- असम में बीजेपी ने हैट्रिक यानी लगातार तीसरी बार जीत हासिल की है.
- असम विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी करीब 80 फीसद सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रही है.
- तीसरी बार सत्ता में वापसी कर रही BJP ने स्पष्ट किया है कि राज्य में सियासत के पुराने समीकरण अब बदल चुके हैं.
असम विधानसभा चुनाव 2026 में बीजेपी करीब 80 फीसद सीटों के साथ ऐतिहासिक जीत की ओर बढ़ रही है. राज्य में बीजेपी ने हैट्रिक यानी लगातार तीसरी बार जीत हासिल की है. वहां की राजनीति में इस बार जो तस्वीर उभरकर सामने आई है, वो महज चुनावी जीत नहीं बल्कि राजनीतिक मॉडल की मजबूती की कहानी है.
तमाम एग्जिट पोल में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन को 88-100 सीटों के साथ भारी जीत की ओर बढ़ता दिखाया गया था और नतीजे भी उसी के अनुरूप आ रहे हैं. जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन को 24 से 36 सीटों पर सिमटते दिखाया गया था, जो 20 सीटों के ईर्द-गिर्द सिमटती दिख रही है. बीजेपी की इस जीत को जहां संभव बनाया मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की लगातार आक्रामक रणनीति ने, तो कुछ ऐसे कारण रहे जिन्होंने मिलकर असम में बीजेपी की हैट्रिक जीत की नींव रखी.
1. परिसीमन का गेमचेंजर वाला असर
2023 के परिसीमन ने असम की राजनीति का पूरा गणित बदल दिया. पहले जहां करीब 35 सीटें अल्पसंख्यक प्रभाव वाली मानी जाती थीं, वो घटकर करीब 23 रह गईं. इस बदलाव से जनजातीय और स्थानीय समुदायों का प्रभाव बढ़ा. कई सीटों पर पुराने वोट बैंक समीकरण टूट गए. कांग्रेस और तीसरी सबसे बड़ी पार्टी अखिल भारतीय संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (एआईयूडीएफ) का वोट-टू-सीट कन्वर्जन कमजोर हुआ. बराक वैली जैसे इलाकों में सीटों के पुनर्गठन ने बड़े नेताओं तक को नई जमीन तलाशने पर मजबूर कर दिया.
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2. घुसपैठ और पहचान की सियासत
असम की राजनीति में पहचान का मुद्दा हमेशा से रहा है, लेकिन इस बार बीजेपी ने इसे और जोर-शोर से उठाया. सीएए और एनआरसी को असमिया अस्मिता के साथ जोड़ा गया. सरकारी जमीन से अतिक्रमण हटाने को संस्कृति बचाने से जोड़ा गया. 'जाती, माटी, भेटी' का नारा बुलंद किया गया जिससे लोगों का जुड़ाव हुआ. हिमंत बिस्वा सरमा ने इस मुद्दे को सिर्फ कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि अस्तित्व की लड़ाई के तौर पर पेश किया, जिससे स्थानीय समुदायों में एकजुटता बढ़ी.
3. अरुणोदय और डीबीटी वाले वेलफेयर मॉडल
बीजेपी की जीत का सबसे मजबूत स्तंभ उसका लाभार्थी मॉडल रहा. अरुणोदय योजना के तहत 26 लाख महिलाओं के बैंक खाते में सीधे पैसे भेजे गए. अबल इंजन सरकार के कई फायदे दिखे. ग्रामीण इलाकों में इसका सीधा असर देखने को मिला. इससे बीजेपी ने एक ऐसा वोट बैंक तैयार किया, जो जाति-धर्म से ऊपर उठकर खुद को होने वाले लाभ के आधार पर वोट करता है.
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4. चाय बागान और जनजातीय इलाकों में पकड़
असम की 35-45 सीटों पर चाय बागान समुदाय का असर है, जो पहले कांग्रेस का गढ़ था. राज्य की बीजेपी सरकार ने इनकी मजदूरी बढ़ाई. पक्के घर, बिजली और स्वास्थ्य सुविधाएं दीं. जनजातीय समझौतों (बोडो, कार्बी) से स्थिरता आई. इससे यह पूरा बेल्ट ही बीजेपी की ओर झुक गया.
5. बिखरा हुआ विपक्ष और कमजोर नैरेटिव
इस चुनाव में विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी एकजुटता की कमी रही. राज्य में दूसरी सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस, तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (AIUDF), असम गण परिषद (AJP), राइजोर दल (अखिल गोगोई की पार्टी) अलग-अलग लड़े. गठबंधन को लेकर भ्रम बना रहा. कोई स्पष्ट विकल्प पेश नहीं किया जा सका. कांग्रेस करीब डेढ़ दर्जन सीटों पर जीत की ओर बढ़ रही है पर उसके राज्य प्रमुख गौरव गोगोई ही जोरहाट से चुनाव हार गए. संगठन की अंदरुणी खींचतान और नेताओं के पलायन ने चुनाव में कांग्रेस को कमजोर किया.
असम विधानसभा चुनाव में बीजेपी की यह लगातार तीसरी जीत है. पहचान की राजनीति, विकास के मुद्दे, मजबूत नेतृत्व, आक्रामक कैंपेन और कमजोर विपक्ष को भुनाना बीजेपी को बखूबी आता है. अगर यही ट्रेंड जारी रहा तो आने वाले समय में असम की राजनीति में बीजेपी का दबदबा और मजबूत हो सकता है.
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