- टेलीग्राम पर बैन को लेकर केंद्र सरकार ने डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड नेटवर्क के बढ़ते इस्तेमाल पर चिंता जताई.
- डार्क वेब को लेकर जितनी कहानियां और मिथक प्रचलित हैं, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है.
- डार्क वेब न तो पूरी तरह अच्छा है और न ही पूरी तरह बुरा, पर यह इंटरनेट की एक छिपी हुई लेकिन वास्तविक दुनिया है.
भारत में 22 जून तक टेलीग्राम पर बैन जारी रहेगा. दिल्ली हाई कोर्ट ने शुक्रवार को टेलीग्राम पर बैन लगाने के केंद्र सरकार के आदेश को सही ठहराया है. कोर्ट ने टेलीग्राम से कहा कि केंद्र सरकार ने जो कदम उठाए हैं, उनमें सबसे कम पाबंदियां हैं. इस सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट में केंद्र सरकार ने डार्क वेब और एन्क्रिप्टेड डिजिटल नेटवर्क के बढ़ते इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई. इसके बाद एक बार फिर डार्क वेब चर्चा के केंद्र में आ गया है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर डार्क वेब होता क्या है? क्या यह कोई अवैध इंटरनेट है? क्या वहां जाना गैरकानूनी है? और सरकारें व जांच एजेंसियां इसे लेकर इतनी सतर्क क्यों रहती हैं?
दरअसल, सच्चाई ये है कि डार्क वेब को लेकर जितनी कहानियां और मिथक प्रचलित हैं, वास्तविकता उससे कहीं अधिक जटिल है.
इंटरनेट का वह हिस्सा जो दिखाई नहीं देता
अधिकांश लोग इंटरनेट को वही मानते हैं जो उन्हें गूगल या अन्य सर्च इंजन प्लेटफॉर्म पर दिखाई देता है. लेकिन जानकारों के मुताबिक गूगल, बिंग और अन्य सर्च इंजन इंटरनेट के केवल एक हिस्से को ही इंडेक्स कर पाते हैं. इसे सर्फेस वेब कहा जाता है. इसमें समाचार वेबसाइटें, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म, ई-कॉमर्स साइट्स और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध वेब पेज शामिल होते हैं.
लेकिन इसके नीचे एक डीप वेब मौजूद है. इसमें ईमेल अकाउंट, बैंकिंग पोर्टल, मेडिकल रिकॉर्ड, सरकारी डेटाबेस और पासवर्ड से सुरक्षित ऑनलाइन सेवाएं आती हैं. यह हिस्सा सामान्य सर्च इंजन पर दिखाई नहीं देता, लेकिन पूरी तरह वैध और साथ ही बेहद जरूरी है.
इसी के भीतर एक छोटा सा हिस्सा डार्क वेब कहलाता है, जिसे जानबूझकर छिपाकर रखा जाता है और जहां पहुंचने के लिए खास सॉफ्टवेयर की जरूरत पड़ती है.

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आखिर डार्क वेब है क्या?
डार्क वेब ऐसी वेबसाइटों और सेवाओं का नेटवर्क है जिन्हें सामान्य ब्राउजर या सर्च इंजन के जरिए एक्सेस नहीं किया जा सकता. इन वेबसाइट्स तक पहुंचने के लिए आमतौर पर टॉर का इस्तेमाल किया जाता है. टॉर का पूरा नाम द अनियन ब्राउजर है.
यह तकनीक इंटरनेट पर उपयोगकर्ता की पहचान और लोकेशन को छिपाने के लिए विकसित की गई थी. टॉर प्रोजेक्ट का कहना है कि इसका मुख्य उद्देश्य लोगों को ऑनलाइन गोपनीयता और सुरक्षित संचार उपलब्ध कराना है.
आसान शब्दों में कहें तो डार्क वेब इंटरनेट का एक छिपा हुआ ऐसा हिस्सा है, जहां आम सर्च इंजन जैसे गूगल या बिंग पहुंच नहीं सकते.
इसे अक्सर अपराध, हैकिंग, अवैध कारोबार और गुप्त गतिविधियों से जोड़ा जाता है, क्योंकि यहां पहचान छिपाने और डेटा को सुरक्षित रखने के लिए खास एन्क्रिप्शन और गुमनाम तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है.
हालांकि, डार्क वेब की कहानी सिर्फ अपराध तक सीमित नहीं है. इसके समर्थकों का कहना है कि यह दुनिया के कई देशों में पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और व्हिसलब्लोअर्स के लिए एक सुरक्षित मंच भी है. ऐसे लोग, जो सरकारी निगरानी या सेंसरशिप के डर से खुलकर अपनी बात नहीं रख पाते, डार्क वेब का इस्तेमाल अपनी पहचान छिपाकर जानकारी साझा करने के लिए करते हैं.
डार्क वेब की शुरुआत, इसके काम करने के तरीके, साइबर अपराध में इसकी भूमिका और दुनिया के अलग-अलग देशों में इंटरनेट सेंसरशिप जैसे मुद्दों पर विस्तार से बात की गई. बातचीत में यह भी समझाया गया कि
डार्क वेब को केवल अपराध की दुनिया के रूप में देखना पूरी तस्वीर नहीं है, क्योंकि कई लोगों के लिए यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और गोपनीयता का एक महत्वपूर्ण साधन भी है.
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अधिकांश देशों में डॉर्क वेब का उपयोग करना गैरकानूनी नहीं है
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डार्क वेब कैसे काम करता है?
सामान्य इंटरनेट में जब कोई व्यक्ति किसी वेबसाइट पर जाता है तो उसका डेटा अपेक्षाकृत सीधे रास्ते से उस वेबसाइट तक पहुंचता है. लेकिन टॉर नेटवर्क में डेटा कई अलग-अलग सर्वरों के जरिए भेजा जाता है.
इस प्रक्रिया को अनियन रूटींग कहा जाता है. इसमें डेटा कई एन्क्रिप्शन परतों में लपेटा जाता है. हर सर्वर केवल इतना जानता है कि डेटा कहां से आया और आगे कहां जाना है. उसे पूरी यात्रा की जानकारी नहीं होती. इसी वजह से किसी उपयोगकर्ता की वास्तविक पहचान या स्थान का पता लगाना काफी कठिन हो जाता है.
टॉर प्रोजेक्ट के अनुसार यही तकनीक लाखों लोगों को अधिक सुरक्षित और निजी इंटरनेट उपयोग का विकल्प उपलब्ध कराती है.
तो क्या डार्क वेब अवैध है? तो इसका जवाब ये है कि यह डार्क वेब से जुड़ा सबसे बड़ा भ्रम है.
अमेरिका, यूरोप और भारत समेत अधिकांश देशों में टॉर ब्राउजर का उपयोग करना या डार्क वेब तक पहुंचना अपने आप में गैरकानूनी नहीं माना जाता. हालांकि वहां की जाने वाली गतिविधियां पूरी तरह कानून के दायरे में आती हैं.
यदि कोई व्यक्ति डार्क वेब का उपयोग पत्रकारिता, शोध, गोपनीय संवाद या सेंसरशिप से बचने के लिए करता है तो यह अलग बात है. लेकिन यदि कोई अवैध सामग्री खरीदने, डेटा चोरी करने या साइबर अपराध करने के लिए इसका इस्तेमाल करता है तो वह कानून का उल्लंघन होगा.

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डार्क वेब का इस्तेमाल कौन करता है?
डार्क वेब का उपयोग केवल अपराधी नहीं करते. टॉर प्रोजेक्ट, डिजिटल अधिकार संगठनों और कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों के अनुसार इसका उपयोग करने वालों में पत्रकार और खोजी रिपोर्टर, व्हिसलब्लोअर, मानवाधिकार कार्यकर्ता, सेंसरशिप वाले देशों के नागरिक, डिजिटल गोपनीयता को महत्व देने वाले उपयोगकर्ता शामिल हैं.
कई अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों ने अपने डॉक्युमेंट्स को सुरक्षित शेयर करने के लिए माध्यम के तौर पर टॉर आधारित सिस्टम अपनाए हैं ताकि मीडिया सोर्सेज की गोपनीयता को सुरक्षित रखा जा सके.
बेशक यह इंटरनेट की दुनिया का एक बहुत छोटा सा हिस्सा है लेकिन उतना ही सशक्त है और इसका इस्तेमाल करने वालों की संख्या लाखों में है.

डॉर्क वेब को लेकर सरकारों की क्या चिंता है?
यहीं से डार्क वेब का दूसरा पक्ष सामने आता है. एफबीआई, यूरोपोल और दुनिया भर की अन्य सरकारी एजेंसियों के मुताबिक डार्क वेब का इस्तेमाल साइबर अपराधी भी करते हैं.
कई जांच में सामने आया कि चोरी किया गया डेटा, हैकिंग टूल्स, मालवेयर, फर्जी डॉक्युमेंट्स और अन्य कई तरह की अवैध सेवाएं डॉर्क वेब प्लेटफॉर्म पर बेची जाती हैं.
यूरोपोल और अमेरिकी एजेंसियों ने पिछले कुछ वर्षों में कई बड़े डार्क वेब मार्केटप्लेस बंद किए हैं और हजारों अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई की है.
यही कारण है कि दुनिया भर की सरकारें डार्क वेब गतिविधियों की निगरानी को साइबर सुरक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा मानती हैं.

भारत के लिए यह मुद्दा क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत की चिंता किन वजहों से है?
भारत तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है. यूपीआई, डिजिटल बैंकिंग, ऑनलाइन एजुकेशन, ई-गवर्नेंस और आधार पर आधारित ऑनलाइन सेवाओं के बढ़ने के साथ ही साइबर सुरक्षा की चुनौतियां भी बढ़ी हैं और केंद्र सरकार इसे लेकर बहुत सतर्क है और
साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि डेटा चोरी की घटनाओं में प्राप्त जानकारी अक्सर डार्क वेब मंचों पर पहुंच सकती है, जहां उसे बेचने या साझा करने की कोशिश की जाती है.
इसी कारण भारतीय एजेंसियां साइबर अपराध और डार्क वेब गतिविधियों पर लगातार नजर रखती हैं.
भारत सरकार का कहना है कि डार्क वेब तक पहुंचना या उसे ब्राउज करना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है. लेकिन अगर कोई व्यक्ति डार्क वेब का इस्तेमाल किसी अवैध गतिविधि को अंजाम देने, उसे बढ़ावा देने या उसके लिए फंडिंग करने में करता है, तो यह गंभीर अपराध माना जाता है और इसके लिए कड़ी सजा का प्रावधान है.
हाल ही में केंद्र सरकार ने अदालत में एक महत्वपूर्ण रुख अपनाते हुए कहा कि एन्क्रिप्टेड मैसेजिंग प्लेटफॉर्म जैसे टेलीग्राम अब कई मायनों में "नए डार्क वेब" की तरह काम करने लगे हैं. सरकार का तर्क है कि ऐसे प्लेटफॉर्म पर मौजूद एन्क्रिप्शन, गुमनामी और बड़े पैमाने पर निजी चैनलों तथा ग्रुप्स की सुविधा का फायदा उठाकर साइबर अपराधी, ठग और संगठित अपराध गिरोह अपनी गतिविधियां छिपाकर चला सकते हैं.
सरकार के मुताबिक, इन प्लेटफॉर्म्स की तकनीकी संरचना कई बार जांच एजेंसियों के लिए अपराधियों तक पहुंचना मुश्किल बना देती है, जिससे अवैध कारोबार, साइबर धोखाधड़ी, डेटा चोरी, पेपर लीक और अन्य गैरकानूनी गतिविधियों को बढ़ावा मिल सकता है. इसी वजह से केंद्र सरकार ने अदालत में यह दलील दी कि ऐसे प्लेटफॉर्म्स के बढ़ते इस्तेमाल और उनसे जुड़े सुरक्षा जोखिमों को गंभीरता से देखने की जरूरत है.

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टेलीग्राम और डार्क वेब का संबंध क्या है?
यह समझना जरूरी है कि टेलीग्राम स्वयं डार्क वेब नहीं है. टेलीग्राम एक लोकप्रिय मैसेजिंग प्लेटफॉर्म है जिसका उपयोग दुनिया भर में करोड़ों लोग करते हैं.
हालांकि कई देशों की जांच एजेंसियों ने समय-समय पर आरोप लगाया है कि कुछ साइबर अपराधी समूह, डेटा लीक नेटवर्क और अवैध गतिविधियों से जुड़े लोग टेलीग्राम चैनलों और समूहों का उपयोग संचार या कंटेंट, डॉक्युमेंट्स शेयर करने के लिए करते हैं.
यही वजह है कि साइबर अपराध की जांच में कई बार टेलीग्राम और डार्क वेब का नाम एक साथ सुनाई देता है. लेकिन तकनीकी रूप से दोनों अलग चीजें हैं.
तो सवाल ये उठता है कि डार्क वेब को कैसे देखें? क्या यह खतरा है या अभिव्यक्ति की आजादी का एक माध्यम?
जहां एक तरफ यह पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और निरंकुश शासन में रहने वाले लोगों को सुरक्षित संवाद का माध्यम देता है. वहीं, दूसरी तरफ यही आजादी साइबर अपराधियों और अवैध नेटवर्क के लिए भी अवसर भी पैदा करती है.
लिहाजा शायद यही डार्क वेब की सबसे बड़ी पहेली है कि यह न तो पूरी तरह अच्छा है और न ही पूरी तरह बुरा. इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि इसके उपयोगकर्ता कौन हैं और वो इसका इस्तेमाल किए उद्देश्य से कर रहे हैं.
तो डार्क वेब इंटरनेट की एक छिपी हुई लेकिन वास्तविक दुनिया है. यह गूगल से दूर, एन्क्रिप्शन और गोपनीयता पर आधारित ऐसा नेटवर्क है जिसने डिजिटल स्वतंत्रता और साइबर अपराध दोनों को नई दिशा दी है.
टेलीग्राम को लेकर चल रही बहस के बीच डार्क वेब फिर चर्चा में है. लेकिन तथ्य यही बताते हैं कि डार्क वेब को केवल अपराध की नजर से देखना पूरी तस्वीर नहीं है. यह एक ऐसा डिजिटल क्षेत्र है जहां गोपनीयता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, राष्ट्रीय सुरक्षा और साइबर अपराध, ये सभी मुद्दे एक साथ मौजूद हैं.
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