धीरे-धीरे दूर होने लगे.
उन्हें अपनी पत्नी और पुत्र का साथ वापस मिला. इसके बाद उनका खोया हुआ राजपाट भी उन्हें फिर से प्राप्त हो गया. इस तरह भगवान श्रीहरि की कृपा से राजा हरिश्चंद्र का जीवन फिर से खुशियों से भर गया.
धार्मिक मान्यता है कि जो भक्त श्रद्धा से अजा एकादशी का व्रत करता है और इसकी कथा सुनता या पढ़ता है, उसे भी राजा हरिश्चंद्र की तरह पुण्य फल प्राप्त होता है.
(Disclaimer: यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है. एनडीटीवी इसकी पुष्टि नहीं करता है.)
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