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This Article is From Nov 26, 2018

मध्य प्रदेश में 'बैटल ऑफ बुधनी' पर सबकी निगाहें, जहां बीजेपी और कांग्रेस की प्रतिष्ठा है दांव पर

मध्यप्रदेश में सबसे दिलचस्प मुकाबला है बैटल ऑफ बुधनी का, जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री व पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव चुनावी मैदान में हैं.

मध्य प्रदेश में 'बैटल ऑफ बुधनी' पर सबकी निगाहें, जहां बीजेपी और कांग्रेस की प्रतिष्ठा है दांव पर
बुधनी सीट पर सभी की निगाहें हैं.
भोपाल:

मध्यप्रदेश में सबसे दिलचस्प मुकाबला है बैटल ऑफ बुधनी का, जहां मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के सामने पूर्व केंद्रीय राज्यमंत्री व पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अरुण यादव चुनावी मैदान में हैं. इससे मुकाबला दिलचस्प हो गया है. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण में अरुण यादव को राज्य का भविष्य बताया है, जिससे यह कयास भी लगाए जा रहे हैं कि कोई करिश्मा होने की सूरत में अरुण यादव भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार हो सकते हैं. नाम घोषित होने के बाद से ही अरुण यादव बुधनी में जमे हैं. कोई माता की चुनरी ओढ़ा रहा है, तो कोई तिलक लगा रहा है. बुधनी में कुल 245049 मतदाता हैं, जिसमें एससी-एसटी लगभग 45000, किरार, जिससे शिवराज सिंह चौहान आते हैं. लगभग 25000 वहीं यादव और रघुवंशी लगभग 41000 हैं. लेकिन अरुण यादव का कहना है, 'सिर्फ जाति के बूते चुनाव नहीं जीते जाते, इलाके में उन्हें पैराशूट उम्मीदवार कहा जा रहा है क्योंकि अरुण मालवा से आते हैं. भ्रष्टाचार, लॉ एंड ऑर्डर, सैंड माफिया, बीजेपी नेताओं ने जैसी ठेकेदारी प्रथा शुरू की है सबके खिलाफ चुनाव है. हम कोशिश कर रहे हैं जाति से चुनाव कभी नहीं होता है, हम जनता के बीच में हैं, जनता निर्णय करेगी हमारे लिये. पैराशूट उम्मीदवार जैसा कुछ नहीं है.'

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कांग्रेस ने पिछले तीन चुनावों में शिवराज के सामने कमजोर प्रत्याशी उतारे थे. हालांकि, किसी भी मुख्यमंत्री को उसके गढ़ में हराना विपक्षी दल के लिए कभी आसान नहीं रहा है. इसके बावजूद उम्मीद तो रहती ही है कि कोई करिश्मा हो जाए. सियासी इतिहास में ऐसे चंद उदाहरण भी हैं, जब विपक्षी दल के मजबूत चेहरों ने तत्कालीन मुख्यमंत्रियों को उनके किले में सेंध लगाकर मात दे दी. मध्यप्रदेश में 1962 में तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाशनाथ काटजू को जनसंघ के लक्ष्मीनारायण जमनालाल ने 1542 वोट से हराया था. 1977 में तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल को जनता दल के पवन दीवान से मात खाना पड़ी थी. बुधनी विधानसभा में ओबीसी निर्णायक हैं, कांग्रेस की रणनीति है कि शिवराज सिंह को ज्यादा से ज्यादा समय तक बुधनी सीट पर उलझाकर रखा जाए. शिवराज के सामने हारने पर भी अरुण का राजनीतिक कद बढ़ेगा, जीतने पर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर भी उनकी स्वभाविक दावेदारी होगी. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने अपने भाषण में इसकी तरफ इशारा भी दिया, जब उन्होंने मंच से कहा, 'ये मध्यप्रदेश के फ्यूचर हैं, मैंने अरुण से कहा कि तुम्हें शिवराज के खिलाफ लड़ना है, उसने एक मिनट की देरी नहीं लगाई और कहा मैं हारकर नहीं हराकर आऊंगा.' अरुण यादव के मैदान में आने से इतना तो तय है कि शिवराज सिंह को विपक्ष की तरफ से पहले की तरह वॉकओवर नहीं मिलेगा, हालांकि इलाके में मुख्यमंत्री और बीजेपी की लोकप्रियता भी कम नहीं है.


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शिवराज का घर बुधनी है, लेकिन जिम्मा पूरे मध्यप्रदेश का सो उनके लिये पत्नी साधना सिंह, और बेटा कार्तिकेय मोर्चा संभाले हैं. हालांकि गाहे बगाहे उन्हें भी लोगों की नाराज़गी झेलनी पड़ती है. बुधनी का जैत शिवराज सिंह का पैतृक गांव है, इस सीट से 6 बार बीजेपी तो 5 बार कांग्रेस को जीत मिली है. शिवराज 2006 से यहां जीत रहे हैं. पहली बार 1990 में लड़े थे. 2006 में पार्टी ने यहां दिग्विजय सरकार में मंत्री रहे स्थानीय नेता राजकुमार पटेल को शिवराज के खिलाफ मैदान में खड़ा किया था, लेकिन चौहान ने उन्हें 36000 वोटों से हरा दिया. 2008 में बुधनी से एक बार फिर स्थानीय नेता महेश राजपूत को खड़ा किया गया, लेकिन महेश राजपूत की भी इस सीट से 41 हजार वोटों से शिकस्त हो गई. 2013 के विधानसभा चुनाव में शिवराज सिंह चौहान के सामने महेंद्र सिंह चौहान खड़े थे. चौहान बनाम चौहान की ये लड़ाई शिवराज 84 हजार वोटों से जीती अब मुकाबले नर्मदा किनारे पैदा हुए शिवराज सिंह चौहान, चारों ओर नर्मदा से घिरे निमाड़ में पैदा हुए अरुण यादव के बीच है. दो नर्मदा पुत्रों की ये लड़ाई निश्चित तौर पर सूबे की राजनीति को नया मुकाम देगी.  

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