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Exclusive: सोमानी ग्रुप राजस्थान रॉयल्स डील से क्यों हटी पीछे? मुख्य वजह आई सामने

बातचीत टूटने की एक मुख्य वजह मालिकाना हक के ढांचे पर असहमति थी. सूत्रों ने NDTV को बताया कि राजस्थान रॉयल्स के प्रमुख प्रमोटर मनोज बडाले बिक्री के बाद भी फ्रेंचाइजी में अपनी मौजूदा 7 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखना चाहते थे. कल सोमानी के नेतृत्व वाला कंसोर्टियम इस व्यवस्था के पक्ष में नहीं था और बडाले के शेयरधारक बने बिना ज़्यादातर हिस्सेदारी पर अधिग्रहण चाहता था.

Exclusive: सोमानी ग्रुप राजस्थान रॉयल्स डील से क्यों हटी पीछे? मुख्य वजह आई सामने
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राजस्थान रॉयल्स की बड़ी हिस्सेदारी खरीदने की दौड़ पिछले 24 घंटों में तेजी से बदल गई. सोमानी कंसोर्टियम ग्रुप के कल सोमानी के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने आखिरकार इस प्रक्रिया से हटने का फैसला किया. इससे लक्ष्मी एन. मित्तल, उनके बेटे आदित्य मित्तल और अदार पूनावाला की नई बोली का रास्ता साफ हो गया. NDTV को मिली जानकारी के मुताबिक सोमानी समूह के साथ प्रस्तावित पहले सौदे में कई अड़चनें आईं और आखिरकार वह फेल हो गया.

बडाले की हिस्सेदारी जारी रखने पर विवाद  

बातचीत टूटने की एक मुख्य वजह मालिकाना हक के ढांचे पर असहमति थी. सूत्रों ने NDTV को बताया कि राजस्थान रॉयल्स के प्रमुख प्रमोटर मनोज बडाले बिक्री के बाद भी फ्रेंचाइजी में अपनी मौजूदा 7 प्रतिशत हिस्सेदारी बनाए रखना चाहते थे. कल सोमानी के नेतृत्व वाला कंसोर्टियम इस व्यवस्था के पक्ष में नहीं था और बडाले के शेयरधारक बने बिना ज़्यादातर हिस्सेदारी पर अधिग्रहण चाहता था. यह मतभेद एक बड़ी अड़चन बन गया.

मालिकाना बदलाव की प्रक्रिया के दौरान उठे सवाल

शेयरधारिता विवाद के अलावा, सोमानी के नेतृत्व वाली बोली को ड्यू डिलिजेंस प्रक्रिया के दौरान भी मुद्दों का सामना करना पड़ा. सूत्रों ने कहा कि जांच के दौरान कई चिंताएं सामने आईं, जिससे लेन-देन को लेकर अनिश्चितता और बढ़ गई.

मित्तल-पूनावाला समूह आगे बढ़ा  

सोमानी कंसोर्टियम के हटने के बाद, लक्ष्मी मित्तल, आदित्य मित्तल और अदार पूनावाला के नेतृत्व वाले एक नए समूह ने 1.65 बिलियन अमेरिकी डॉलर (लगभग ₹15,600 करोड़) की ऊंची बोली लगाई. इस मूल्यांकन में राजस्थान रॉयल्स की पुरुष फ्रेंचाइजी के साथ-साथ सहयोगी टीमों पार्ल रॉयल्स और बारबाडोस रॉयल्स भी शामिल हैं.

डील को अहम मंजूरियों का इंतजार  

यह अधिग्रहण भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, भारतीय प्रतिस्पर्धा आयोग, आईपीएल गवर्निंग काउंसिल और अन्य संबंधित प्राधिकरणों की मंजूरी के अधीन है. अगर सभी मंजूरियां समय पर मिल जाती हैं, तो इस सौदे के 2026 की तीसरी तिमाही में पूरा होने की उम्मीद है.

सोमानी की असफल बोली दिखाती है कि अब आईपीएल फ्रेंचाइज़ी की बिक्री में मालिकाना अधिकार, गवर्नेंस ढांचा, नियामक मंजूरियां और दीर्घकालिक नियंत्रण- सभी किसी सौदे को पूरा करने के लिए अहम हैं.

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रिका रॉय
Sports Editor, NDTV 24x7
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