Saransh Jain speaks out of heart: घरेलू सर्किट और भारत ‘ए' के लिए लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बाद 33 साल के ऑफ-स्पिन ऑलराउंडर सारांश जैन को श्रीलंका दौरे के लिए पहली बार टेस्ट टीम में चुना गया और उनके लिए उम्र महज एक नंबर है. मांसपेशियों में चोट के कारण वॉशिंगटन सुंदर उपलब्ध नहीं थे इसलिए चयनकर्ताओं ने 15 अगस्त से शुरू होने वाली दो टेस्ट मैच की श्रृंखला के लिए मध्य प्रदेश के स्पिनर जैन को चुना. जैन ने जियोस्टार' पर कहा, ‘उम्र निश्चित रूप से बस एक नंबर है.' बता दें कि साल 1985 के बाद से केवल दो भारतीय रोबिन सिंह और राकेश शुक्ला ने 33 साल की उम्र के बाद टेस्ट में पदार्पण किया है और जैन भी ऐसा ही करने वाले हैं.
'टीम में जगह बनाने का यकीन था'
जैन ने कहा, ‘33 बस एक नंबर है क्योंकि आजकल क्षेत्ररक्षण का स्तर इतना ऊंचा है कि मैदान पर आपकी उम्र का पता नहीं चलता. मुझे पता था कि अगर आज मैं भारतीय टीम में नहीं चुना गया तो अगले एक-दो साल में जरूर खेलूंगा, लेकिन मुझे यकीन था कि मैं जगह बना लूंगा.' मध्य क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करते हुए जैन पिछले सत्र में टीम की जीत में 136 रन और 16 विकेट लेकर ‘प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट' बने थे. पिछले साल दिलीप ट्रॉफी फाइनल में दक्षिण क्षेत्र के खिलाफ छह विकेट से मिली जीत में उन्होंने आठ विकेट लिए और पहली पारी में शतक लगाया था.
'पहले ही मैच में मिला सफलता का मंत्र'
अपने सफर को याद करते हुए उन्होंने कहा, ‘2014-15 में मैंने रणजी में पदार्पण किया और तमिलनाडु के खिलाफ अपने पहले ही मैच में पांच विकेट लिए. उस टीम में दिनेश कार्तिक जैसे सीनियर खिलाड़ी शामिल थे. इससे मुझे अहसास हुआ कि अगर आप कड़ी मेहनत करें और अनुशासित रहें, तो क्रिकेट उतना मुश्किल नहीं है. मुझे पता था कि अगर मुझे ऊंचे स्तर पर खेलना है तो मुझे उन चीजों पर ध्यान देना होगा जिन पर मेरा नियंत्रण है.' उन्होंने कहा, ‘‘मैंने ऐसा करना जारी रखा और आज मैं भारत का प्रतिनिधित्व कर रहा हूं.'
'भज्जी के शब्दों को गांठ बनाकर रख लिया'
वह रविचंद्रन अश्विन और हरभजन सिंह को अपना आदर्श मानते हैं जिन्होंने बेंगलुरु स्थित ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस' में एक शिविर के दौरान उनकी मदद की थी. उन्होंने कहा, ‘सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में एक हफ्ते के शिविर के दौरान मैंने हरभजन सिंह से बहुत कुछ सीखा. उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे ज्यादा बदलाव करने की जरूरत नहीं है क्योंकि मेरे पास पहले से ही काफी मैच का अनुभव है. लेकिन उनकी एक सलाह मेरे दिल में बस गई कि ‘कुछ पाने के लिए कुछ खोना नहीं पड़ता. आपको बस मेहनत करनी पड़ती है.' यह बात मेरे साथ रही, और जब भी मैं कड़ी मेहनत करता हूं तो उन शब्दों से मुझे प्रेरणा मिलती है.'
'पिता ही मेरे असली आदर्श'
लेकिन जैन के असली आदर्श उनके पिता सुबोध जैन रहे हैं जो खुद एक ऑफ-स्पिनर थे और मध्य प्रदेश के लिए नौ प्रथम श्रेणी मैच खेल चुके थे. उन्होंने कहा, ‘मैंने अपने पिता की वजह से क्रिकेट खेलना शुरू किया. मैं उनके लिए क्रिकेट खेलता हूं और वही मेरे असली आदर्श हैं.' सारांश ने कहा, ‘लाखों लोगों के बीच 15 सदस्यीय भारतीय टीम में जगह बनाना आसान नहीं है. इसलिए परिवार का समर्थन बहुत जरूरी है. ऐसा समय भी आया जब परिवार में कुछ परेशानियां हुईं और मैं टूट सकता था, लेकिन मेरा परिवार मेरे साथ खड़ा रहा. सब कुछ संभाला और एकजुट रहा. उन्हीं की वजह से आज मैं भारत के लिए खेल रहा हूं. मेरा सपना हमेशा से भारत के लिए टेस्ट क्रिकेट खेलना रहा है. शुरुआत से ही मुझे लाल गेंद का क्रिकेट पसंद है.'
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