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दिल्ली में फिर लगा GRAP, क्या ये पलूशन रोकने के लिए काफी? एक्सपर्ट ने बताया-क्या करने की जरूरत

Delhi Air Pollution: सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए उन स्रोतों पर भी ध्यान देना जरूरी है जो वाहनों से नहीं जुड़े हैं, लेकिन 'पार्टिकुलेट मैटर' (हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों) को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं.

दिल्ली में फिर लगा GRAP, क्या ये पलूशन रोकने के लिए काफी? एक्सपर्ट ने बताया-क्या करने की जरूरत
Delhi Smog: दिल्ली-एनसीआर में स्मॉग अब दिखने लगा है. (फोटो-IANS)
  • अक्टूबर के अंत तक दिल्ली-एनसीआर में घना स्मॉग और प्रदूषण का स्तर बढ़कर GRAP का पहला चरण लागू हो चुका है
  • मानसून की देर से बारिश और अल नीनो की जलवायु स्थितियों के कारण इस बार स्मॉग आने में देरी हुई है
  • पिछले चार वर्षों में दिल्ली के सर्दियों के मौसम में वायु गुणवत्ता सूचकांक में कोई स्थायी सुधार नहीं हुआ है

Delhi-NCR Air Pollution: अक्टूबर के खत्म होते-होते, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) एक बार फिर प्रदूषण की चपेट में है. हालांकि, इस बार दिल्ली को घना स्मॉग (धुएं और कोहरे का मिश्रण) कुछ देर से आया है, मगर बच नहीं सका. हालात ये हैं कि ग्रैप (GRAP) का पहला चरण लागू हो चुका है. GRAP 1 लागू होने के साथ ही कई सवाल खड़े हो गए हैं. कुछ लोग तो यह भी सवाल उठा रहे हैं कि प्रदूषण रोकने के इन उपायों से वास्तव में कोई फर्क पड़ता भी है या नहीं. विशेषज्ञ और कार्यकर्ता इस बात की गहराई से पड़ताल कर रहे हैं कि आखिर दिल्ली का दम क्यों घुट रहा है और इस स्थिति को सुधारने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

इस साल स्मॉग देर से क्यों आया?

आमतौर पर, अक्टूबर के मध्य तक दिल्ली की हवा की गुणवत्ता काफी खराब हो जाती है. ऐसा तब होता है जब दक्षिण-पश्चिम मानसून वापस चला जाता है और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाने का काम शुरू हो जाता है. लेकिन इस बार स्थिति कुछ अलग थी. अक्टूबर की शुरुआत तक मानसून की बारिश जारी रही और सतह पर हवा की गति भी बनी रही, जिससे हवा में मौजूद बारीक कण (पार्टिकुलेट मैटर) सामान्य से अधिक समय तक साफ होते रहे.

हालांकि, 'सेंटर फॉर रिसर्च ऑन एनर्जी एंड क्लीन एयर' (CREA) के विश्लेषक मनोज कुमार कुछ ऐसे दीर्घकालिक रुझानों की ओर इशारा करते हैं, जो बताते हैं कि मौसम में होने वाले अल्पकालिक बदलावों के बावजूद निश्चिंत होने की कोई वजह नहीं है.

कुमार बताते हैं, "पिछले चार वर्षों में दिल्ली में सर्दियों के दौरान AQI (वायु गुणवत्ता सूचकांक) में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं, और इसमें कोई लगातार सुधार नहीं दिखा है. सर्दियों में औसत AQI 2022-23 में 280 था, जो 2023-24 में बढ़कर 304 हो गया; फिर 2024-25 में घटकर 285 पर आ गया और 2025-26 में फिर से बढ़कर 295 हो गया."

मौसम में होने वाले इन बदलावों पर विचार करते समय, 'अल नीनो' (El Niño) कारक को भी ध्यान में रखना चाहिए. इस वर्ष भी बड़े वैश्विक जलवायु प्रभावों का असर देखने को मिल रहा है.

'अल नीनो' की स्थिति भारतीय उपमहाद्वीप के क्षेत्रीय मौसम पैटर्न को बाधित करती है, जिससे वायुमंडल में ऐसी स्थितियां बन जाती हैं, जो वायु प्रदूषण को और बढ़ा देती हैं. हवा के संचार पैटर्न में बदलाव के कारण जमीनी स्तर पर हवाएं लंबे समय तक शांत रहती हैं, जिससे हवा में मौजूद भारी प्रदूषक तत्व इधर-उधर नहीं फैल पाते और एक ही जगह बने रहते हैं.

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इतना ही नहीं, सर्दियों में तापमान गिरने से वायुमंडलीय सीमा परत (एटमॉस्फेरिक बाउंड्री लेयर) सिकुड़ जाती है, जिससे वाहनों, उद्योगों और बायोमास से निकलने वाला प्रदूषण जमीन के करीब ही फंस जाता है. इसका असर फसलों की कटाई के समय पर भी पड़ता है; पंजाब और हरियाणा में देर से हुई बारिश के कारण फसलों की कटाई में देरी हुई, जिससे पराली जलाने की सबसे ज्यादा घटनाएं अक्टूबर के आखिर और नवंबर में हुईं—ठीक उसी समय, जब सर्दियों में हवाएं सबसे शांत होती हैं.

ग्रैप होता क्या है

जब वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है, तो 'कमीशन फॉर एयर क्वालिटी मैनेजमेंट' (CAQM) 'ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान' (GRAP) लागू कर देता है. GRAP असल में एक चरण-आधारित (टियर-बेस्ड) प्रणाली है, जिसके तहत धूल को नियंत्रित करने से लेकर कुछ खास तरह के वाहनों और निर्माण कार्यों पर रोक लगाने जैसे अस्थायी उपाय किए जाते हैं.

हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि मुख्य उपाय के रूप में केवल GRAP पर निर्भर रहना एक 'प्रतिक्रियात्मक' (रिएक्टिव) कदम है, न कि 'सक्रिय' (प्रो-एक्टिव). शहर की इन आपातकालीन उपायों पर निर्भरता के बारे में मनोज कुमार कहते हैं:

"सर्दियों के दौरान GRAP के सख्त चरण लागू होना एक आम बात हो गई है. पिछले चार सर्दियों के मौसमों में, दिल्ली लगभग 78–83% दिनों तक GRAP के दूसरे या उससे ऊंचे चरणों के दायरे में रही है. इसका मतलब यह है कि शहर को सर्दियों के हर पांच दिनों में से लगभग चार दिन आपातकालीन प्रतिबंधों की जरूरत पड़ती है."

इसके अलावा, प्रदूषण के रुझानों पर CREA के विश्लेषण से पता चलता है कि एक बार प्रदूषण का स्तर बहुत बढ़ जाने पर, आपातकालीन प्रतिबंध शायद ही कभी उसे कम कर पाते हैं.

कुमार कहते हैं, "यह समझने के लिए कि प्रदूषण के गंभीर होने पर क्या होता है, हमने 12 ऐसी घटनाओं का विश्लेषण किया, जिनमें दिल्ली का प्रदूषण स्तर 'स्टेज III' से नीचे से बढ़कर 'स्टेज III' या 'IV' तक पहुंच गया था. इनमें से 10 मामलों में, अगले सप्ताह का औसत AQI पिछले सप्ताह की तुलना में अधिक था. बाकी दो मामलों में, इसमें कमी आई. इससे पता चलता है कि सख्त चरण लागू किए जाने के बाद भी प्रदूषण अक्सर उच्च स्तर पर बना रहा या और बढ़ गया."

हालांकि प्रदूषण के गंभीर स्तर पर पहुंचने के दौरान GRAP महत्वपूर्ण है, लेकिन कुमार इस बात पर जोर देते हैं कि केवल GRAP के भरोसे रहकर प्रदूषण को रोकने के स्थायी उपायों की कमी पूरी नहीं की जा सकती.

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वे आगे कहते हैं, "गंभीर प्रदूषण से निपटने के लिए GRAP जरूरी है, लेकिन यह प्रदूषण को रोकने के उपायों का विकल्प नहीं हो सकता. इसे बचाव की अंतिम पंक्ति के रूप में ही देखा जाना चाहिए, जिसके साथ पूरे साल उत्सर्जन पर सख्त नियंत्रण लागू हो. NCR क्षेत्र में प्रदूषण के सभी प्रमुख स्रोतों से होने वाले PM2.5 और इसे बनाने वाली गैसों (जैसे SO₂ और NO₂) को कम करने पर ध्यान देने की जरूरत है. जब तक प्रदूषण के स्रोतों पर ही उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया जाता, तब तक दिल्ली को हर सर्दी में गंभीर प्रदूषण का सामना करना पड़ सकता है."

जमीनी स्तर पर लागू करना

जब प्रदूषण को नियंत्रित करने के कड़े उपाय लागू किए जाते हैं - जैसे कि BS-VI मानकों से नीचे के वाहनों पर प्रतिबंध - तो पर्यावरणविद् ज़मीनी स्तर पर इन्हें लागू करने में रह जाने वाली कमियों की ओर इशारा करते हैं. पर्यावरणविद् भवरीन कंधारी, जो दशकों से इस मुद्दे पर काम कर रही हैं, बताती हैं कि बिना सख़्त निगरानी और अमल के, सीमाओं पर पाबंदियां लगाना और वाहनों पर रोक लगाना एक बड़ी चुनौती है.

कंधारी कहती हैं, "नवंबर से BS-6 मानकों से नीचे के वाहनों पर जो प्रतिबंध लगाया जा रहा है, वह एक तरह से जरूरी तो है, लेकिन इसका लोगों पर क्या असर पड़ेगा और इसे कैसे लागू किया जाएगा, इसे लेकर कई चिंताएं हैं. नियम बनाना आसान है, लेकिन सीमाओं पर सख्त जांच, निगरानी और नियमों का पालन सुनिश्चित करना बहुत जरूरी है. हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने राजमार्गों और चेकपॉइंट्स पर कोर्ट कमिश्नर भेजे थे, तब भी वहां नियमों का पालन न के बराबर ही हुआ था. इसलिए, सरकार को यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि इस कदम से प्रदूषण में कितनी कमी आने की उम्मीद है."

वाहनों पर प्रतिबंध लगाने के अलावा, कंधारी का मानना ​​है कि नीति का ध्यान इस बात पर भी होना चाहिए कि लोगों को आने-जाने के लिए व्यावहारिक और व्यवस्थित विकल्प कैसे दिए जाएं.

वो बताती हैं, "सरकार और नीति निर्माताओं को सार्वजनिक परिवहन (पब्लिक ट्रांसपोर्ट) को मजबूत करने के तरीकों पर विचार करना चाहिए. हां, हम इलेक्ट्रिक बसों (EV बसों) की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन इनकी संख्या अभी कम है और इसमें अभी बहुत सुधार की गुंजाइश है. पहले चार्टर्ड बसें हुआ करती थीं, जो एक इलाके से दूसरे इलाके में दफ्तर जाने वालों के लिए चलती थीं. ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए ताकि लोग अपनी निजी कारों का इस्तेमाल छोड़ें और सार्वजनिक परिवहन का रुख करें. फिलहाल, इस बारे में कोई बात नहीं हो रही है."

कंधारी का मानना ​​है कि एक मजबूत सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था लोगों के आने-जाने के तरीकों को पूरी तरह बदल देगी और भीड़भाड़ वाली सड़कों पर निजी वाहनों का बोझ कम करेगी.

गैर-वाहन स्रोतों से निपटना

सर्दियों के प्रदूषण से निपटने के लिए उन स्रोतों पर भी ध्यान देना जरूरी है जो वाहनों से नहीं जुड़े हैं, लेकिन 'पार्टिकुलेट मैटर' (हवा में मौजूद सूक्ष्म कणों) को बढ़ाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं. कंधारी बताती हैं कि अगर सिर्फ सड़क पर चलने वाले वाहनों पर ध्यान दिया जाए, तो नगर निगम और उद्योगों से होने वाले भारी प्रदूषण को नजरअंदाज कर दिया जाएगा.

वह कहती हैं, "हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रदूषण सिर्फ वाहनों से नहीं होता, बल्कि सड़क की धूल, निर्माण कार्यों, कचरा जलाने, मौजूदा खराब कचरा प्रबंधन व्यवस्था और औद्योगिक प्रदूषण से भी होता है. सिर्फ आदेश जारी करने से हवा साफ नहीं होगी; सरकार को प्रदूषण के हर स्रोत पर कार्रवाई करनी होगी और नियमों को सख्ती से लागू करना होगा. फिर भी, यह एक अच्छा कदम है."

आगे की राह

हालांकि, दिल्ली में सर्दियों के प्रदूषण की शुरुआत देर से होने के कारण कुछ समय के लिए राहत जरूर मिली, लेकिन इससे जमीनी हकीकत नहीं बदली. विशेषज्ञों का मानना ​​है कि जब तक नीतियां 'मौसमी आपातकालीन प्रबंधन' से हटकर 'साल भर प्रदूषण कम करने' की दिशा में नहीं बदलतीं, तब तक दिल्ली बार-बार हवा के संकट के चक्र में फंसी रहेगी.

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