क्या किसी (चयनकर्ता, पूर्व क्रिकेटर) में वर्तमान में इतनी हिम्मत है कि वह आधुनिक दौर के सबसे महान बल्लेबाज विराट कोहली को मैदान पर उनसे काबिलियत साबित करने के लिए कह सके? भारतीय क्रिकेट में कोहली के 'विराट' कारनामे, किसी 22-23 साल के युवा खिलाड़ी को शर्मसार करने वाली फिटनेस और वर्तमान में आईपीएल हर दूसरे या तीसरे मैच में बरसता कोई न कोई शानदार रिकॉर्ड किसी को भी अभिभूत करने के लिए काफी हैं. एक समय अंतराल को छोड़ दें, तो यह करीब पिछले 17-17 साल से अभी तक जारी है.
वास्तव में पूर्व कप्तान का कद (खेल, रिकॉर्ड, फिटनेस, उनका योगदान) इतना विराट है कि एक बार को BCCI को भी उन तक 'जरूरी बात' पहुंचाने के लिए 'आधिकारिक स्रोत' का सहारा लेना पड़ता होगा. और निश्चित तौर पर घरेलू क्रिकेट में रणजी ट्रॉफी, विजय हजारे या बेंगलुरु स्थित सेंटर ऑफ एक्सिलेंस (पूर्व में NCA) के खाली मैदानों पर कोहली को अनिवार्य रूप से खेलने के लिए कहना जरूरी ही नहीं, निहायत ही वह जरूरी बात है जिसके कई अलग-अलग और अपने आप में बहुत ही ज्यादा ज्यादा मायने हैं. यहां किसी की भी नीयत कोहली से उनकी काबिलियित का सर्टिफिकेट मांगने की या भरोसे से जुड़ी नहीं ही रही होगी! या क्या वास्तव में ऐसा है? यहां हालात विशेष को देखने का अपना-अपना और सबसे महत्वपूर्ण "सही नजरिया" है. बात बस इतनी ही है और इसे इसी 'लेंस' से ही देखा जाना चाहिए क्योंकि तभी आप सही तक पहुंच सकते हैं. कोहली ने हाल ही में RCB के पोडकास्ट में 'अपने लेंस' से चीजों को सामने रखा, लेकिन चश्मे का एक दूसरा 'राइट लेंस'भी है.

कई सही बातों में एक यह तथ्य भी सभी के सामने है कि अब विराट कोहली टेस्ट और टी20 टीम का हिस्सा नहीं हैं. टीम इंडिया फिलहाल तीन-चार महीने के अंतराल पर वनडे मैच खेल रही है. हो सकता है कि समय अंतराल और ज्यादा हो जा रहा हो क्योंकि ज्यादातर टी20 ही खेला जा रहा है. यह सही है कि विराट इंग्लैंड (वह ज्यादातर वहीं रहते हैं) में पूरी ईमानदारी से ट्रेनिंग करते होंगे, लेकिन ट्रेनिंग करना और मैच फिटनेस एकदम पूरी तरह जुदा बाते हैं. और अगर प्रबंधन, चयनकर्ता उनसे मैच खेल कर मैच फिटनेस साबित करने को कह रहे हैं, तो आखिर इसमें गलत क्या है? बात यहां भरोसे की नहीं, बल्कि क्रूर या बहुत ही ज्यादा लचीले खेल की पेशवेर दुनिया में पैतृक संस्था या चयनकर्ताओं के खुद को मीडिया और फैंस के सवालों में खड़ा नहीं करने से भी जड़ी है. और अंतरराष्ट्रीय वनडे मैचों के बीच तीन-चार महीने के अंतराल में सिर्फ और सिर्फ ईमानदारी भरी ट्रेनिंग से ही काम नहीं चल सकता. या काम चल सकता है?
जिस तरह ट्रेनिंग और मैच फिटनेस दो अलग बातें हैं, ठीक उसी तरह काबिलियत, और फॉर्म भी अलग-अलग बाते हैं. जाहिर है कि कोई भी बल्लेबाज महानता के स्तर तक इसी वजह से पहुंचा क्योंकि उसमें क्षमता थी. लेकिन महानतम बल्लेबाज के साथ फॉर्म भी हर समय चिपकी हो, इसकी कोई गारंटी नहीं है. हो सकता है महान सर डॉन ब्रेडमैन फॉर्म होने के बावजूद आखिरी पारी में शून्य पर आउट हो गए हों! लेकिन आज के दौर में तीन महीने के अंतराल में खेलने के संदर्भ में महानतम बल्लेबाज की फॉर्म की परख की अनदेखी कैसे की जा सकती है? और इसकी क्या गारंटी है कि कोई महान बल्लेबाज तीन महीने के अंतराल पर सिर्फ ट्रेनिंग के सहारे भारत जैसे देश की टीम में वापसी करे, तो फॉर्म उसके साथ होगी ही होगी? यही वह "गलियारा" है, जहां न ही BCCI कोई जोखिम लेना चाहता है और न ही वो सेलेक्टर्स जो करोड़ों का वेतन लेने के साथ ही करोड़ों फैंस के प्रति भी जवाबदेह हैं.
और यहां फॉर्म की एंट्री इसलिए हुई क्योंकि आज विराट उम्र के जिस मोड़ पर खड़े हैं. और जैसी प्रतिभाएं एक के बाद एक उभरकर टीम इंडिया का 'एंट्री गेट'ही ढहाने में लगी हैं, वहां किसी भी खिलाड़ी विशेष की फॉर्म भी अपने आप में बहुत ही महत्वपूर्ण कारक हो जाता है. और जब बात मिशन विश्व कप से जुड़ी हो, तो मैच फिटनेस के साथ-साथ फॉर्म अपने आप में एक बड़ा पैमाना है. वास्तव में तीन महीने के अंतराल के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से जुड़ने से पहले फॉर्म बहुत ही महत्वपूर्ण कारक है. इसमें भी करीब 37 साल की उम्र में, विश्व कप की दिशा में आगे बढ़ते हुए. क्या ऐसा नहीं है? कोई आपसे काबिलियत साबित करने को नहीं कह रहा. बस अपनी फॉर्म को खुद ऐसे ही चिपकाए रखिए, जैसा फिलहाल आईपीएल में चिपकाए हुए हैं. हालात को देखने के एक 'राइट लेंस' ऐसा भी है!
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