- कॉकरोच जनता पार्टी एक डिजिटल व्यंग्यात्मक आंदोलन है जो सोशल मीडिया पर तेजी से लोकप्रिय हो रहा है.
- पार्टी के संस्थापक अभिजीत दिपके महाराष्ट्र के रहने वाले हैं और उन्होंने US से PR में मास्टर डिग्री हासिल की.
- भारत में राजनीतिक पार्टी बनने के लिए चुनाव आयोग के पास रजिस्ट्रेशन जरूरी है.
भारत की राजनीति में अक्सर नई पार्टियां बनती रही हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों में जिस 'पार्टी' ने सबसे ज्यादा सुर्खियां बटोरी हैं, वह कोई पारंपरिक राजनीतिक संगठन नहीं बल्कि इंटरनेट और मीम कल्चर से निकला एक व्यंग्यात्मक आंदोलन है- 'कॉकरोच जनता पार्टी' यानी CJP.
सिर्फ कुछ दिनों में इस डिजिटल आंदोलन ने सोशल मीडिया पर लाखों-करोड़ों लोगों का ध्यान खींच लिया. इंस्टाग्राम पर इसके फॉलोअर्स तेजी से बढ़े, X पर इसका अकाउंट भारत में 'withheld' यानी बंद कर दिया गया और इंटरनेट पर इसे लेकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, युवाओं की बेरोजगारी और राजनीतिक व्यंग्य पर नई बहस शुरू हो गई. CJP की लोकप्रियता का अंदाजा इस बात से लगाइए कि CJP के इंस्टाग्राम पर 21 मई शाम 7 बजे तक 1.6 करोड़ से ज्यादा फॉलोअर्स हो गए, जो देश की किसी भी राजनीतिक पार्टी से ज्यादा हैं
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लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया पर वायरल होना किसी संगठन को राजनीतिक पार्टी बना देता है? अगर कॉकरोच जनता पार्टी सच में चुनाव लड़ना चाहे तो क्या चुनाव आयोग उसे मान्यता देगा? और क्या उसे 'कॉकरोच' या 'मोबाइल फोन' जैसा चुनाव चिन्ह मिल सकता है?

क्या है ‘कॉकरोच जनता पार्टी'?
सोशल मीडिया पर वायरल यह आंदोलन खुद को बेरोजगार और सिस्टम से नाराज युवाओं की आवाज बताता है. इसकी शुरुआत अभिजीत दिपके नाम के एक युवक ने की. अभिजीत दिपके महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) के रहने वाले हैं. वह एक प्रोफेशनल पॉलिटिकल कम्युनिकेशन स्ट्रेटेजिस्ट हैं. उन्होंने पुणे से जर्नलिज्म में ग्रेजुएशन की और इसके बाद हायर एजुकेशन के लिए अमेरिका का रुख किया. अभिजीत ने अमेरिका की बॉस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस (PR) में मास्टर ऑफ साइंस (MS) की डिग्री हासिल की है.
2020 से 2022 के बीच वे आम आदमी पार्टी (AAP) की सोशल मीडिया टीम के साथ भी काम कर चुके हैं. दिल्ली विधानसभा चुनाव 2020 के दौरान AAP के पक्ष में सोशल मीडिया पर मीम्स की बाढ़ में उनका योगदान अहम माना जाता है. इसके अलावा अभिजीत दिल्ली के शिक्षा विभाग में कम्युनिकेशंस एडवाइजर के तौर पर भी काम कर चुके हैं.
अब लौटते हैं कॉकरोच जनता पार्टी पर. इस पार्टी का घोषणापत्र भी पारंपरिक राजनीति से अलग और व्यंग्यात्मक है. इसमें दलबदल करने वाले नेताओं पर लंबा चुनावी प्रतिबंध, महिलाओं को 50% प्रतिनिधित्व और रिटायर जजों को राज्यसभा न भेजने जैसी बातें कही गई हैं.
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हालांकि अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि यह संगठन वास्तव में राजनीतिक दल के रूप में चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा है या यह केवल एक डिजिटल-सैटायर मूवमेंट है. आइए अब समझ लेते हैं कि 'पार्टी गठन' को लेकर भारत का कानून क्या कहता है?
भारत में राजनीतिक पार्टी कैसे बनती है?
भारत में कोई भी संगठन खुद को राजनीतिक दल कह सकता है, लेकिन चुनाव लड़ने और चुनाव चिन्ह पाने के लिए उसे भारतीय चुनाव आयोग (ECI) के पास पंजीकरण कराना पड़ता है. यह प्रक्रिया लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (Representation of the People Act) की धारा 29A के तहत होती है.
चुनाव आयोग के नियम क्या कहते हैं?
किसी भी नए राजनीतिक संगठन को गठन के 30 दिनों के भीतर आवेदन देना होता है. पार्टी का संविधान जमा करना पड़ता है. यह बताना पड़ता है कि पार्टी लोकतंत्र, समाजवाद, धर्मनिरपेक्षता और संविधान के प्रति प्रतिबद्ध है. कम से कम 100 सदस्यों का विवरण देना होता है, जो मतदाता हों. पब्लिक नोटिस और अखबारों में विज्ञापन भी प्रकाशित करना पड़ता है ताकि कोई आपत्ति हो तो दर्ज कर सके.
रजिस्ट्रेशन के बाद पार्टी को 'Registered Unrecognised Political Party' का दर्जा मिलता है. इसका मतलब यह नहीं कि उसे तुरंत स्थायी चुनाव चिन्ह मिल जाएगा.
चुनाव चिन्ह कैसे मिलते हैं?
भारत में चुनाव चिन्हों को लेकर नियम Election Symbols (Reservation and Allotment) Order, 1968 के तहत तय होते हैं.
चुनाव चिन्ह दो तरह के होते हैं:1. आरक्षित चिन्ह
ये केवल मान्यता प्राप्त दलों को मिलते हैं.
जैसे: BJP का कमल, AAP का झाड़ू या BSP का हाथी.
2. फ्री सिंबल
नई पार्टियों और निर्दलीय उम्मीदवारों को दिए जाते हैं. इनमें कई अजीब और कम चर्चित चिन्ह भी होते हैं, जैसे
- एयर कंडीशनर
- CCTV कैमरा
- शतरंज बोर्ड
- नेल कटर
- ताला-चाबी
- बैट
- चार्जर
लेकिन कोई भी पार्टी मनमर्जी से चिन्ह नहीं चुन सकती.

क्या ‘कॉकरोच' चुनाव चिन्ह मिल सकता है?
यहीं सबसे बड़ा कानूनी पेच है. चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक कोई नई पार्टी तीन नए चुनाव चिन्ह प्रस्तावित कर सकती है. लेकिन 1991 के बाद आयोग ने एक अहम नियम लागू किया था. नए चुनाव चिन्ह किसी जानवर या पक्षी पर आधारित नहीं होंगे. यह फैसला पशु अधिकारों से जुड़ी शिकायतों के बाद लिया गया था. आरोप लगे थे कि चुनाव प्रचार में असली जानवरों का इस्तेमाल कर उन्हें परेशान किया जाता है. बाद में चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों को प्रचार में जानवरों के उपयोग से बचने की सलाह भी दी थी.
यानी हाथी, शेर, ऊंट जैसे पुराने चिन्ह इसलिए बचे क्योंकि वे पहले से आवंटित थे. लेकिन नए पशु-आधारित चिन्ह लगभग बंद कर दिए गए. ऐसे में 'कॉकरोच' यानी तिलचट्टा चुनाव चिन्ह बन पाएगा, इसकी संभावना बेहद कम मानी जा रही है. हालांकि तकनीकी तौर पर अंतिम फैसला चुनाव आयोग ही करेगा कि वह कॉकरोच को 'animal/insect category' में किस तरह देखता है.
यह भी पढ़ें- "कॉकरोच जनता पार्टी": सोशल मीडिया का बवाल या बुलबुला?
क्या मोबाइल फोन चुनाव चिन्ह बन सकता है?
रिपोर्ट्स के मुताबिक CJP ने 'मोबाइल फोन' चुनाव चिन्ह की भी इच्छा जताई है. लेकिन यहां भी दिक्कत है. चुनाव आयोग की फ्री सिंबल सूची में लैंडलाइन फोन है, मोबाइल चार्जर है. लेकिन 'मोबाइल फोन' खुद सूची में मौजूद नहीं है. ऐसे में या तो आयोग नया चिन्ह मंजूर करे, या पार्टी को उपलब्ध फ्री सिंबल में से कोई विकल्प चुनना पड़े.
सोशल मीडिया की लोकप्रियता बनाम जमीनी राजनीति
CJP का मामला इसलिए दिलचस्प है क्योंकि यह भारत में पहली बार नहीं है जब कोई ऑनलाइन मूवमेंट अचानक राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हो, लेकिन यह शायद पहला ऐसा उदाहरण है जहां मीम कल्चर, बेरोजगारी और डिजिटल व्यंग्य ने मिलकर एक राजनीतिक ब्रांड बना दिया. इस आंदोलन ने कुछ ही दिनों में करोड़ों युवाओं तक पहुंच बनाई और बेरोजगारी, आर्थिक दबाव और सिस्टम से मोहभंग जैसे मुद्दों को हास्य और मीम्स के जरिए उठाया.
सिर्फ सोशल मीडिया से नहीं बनेगी बात
लेकिन भारत की चुनावी राजनीति सिर्फ सोशल मीडिया से नहीं चलती. किसी भी पार्टी को संगठन बनाना, सदस्य जुटाना, फंडिंग लाना, चुनाव लड़ना, वोट प्रतिशत हासिल करना और राज्यों में प्रदर्शन करना पड़ता है. तभी उसे राज्य स्तरीय या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा मिलता है.
X अकाउंट ब्लॉक होने पर विवाद
इस बीच CJP का X अकाउंट भारत में “withheld” कर दिया गया, जिसके बाद इंटरनेट पर सेंसरशिप और फ्री स्पीच को लेकर बहस तेज हो गई. कई रिपोर्ट्स में कहा गया कि यह कार्रवाई कानूनी मांग के बाद हुई. हालांकि सरकार या X की ओर से विस्तृत आधिकारिक कारण सार्वजनिक नहीं किए गए हैं. सोशल मीडिया पर इसे लेकर समर्थकों और आलोचकों के बीच तीखी बहस देखने को मिली. Reddit और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर बड़ी संख्या में यूजर्स ने इसे लोकतंत्र, व्यंग्य और डिजिटल राजनीतिक अभिव्यक्ति से जोड़कर देखा.
'कॉकरोच जनता पार्टी' फिलहाल भारतीय राजनीति से ज्यादा इंटरनेट संस्कृति और युवाओं की नाराजगी का प्रतीक बनकर उभरी है. लेकिन सोशल मीडिया की लोकप्रियता और चुनाव आयोग की मान्यता, दोनों बिल्कुल अलग चीजें हैं. अगर यह संगठन सच में चुनावी राजनीति में उतरना चाहता है, तो उसे चुनाव आयोग में पंजीकरण, कानूनी प्रक्रिया और चुनाव चिन्ह से जुड़े सख्त नियमों का सामना करना होगा. और जहां तक 'कॉकरोच' चुनाव चिन्ह का सवाल है, मौजूदा नियमों को देखें तो उसका रास्ता काफी कठिन नजर आता है.
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